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शतक : संघ के 100 वर्ष

भोपाल Published by: Nevedhaya Purohit Updated Fri, 13 Mar 2026 02:22 AM
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भोपाल.

भोपाल के डीडीएक्स सिनेमा में एक विशेष अवसर का साक्षी बनने का अवसर मिला। विश्व संवाद केंद्र की ओर से फिल्म “शतक: संघ के 100 वर्ष” का विशेष प्रदर्शन आयोजित किया गया। इस अवसर पर मैं भी उपस्थित रहा। साथ ही माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के भी कुछ छात्र भी शामिल हुए। इस अनुभव को साझा करने का अवसर देने के लिए लोकेन्द्र सिंह सर का हृदय से धन्यवाद।

यह फिल्म केवल एक डॉक्यूमेंट्री या ऐतिहासिक प्रस्तुति नहीं है, बल्कि एक विचार, एक संगठन और एक शताब्दी की यात्रा को एआई जैसी तकनीक के उपयोग के साथ दृश्य रूप में समझाने का प्रयास है। यह फिल्म मूलतः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सौ वर्ष की यात्रा को दर्शाती है। एक ऐसा संगठन जिसने अपने प्रारंभ से ही राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के विचार का समर्थन किया और जिसके कार्यकर्ताओं में से अनेक लोग आगे चलकर देश के बड़े-बड़े पदों पर पहुँचे।

यदि फिल्म के सिनेमाई पक्ष की बात करें तो यह एक बार अवश्य देखी जा सकने वाली फिल्म है। इसमें अजय देवगन का प्रभावशाली वॉइस-ओवर भी है, जबकि कई जगह संगीत शंकर महादेवन ने दिया है। फिल्म में कई दृश्य एआई से बनाए गए हैं, जो अतीत को दृश्य रूप में पुनर्जीवित करने का प्रयास करते हैं।

एक बालक से ‘डॉक्टर जी’ बनने तक की कथा

फिल्म की शुरुआत में एक मार्मिक दृश्य है जब प्लेग की महामारी से एक गाँव उजड़ जाता है और एक बालक अपने माता-पिता को खो देता है। वही बालक आगे चलकर डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के रूप में जाना जाता है। बचपन से ही उनके भीतर कुछ अलग करने की जिद थी। फिल्म में एक डायलॉग आता है जब बालक केशव कहता है, “जब आप बड़े लोग कुछ नहीं कर रहे, तो हमें बच्चों को ही कुछ करना पड़ेगा।” उस समय नागपुर के प्रभावशाली नेता बी.एस मूंजे युवा केशव की प्रतिभा और जज्बे से प्रभावित होकर उन्हें अपनी छत्रछाया में लेते हैं।

वर्ष 1907 की विजयादशमी से ही केशव ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ आवाज उठानी शुरू कर दी। उस समय रिसले सर्कुलर के माध्यम से वंदे मातरम् बोलने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। परन्तु स्कूल इंस्पेक्टर के सामने भी केशव और उनके साथी वंदे मातरम् बोलने से पीछे नहीं हटते। क्रांतिकारी गतिविधियों में भी वे शामिल होते हैं बम बनाने तक की घटनाओं का इसमें उल्लेख आता है।

कलकत्ता की क्रांतिकारी भूमि

1910 में केशव कलकत्ता पहुँचते हैं जहाँ ईडन बोर्डिग सच में मेडिकल शिक्षा के लिए उनका चयन होता है। वहीं वे क्रांतिकारी संगठन अनुशीलन समिति से जुड़ जाते हैं। बाढ़, महामारी, गंगासागर में फैली हैजे की बीमारी हर संकट के समय वे सेवा कार्य में आगे रहते हैं। यहीं से लोगों ने उन्हें “डॉक्टर जी” कहना शुरू कर दिया। उनके लिए मातृभूमि की सेवा ही उनका पेशा थी। इसी कारण उन्होंने विवाह न करने का निर्णय लिया। फिल्म में एक विचारोत्तेजक संवाद आता है, “बगावत के लिए चाहत, ज़रूरत और हिम्मत चाहिए…और उसके अलावा बड़ों की इजाज़त।” 

राष्ट्र निर्माण का विचार

डॉक्टर जी का मानना था कि, “देश निर्माण के लिए व्यक्ति निर्माण आवश्यक है।” वे कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में भाग लेते हैं। जिसकी अध्यक्षता सी. विजयराघवचारियार थे। फिल्म में गांधी और हेडगेवार के बीच कई संवाद भी दिखाए गए हैं। डॉक्टर जी अंग्रेजी शिक्षा के स्थान पर राष्ट्रीय स्कूलों की स्थापना का समर्थन करते हैं। उनके भाषणों के कारण अंग्रेज सरकार उन पर राजद्रोह का आरोप लगाती है और उन्हें एक वर्ष के कारावास की सजा होती है।

खिलाफ़त, दंगे और एक संगठन का विचार

खिलाफत आंदोलन के बाद देश में कई स्थानों पर दंगे हुए, विशेष रूप से मालाबार में हुई हिंसा का उल्लेख फिल्म में आता है। जेल से बाहर आने के बाद डॉक्टर जी की मुलाकात विनायक दामोदर सावरकर से होती है। यहीं से एक संगठन बनाने का विचार स्पष्ट रूप लेता है जो सिर्फ व्यक्ति निर्माण, संगठन शक्ति और हिंदू समाज के पुनर्जागरण के लिए समर्पित रहेगा। इसी विचार से आरएसएस की स्थापना होती है। संगठन की इकाइयों को “शाखा” कहा जाने लगा। 

