पत्रकारिता सोई हुई व्यवस्था को जगाने का नाम भी है। वर्ष 1988 के उस दौर में, जब संसाधन सीमित थे और ग्रामीण अंचलों की आवाज़ अक्सर दफ्तरों की फाइलों में दब जाया करती थी, तब 'दैनिक भास्कर' की टीम ने इंदौर के धार रोड़ में नावदापंथ क्षेत्र जैसे इलाकों की सुध ली थी। बिजली विभाग की मनमानी, भ्रष्टाचार और किसानों की बेबसी को उजागर करती यह रिपोर्ट इस बात का प्रमाण है कि विकास की चमक से दूर अंधेरे में खड़े ग्रामीण उपभोक्ताओं के लिए पत्रकारिता ही उम्मीद की एकमात्र किरण थी। इस रिपोर्ट में न केवल आंकड़े हैं, बल्कि उस दौर के संघर्ष की एक सजीव तस्वीर भी है। 5 दिसम्बर 1988 को दैनिक भास्कर में यह रिपोर्ट दिवंगत पत्रकार सुरेश राठौर ने "आस-पास" नामक स्तंभ में प्रकाशित की थी।
विद्युत प्रदाय केन्द्र द्वारा ग्रामीण उपभोक्ताओं के साथ खिलवाड़
आस-पास
सुरेश राठौर द्वारा
म.प्र. की औद्योगिक राजधानी इन्दौर से मात्र दस पन्द्रह किलोमीटर की परिधि में बसे गांव और इन गांवों के किसानों के साथ शासकीय व अर्द्धशासकीय मशीनरी द्वारा किस प्रकार खिलवाड़ किया जाता है इसका उदाहरण है ग्राम नावदापंथ का विद्युत वितरण केंद्र। इस केंद्र में कहते हैं कि बिना लेने-देन के कोई कार्य नहीं होता? इतना ही नहीं प्रत्येक कार्य के लिये लेन-देन की सीमा भी तय है। आश्चर्य इस बात का है कि इस ओर देखने सुनने वाला ही नहीं है।
नावदापंथ विद्युत वितरण केन्द्र के शिकार ग्रामवासियों ने उदाहरण देते हुए बताया कि ग्राम सिरपुर के बाबूलाल आशाराम ने सन् १९८६ में नए विद्युत कनेक्शन के लिए ११०० रुपए के साथ आवेदन किया। यह आवेदन किसी एक अधिकारी के पास दो वर्ष तक पड़ा रहा। दो वर्ष बाद भी बाबूलाल को कनेक्शन नहीं दिया गया। उसका आवेदन पत्र वापस लौटा दिया गया और उसके ११०० रुपए का भुगतान भी किश्तों में किया गया।
जब भी कोई ग्रामवासी अथवा छोटा किसान के विद्युत कनेक्शन के लिए आवेदन करता है तो उसे यह कहकर कनेक्शन देने से इनकार कर दिया जाता है कि डी.पी. ओवरलोड है। यदि बहुत जरूरी हो तो अस्थायी कनेक्शन ले लो। यहां प्रश्न यह उठता है कि जब डी.पी. ही ओवरलोड है तो अस्थायी कनेक्शन कौन सी डी.पी. से लग जाएगा? कहते हैं कि अस्थायी कनेक्शन के नाम पर कृषकों से धनराशि लेकर उन्हें मुख्य लाइन से सीधे कनेक्शन दे दिए जाते हैं, जिनका विधिवत रिकॉर्ड विद्युत केन्द्र में नहीं रखा जाता है।
घनश्याम पिता दरियावजी, अशोक पिता ताजी, दीपचंद पिता रामसिंह जैसे अनके लोग हैं, जिन्होंने विद्युत कनेक्शन के लिए आवेदन दे रखे हैं और वे वर्षों से विधिवत कनेक्शन मिलने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। ग्राम बिसनावदा, सिंहासा, नावदापंथ सहित अनेक ग्राम कई-कई रात अंधेरे में डूबे रहते हैं। इस कारण चोरी की घटनाएं भी बढ़ गई हैं। जनवरी १९८७ से अगस्त ८८ तक ७६ चोरियों में लगभग ९ लाख ५५ हजार रुपए का सामान और नकदी चोरी गया है। इन सभी चोरियों की रिपोर्ट हातोद पुलिस में दर्ज है।
नावदापंथ विद्युत वितरण केन्द्र के अन्तर्गत आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में २९ मुर्गी केन्द्र, ३१ ईंट भट्टे, ५५ थ्रेशर मशीनें, ५ अस्पताल एवं ५ पेट्रोल पंप हैं। ये भी उक्त विद्युत केन्द्र की अनियमितताओं को झेल रहे हैं। ग्राम बिसनावदा में १०० एच.पी. का ट्रांसफार्मर लगा है। इस पर वैध या अवैध लगभग १८४ एच.पी. का ओवरलोड है। ग्राम बिसनावदा में दो ट्रांसफार्मर विगत तीन वर्षों से स्वीकृत हैं लेकिन अधिकारियों व कर्मचारियों की लापरवाही के कारण के ट्रांसफार्मर आज तक नहीं लग पाए हैं। विद्युत वितरण केन्द्र में फ्यूज बांधने, मीटर में गड़बड़ी कर कम बिल बनवाने अवैध कनेक्शन लेने, नई लाइन डालने के नाम कर छोटे-मोटे कर्मचारी तय शुदा पैसे लेकर उक्त कार्य करते रहते हैं।
अधिकृत जानकारी के अनुसार नावदापंथ डिवीजन में इस समय लगभग ४७५ मीटर जले हुए हैं तथा ५११ मीटर बंद हैं। इन उपभोक्ताओं को न्यूनतम बिल भेजकर खानापूर्ति कर ली जाती है। एक किसान बुदीलाल हरिजन तथा गणेशलाल कुम्हार ने उनके जले हुए मीटर बदलने के लिए तीन वर्ष पूर्व विद्युत मंडल को पैसे जमा करवा दिए हैं लेकिन उनके मीटर आज तक नहीं बदले गए और इन्हें मनमाने बिल भेजकर वसूली की जाती रही है।
आज जब हम डिजिटल क्रांति और 24 घंटे बिजली के युग में खड़े हैं, तब दिसंबर 1988 की यह रिपोर्ट बता रही है कि बुनियादी अधिकारों के लिए लड़ाई पहले भी लंबी और कठिन रही है। 'आस-पास' कॉलम के जरिए स्व. सुरेश राठौर साहब ने जिस बेबाकी से उस समय के भ्रष्टाचार और प्रशासनिक ढीलेपन को कागज़ पर उतारा, वह आज की पीढ़ी के पत्रकारों के लिए एक सबक है। यह केवल एक पुरानी खबर नहीं है, हमारे शहर के उन पत्रकारों के साहस की विरासत भी है जिनके पास सत्ता की आँखों में आँखें डालकर सच कहने का माद्दा था।
- अगली किस्त में पढ़िए: जब स्व. सुरेश राठौर साहब ने एक रिपोर्ट को अपने हाथों से दोबारा लिखा, तो उसके अक्षरों की सुघड़ता देखकर भास्कर के मालिक स्व. रमेशचंद्र अग्रवाल भी उनकी लेखनी पर फिदा हो गए थे