नितिनमोहन शर्मा
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- श्रीठाकुरजी भक्त के देह रूपी रथ में विराजकर सकल मनोरथ करते है पूर्ण
- रथ पर आरूढ़ हो प्रभु अपने भक्तों को दर्शन दे तीनों तापों का करेंगे हरण
- जगन्नाथ पुरी से लेकर अहिल्यानगरी तक पसरा रथयात्रा उत्सव का उल्लास
- दोपहर में बड़ा गणपति से, शाम को छत्रीबाग व्यंकटेश मन्दिर से निकलेगी रथयात्रा
अहिल्या नगरी की सड़कों पर आज पूरी सा नज़ारा नजर आएगा। व्यंकट रमणा गोविंदा के जयघोष के साथ रथोत्सव जो आ गया हैं। आषाढ़ शुक्ल द्वितीया का वो पावन दिन, जिस घड़ी भक्त वत्सल भगवान जगन्नाथ अपने भक्तों को दर्शन व शुभाशीर्वाद देने स्वयम सडक पर आ जाते हैं। मध्य शहर में आज शाम वो ही दृश्य होगा, जो हजारो मील दूर उड़ीसा प्रान्त के पूरी शहर में होगा।
इस नयनाभिराम नज़ारे की साक्षी बनेगी छत्रीबाग स्थित प्राचीन व्यंकटेश देवस्थानम की रथयात्रा। स्वामी विष्णु प्रपन्नाचार्य जी महाराज के पावन सानिध्य में निकलने वाली इस रथयात्रा में अनेक नयनाभिराम झांकिया भी रहेगी। रथोत्सव का मनोरथ इस्कॉन संस्था भी पूर्ण करेगी। इस्कान की रथयात्रा में प्रभु के लिए हूबहू जगन्नाथपुरी सा रथ बनाया गया है। 51 फ़ीट ऊंचे इस रथ में ठाकुरजी विराजेंगे। प्राचीन श्री गोवर्धननाथ मन्दिर में रथयात्रा उत्सव के बाद से सेवा विधि में ऋतु परिवर्तन भी हो जाएगा। आज से पावस ऋतु का विधिवत आगाज़ भी हो जाता है। प्रभु गोवर्धननाथ जी को राग मल्हार सुनाई जाएगी। ये राग वर्षा से जुड़ी है और मान्यता है कि रथयात्रा वाले दिवस से ही ठाकुरजी भगवान इन्द्र को वर्षा की आज्ञा करते हैं। आप सभी हो रथयात्रा उत्सव की मंगलमय बधाई। प्रभु हमारे देह रूपी रथ में सदा विराजमान रहे। ये मंगल कामना भी।
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आज माई रथ बैठे गिरधारी
वाम भाग वृषभानु नंदिनी,
पहरे कुसुंभी सारी..!!
तैसोइ घन उनयो चहुदिश ते,
गरजत है अति भारी
तैसेइ दादुर मोर करत रट,
तैसी भूमि हरियारी..!!
शीतल मंद बहैत मलयानिल
लागत है अति सुखकारी,
नंदनंदन की या छवि ऊपर
गोविन्द जन बलिहारी..!!
रथ पर सवार हो गए भक्त वत्सल गिरधारी। उनके वाम भाग यानी बाई और वर्षाभानु नंदिनी विराज रही हैं। वृषभानु सुता ने कुसुम्भी रंग यानी सुर्ख लाल रंग की साड़ी पहन रखी हैं। ठीक उसी वक्त आसमान में मेघ घनाभूत हो गए हैं। सब तरफ से घटाटोप छा गई है। इधर घन गरज रहें हैं। उधर दादुर, मोर का शोर मचा हुआ हैं। भूमि भी हरीयाली हुई सी हैं। शीतल मंद बयार चल रही है जो मलयानिल हैं। यानी जो सुदूर दक्षिण भारत में विराजमान मलयाचंल पर्वत की तरफ से आ रही ये शीतल बयार तन मन को सुखकारी लग रही हैं। नंदनंदन की रथ पर विराजमान इस छवि पर गोविंद दास सहित कोटि जन जन बलि बलिहारी जा रहें हैं।
ये कीर्तन उन अष्टसखा कवियों में से एक गोविंददास जी का हैं, जिन पर जगन्नाथ प्रभु यानी ठाकुरजी की असीम अनुकम्पा थी। अष्टसखा कवि को प्रभु ने अपनी वो लीला का दर्शन करवाया है, जो रथोत्सव के रूप में की गई थी। कवि ने प्रभु कृपा से उस लीला का साक्षात्कार कलयुग में कर लिया, जो हजारो साल पहले द्वापरयुग में हुई थी। ये ही कृष्ण लीला है, कृष्ण कृपा है, जो श्रीमद जगतगुरु श्रीवल्लभाचार्य की कृपा बिन असंभव हैं। रथयात्रा के साथ आज से विधिवत ऋतु परिवर्तन भी हो जाता है। आज सभी वैष्णव मंदिरों में ठाकुरजी रथ पर आरूढ़ होंगे।
प्राचीन श्री गोवर्धननाथ मन्दिर में रथयात्रा का मनोरथ उत्सव एक दिन पूर्व ही हो गया। पुष्टी मार्ग में ये उत्सव नक्षत्र प्रधान हैं। लिहाज़ा बुधवार को ही मन्दिर में रथ यात्रा के चार दर्शन हुए। यहां प्रभु की रथयात्रा मन्दिर के गर्भगृह में ही सम्पन्न होती हैं। सायंकाल में एक सदी पुरानी अश्व जोड़ी से सुसज्जित तांगे में प्रभु विराजते हैं। ये अश्व जोड़ी को चांदी के अनेक आभूषणों से सुसज्जित किया जाता हैं।
