शिक्षक के भी शिक्षक

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शिक्षक के भी शिक्षक

वह शिक्षक ही होते हैं, जो भटके पथिक को राह दिखाते हैं,

अंधियारे पथ पर भी, ज्ञान का दीप जलाते हैं।

वह शिक्षक ही होते हैं, जो हारे हुए की पीठ थपथपाते हैं,

निःशब्द होकर भी, मन में नया हौसला जगाते हैं।

वह शिक्षक ही होते हैं, पेंसिल की भूलों को जो सुधार देते हैं,

और हाथों में भविष्य का, सशक्त पेन थमा देते हैं।

वह शिक्षक ही होते हैं, जो दुनिया से अनजान नयनों को,

सीखते-सिखाते जीवन के, उच्च मुकाम तक पहुँचाते हैं।

वो हुनर जो हम स्वयं में भी, कभी खोज नहीं पाते,

वह शिक्षक ही होते हैं, जो उन प्रतिभाओं को पहचान जाते हैं।

वह शिक्षक ही होते हैं, जिनकी छोटी-छोटी डांट में भी,

जीवन के बड़े-बड़े पाठ, सहज ही पढ़ा देते हैं।

वह शिक्षक ही होते हैं, जो छोटी गलतियों को अनदेखा करके,

अनोखी सीख से जीवन को, नया अर्थ दे जाते हैं।

वह शिक्षक ही तो हैं, जो हर मनुष्य को नई पहचान देते हैं,

हर व्यक्ति के निर्माण की, प्रथम नींव बन जाते हैं।

बच्चों के बढ़ते कदमों के, तुम ही पायदान बन जाते हो,

हर शिष्य को उसकी मंजिल के, द्वार तक पहुँचाते हो।

बिल्कुल सही पकड़ा आपने, आखिरी पैराग्राफ की लय टूट रही थी। अब इसे पूरी तुकबंदी में ठीक किया है -

कोई बने चिकित्सक, अभियंता या अधिवक्ता मानी ,

वैज्ञानिक बने, कोई अफसर या शिक्षक या ज्ञानी,

हर एक की सफलता के पीछे, आपका ही अक्स नजर आता है,

क्योंकि एक शिक्षक को भी शिक्षक, शिक्षक ही तो बनता हैं।

मेरी कलम जो आज इतना कुछ लिख पाती है,

वो स्याही नहीं, मेरे मेरे शिक्षक की कृपा दिखती है।

  • स्वरचित : अन्नू राठौड़ रुद्रांजली

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