- यूपीआई पेमेंट पर 15 अक्टूबर से लगेगाम 0.04 प्रतिशत टैक्स, आम आदमी पर असर नहीं
- यूपीआई पेमेंट पर सरकारी टैक्स वसूली पर विपक्ष ने खोला मोर्चा सरकार से फैसला वापस लेने की मांग
- यूपीआई के सीईओ समीर निगम बोले आम आदमी पर इस टैक्स का असर नहीं होगा
भाजपा बोली नाराज फूफा पार्टी कांग्रेस देश में झूठ प्रचार करना बंद करें पैनिक ना फैलाएं
कांग्रेस बोली यह अमेरिका के दबाव में लिया गया है फैसला असर आम आदमी की जब पर होगा
सरकार का दावा, टैक्स वसूली से आए पैसे से डिजिटल पेमेंट सिस्टम और मजबूत व सुरक्षित होगा।
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने सरकार के फैसले का किया बचाव, कहा ये सुरक्षित कारोबार के लिए अच्छा कदम
सोशल मीडिया पर यूपीआई पेमेंट पर टैक्स' के नाम पर फैलाया जा रहा पैनिक और कुछ नहीं। ये बस आधी-अधूरे तथ्यों से उपजा एक भ्रामक उन्माद है, जिसे वित्त मंत्रालय ने यह साफ कर खारिज कर दिया है। मंत्रालय ने दो टूक कहा है कि आम जनता की जेब पर इसका एक रुपये का भी असर नहीं होगा। बावजूद इस कोलाहल के पीछे की कड़वी नीतिगत हकीकत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सरकार ने इस फैसले के जरिये दशकों पुरानी शून्य शुल्क नीति को अलविदा कह दिया है। 0.4का मर्चेंट डिस्काउंट रेट सीधे तौर पर भले ही सिर्फ व्यापारियों की बैलेंस शीट को प्रभावित करे, लेकिन यह आशंका पूरी तरह जायज है कि मर्चेंट्स इसका अप्रत्यक्ष बोझ अंततः वस्तुओं की कीमतें बढ़ाकर उपभोक्ताओं पर ही ट्रांसफर करेंगे। राहत की बात बस इतनी है कि आम जनता के आपसी ट्रांसफर और 96 प्रतिशत छोटे भुगतान इस टैक्स दायरे से मुक्त हैं, जिसने एक बड़े जन-आक्रोश को फिलहाल टाल दिया है। डिजिटल पब्लिक गुड्स के नाम पर खड़ा किया गया यह विशाल साम्राज्य अब बैंकिंग और फिनटेक लॉबी के भारी दबाव में मुद्रीकरण की राह पर चल पड़ा है, जो यह साबित करता है कि पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में कुछ भी 'हमेशा के लिए मुफ्त' नहीं हो सकता।
● नितिनमोहन शर्मा
यूपीआई पेमेंट पर टैक्स नहीं, बल्कि 'मर्चेंट चार्ज' (एमडीआर) को लेकर सरकार ने नया फ्रेमवर्क जारी किया है, जो 15 अक्टूबर 2026 से लागू होगा। सोशल मीडिया पर यूपीआई ट्रांजैक्शन पर टैक्स या जीएसटी लगने की जो भी खबरें चल रही हैं, वे पूरी तरह भ्रामक और अफवाह हैं। वित्त मंत्रालय ने साफ किया है कि आम ग्राहकों के लिए UPI हमेशा की तरह 100 फीसदी फ्री रहेगा।
सोशल मीडिया और इंटरनेट पर पिछले कुछ दिनों से यूपीआई (यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस) पर टैक्स या जीएसटी लगने की चल रही अफवाहों पर वित्त मंत्रालय ने पूरी तरह विराम लगा दिया है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि आम उपभोक्ताओं के जेब पर एक पैसे का भी बोझ नहीं पड़ेगा। दरअसल, सरकार ने पेमेंट सिस्टम को टिकाऊ व सुरक्षित बनाने के लिए एक नया मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) फ्रेमवर्क तैयार किया है, जो 15 अक्टूबर 2026 से प्रभावी होगा।