भव्य व बड़ी रथयात्रा का मनोरथ प्राचीन व्यंकटेश देवस्थानम, छत्रीबाग में मनाया जाएगा। अहिल्या नगरी को रथयात्रा से साक्षात्कार व्यंकटेश देवस्थान से ही हुआ हैं। 78 साल से ये यात्रा निर्बाध गतिमान हैं। आज शाम 5 बजे ये रथयात्रा मन्दिर प्रांगण से शूरू होगी और फिर नगर भृमण करेगी। रथयात्रा को लेकर मन्दिर में 7 दिनों से विशेष तेयारी चंल रही थी। इसमें 7 दिवसीय ब्रह्मोत्सव के साथ अदभुत कलाकारी का पुष्प बंगला मनोरथ भी शामिल है। ऐसी ही शोभायात्रा रथ की गुमाश्ता नगर स्थित व्यंकटेश मन्दिर से भी निकलेगी लेकिन वह रथयात्रा मन्दिर परिसर में ही भृमण करेगी। अंतराष्ट्रीय स्तर तक कृष्णम वंदे जगद्गुरु का जयघोष गुंजायमान करने वाली संस्था इस्कॉन की रथयात्रा भी नगर भृमण करेगी।
यशवंत गंज गौराकुंड स्थित रामानुज कोट मंदिर में आज 10 दिवसीय आयोजित ब्रह्मा उत्सव में स्वर्ण जड़ित आभूषणों से श्रृंगारित भगवान वेंकटेश की चांदी के रथ पर आरूढ़ होकर शाही सवारी मंदिर प्रांगण में निकली। ट्रस्टी पुरुषोत्तम आगेश्वर एंव राज गोपाल मानधन्या ने बताया कि मंदिर के 140 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर गादीस्थ स्वामी जी श्री रंगाचार्य जी महाराज व स्वामी श्री विजयाचार्य महाराज के सानिध्य में भगवान के मूल एंव उत्सव विग्रहों का पंचामृत से लोकांत अभिषेक किया गया। ट्रस्टी ओम प्रकाश वोरा ने बताया कि 1887 में वेंकटेश भगवान के मूल विग्रह की प्रतिष्ठा आषाढ़ माह के पुष्य नक्षत्र में की गई थी। ये जानकारी मंदिर के प्रचार प्रसार प्रमुख देवेन्द्र ईनाणी ने दी।
पूरी में जगन्नाथ देव जु के लिए उमड़ा जनसैलाब
आज पुरी में श्री जगन्नाथ देव जू की रथयात्रा है। जहाँ ऐसा जनसैलाब उमड़ा है कि पांव रखने की जगह नही है। अलसुबह से यहां इंद्रदेव भी मेहरबान हो गए हैं, जिससे भक्ति का उत्साह दूना हो गया हैं। पुरी में जहां पर श्री जगन्नाथ जी विराजते हैं उस मंदिर में चार विग्रह है। एक सुदर्शन है। एक श्री कृष्ण है। मध्य में सुभद्रा है कृष्ण बलराम की बहन और दूसरी तरफ में बलराम जी। कृष्ण सुभद्रा बलराम और सुदर्शन इन चारों को जगन्नाथ कहा जाता है यदि हम यह बोलते हैं कि जगन्नाथ जी कृपा करें। इसका भाव है कि यह चारों हम पर कृपा करे।
वैष्णवों का भाव यह रहता है कि आज के दिन यह दोनों भाई और सुभद्रा के रक्षक के रुप में सुदर्शन चारों ब्रज में जाते हैं ब्रजवासियों से मिलने। गुंडिचा को ब्रज का प्रतीक माना गया है। यहां से यात्रा करके यह ब्रज में जाते हैं वहां ब्रज वासियों श्री राधा आदि गोपिगण से मिलते हैं। दस बारह दिन वहां रहते हैं और वहां से वापिस द्वारका अर्थात मुख्य मन्दिर में आ जाते हैं। जगन्नाथ मंदिर में हिंदुओं के अतिरिक्त किसी का भी प्रवेश नहीं है और ठाकुर का नाम है जगन्नाथ।
यह अपने नाम को सिद्ध करते हुए आज खुली सड़क पर यात्रा में पधारते हैं जिससे सभी जाति वर्ग के लोग इनका वर्ष में कम से कम एक बार दर्शन करके आनंदित हो सके और उनका जगन्नाथ नाम सार्थक हो सके। पूरी में ये नौ दिनों का उत्सव होता हैं। रथयात्रा गुंडीचा मंदिर तक जाती है। तीनों देव नौ दिनों तक इसी मंदिर में रहते हैं और फिर मुख्य मंदिर श्री जगन्नाथ मंदिर लौटते हैं।तीनों देवताओं के लिए हर साल लकड़ी के तीन नए और भव्य रथ बनाए जाते हैं।
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नंदीघोष: भगवान जगन्नाथ का रथ (16 पहियों का, लाल और पीले रंग में)।...! -
तालध्वज: भगवान बलभद्र का रथ (14 पहियों का, लाल और काले रंग में)।...!
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दर्पदलन: देवी सुभद्रा का रथ (12 पहियों का, लाल और काले/नीले रंग में)।...!