संघ की परंपराएँ और प्रभाव

विजयादशमी के अवसर पर संघ के पथ संचलन को देखकर महामना पंडित मदनमोहन मालवीय बहुत प्रभावित होते हैं। संघ की एक प्रमुख परंपरा गुरु पूर्णिमा पर गुरु दक्षिणा देने की है, जिसमें स्वयंसेवक वर्ष में एक बार अपनी श्रद्धा से दान देते हैं। जब दांडी मार्च हुआ, तब संघ के स्वयंसेवकों को व्यक्तिगत रूप से भाग लेने की अनुमति थी, पर संगठन के रूप में भाग नहीं लिया गया। डॉक्टर जी कहते हैं, “हमारी एकता की कमी के कारण ही देश गुलाम हुआ। व्यक्ति बदलेगा तभी देश बदलेगा।”

1930 का दशक – विचार की संरचना

1932 में कहा गया कि संघ का एक गुरु है भगवा ध्वज। 1934 में वर्धा में आयोजित संघ शिविर में महात्मा गांधी स्वयं गए थे। संघ की आर्थिक व्यवस्था स्वयंसेवकों द्वारा दी जाने वाली दक्षिणा से चलती है। एक रोचक प्रसंग फिल्म में बताया गया जब सेंट्रल प्रोविंस की एक इमारत में आग लगने से हेडगेवार से जुड़ी सभी सरकारी फाइलें जल गईं। कहा गया कि

उनका अतीत राख हो गया, और संघ का भविष्य सुरक्षित। 1939 में नागपुर के पास सिंदी में हुई विशेष बैठक संघ के इतिहास का मील का पत्थर मानी गई, जहाँ यह स्पष्ट किया गया कि संघ कभी प्रचलित राजनीति में भाग नहीं लेगा। इसी दौर में श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी डॉक्टर जी से मिलने आते हैं। 1940 में नागपुर में डॉ. हेडगेवार का निधन हो जाता है और गुरुजी माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर संघ के सरसंघचालक बनते हैं।

अंतराल और एक छोटा सा स्वाद

फिल्म में इंटरवल के दौरान विश्व संवाद केंद्र की ओर से सभी के लिए स्वल्पाहार की व्यवस्था की गई थी समोसा, फ्रूटी और पानी की बोतल। कुल मिलाकर माहौल बहुत आत्मीय और आनंदपूर्ण था।

गुरुजी का दौर

गुरुजी माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर के समय संघ का विस्तार तेज़ी से हुआ। 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ फिल्म में यह भी बताया गया कि कश्मीर के महाराजा हरि सिंह से मिलने गुरुजी स्वयं गए थे। विभाजन के समय पंजाब में शरणार्थियों के लिए संघ ने कई शिविर लगाए। स्वयंसेवकों ने बर्फ के बीच रनवे तक बनाने में मदद की ऐसे दृश्य भी फिल्म में दिखाए गए है।

गांधी हत्या और प्रतिबंध

1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया। लगभग 20,000 स्वयंसेवक जेल में बंद किए गए। संघ का कहना था कि इस हत्या से उसका कोई संबंध नहीं है और यह आरोप सरासर झूठ है बाद में लगभग 60,000 स्वयंसेवकों ने सत्याग्रह करते हुए स्वयं गिरफ्तारी दी थी।

जनसंघ और आगे की राजनीति

श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने पंडित जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल से इस्तीफा देकर 21 अक्टूबर 1951 को जनसंघ की स्थापना की। इसमें बलराज मधोक, अटल बिहारी वाजपेयी, दीनदयाल उपाध्याय जैसे नेता जुड़े।

गोवा मुक्ति और अन्य आंदोलन

फिल्म में बताया गया कि पुर्तगालियों ने भारत में सबसे अधिक अत्याचार किए और सबसे पहले आए थे जिन्होंने सबसे अंत तक अपना कब्जा बनाए रखा। संघ से जुड़े कार्यकर्ताओं ने गोवा मुक्ति आंदोलन में भी भाग लिया। भारत-चीन युद्ध के दौरान संघ के स्वयंसेवकों ने सैनिकों के लिए रक्तदान भी किया था। गुरुजी का एक संवाद फिल्म में आता है,"अटैक इज़ द बेस्ट डिफेंस।"

गुरुजी का निधन और आपातकाल

1973 में नागपुर में गुरुजी का निधन हो गया। इसके बाद बालासाहेब देवरस संघ के सरसंघचालक बने। आपातकाल के दौरान कहा गया कि जेलों में बंद 80लोग स्वयंसेवक थे। संघ को किसी फिल्म या किताब से नहीं समझा जा सकता, उसे समझने के लिए उसके भीतर रहना पड़ता है। आज के इस विशेष प्रदर्शन ने केवल एक फिल्म दिखाने का काम नहीं किया, बल्कि एक शताब्दी की विचार यात्रा को देखने-समझने का भी अवसर दिया। सैकड़ों से अधिक दर्शकों के साथ, विश्व संवाद केंद्र की इस पहल ने एक ऐसा माहौल बनाया जहाँ इतिहास, विचार, संगठन और अनुभव सब एक साथ सामने आए।

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