सरकार और नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के मुताबिक, इस नए नियम का असर केवल बड़े व्यावसायिक भुगतानों पर पड़ेगा, न कि रोजमर्रा की सब्जी, दूध या किराने की खरीदारी पर। सरकार का कहना है कि आम जनता को घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है। आपका गूगल पे, फोनपे, या पेटीएम से किया जाने वाला डेली ट्रांजैक्शन पहले की तरह ही मुफ्त और आसान बना रहेगा।
● दोस्तों-रिश्तेदारों को ट्रांसफर बिलकुल फ्री
यदि आप अपने किसी मित्र या परिवार के सदस्य को कितने भी रुपये चाहे 5 हो या 50 हजार रुपये ट्रांसफर करते हैं, तो वह पूरी तरह मुफ्त रहेगा। रु-पे औऱ डेबिट कार्ड के जरिए होने वाले ट्रांजैक्शन भी पूरी तरह चार्ज-मुक्त रखे गए। दुकानदारों, ऑटो चालकों या किसी भी छोटे व्यापारी को 2,000 तक का किया गया भुगतान पूरी तरह फ्री रहेगा। देश के कुल डिजिटल मर्चेंट ट्रांजैक्शन में से 96 प्रतिशत ट्रांजैक्शन इसी दायरे में आते हैं, इसलिए 96 फीसदी लोग इससे अप्रभावित रहेंगे।
● किस पर लगेगा चार्ज और किसे देना होगा 0.4मर्चेंट डिस्काउंट रेट
यदि कोई ग्राहक किसी बड़े मर्चेंट को 2 हजार से अधिक का यूपीआई भुगतान करता है, तो उस पर 0.4का शुल्क लगेगा। यह शुल्क सिर्फ और सिर्फ दुकानदार/व्यापारी को बैंक या पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर को देना होगा, ग्राहक को नहीं। सरकार ने बैंकों को निर्देश दिए हैं कि वे सुनिश्चित करें कि मर्चेंट इस चार्ज को ग्राहकों के बिल में न जोड़ें। बड़े भुगतानों के लिए इस चार्ज को 300 रुपये पर सीमित किया गया है। यानी 75 हजार या उससे ऊपर के किसी भी बड़े ट्रांजैक्शन पर अधिकतम 300 ही मर्चेंट फीस लगेगी। इस प्रक्रिया में खास सेक्टरों के लिए राहत दी गई हैं। रेलवे, टेलीकॉम, इंश्योरेंस, पेट्रोल पंप और कृषि इनपुट्स जैसे थिन-मार्जिन सेक्टरों में 2,000 से ऊपर के भुगतान पर केवल 5 रुपए का फ्लैट चार्ज तय किया गया है।
● क्यों लिया गया यह फैसला?
बैंकिंग और फिनटेक इंफ्रास्ट्रक्चर, साइबर सिक्योरिटी और डिजिटल भुगतान के बढ़ते नेटवर्क को सुरक्षित रखने के लिए भारी निवेश की जरूरत होती है। पूर्व एसबीआई चेयरमैन सहित कई आर्थिक विशेषज्ञों ने इस कदम का समर्थन करते हुए कहा है कि यह कोई 'टैक्स' नहीं है, बल्कि डिजिटल इंडिया के इकोसिस्टम को मजबूत और सुरक्षित बनाए रखने के लिए एक जरूरी लॉजिस्टिक्स कॉस्ट है। हालांकि, विपक्षी दलों और कुछ आलोचकों का मानना है कि मर्चेंट्स पर चार्ज लगाने से अंततः वे अपनी वस्तुओं की कीमतें बढ़ा सकते हैं, जिससे अप्रत्यक्ष रूप से इसका भार जनता पर आ सकता है।