जय जिनेंद्र : सभी धर्मबंधुओं एवं धर्मप्रेमी भाइयों-बहनों से एक विनम्र आत्मचिंतन…

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हमारा जैन धर्म हमें अहिंसा, अनेकांत, अपरिग्रह और “जियो और जीने दो” का मार्ग दिखाता है।

इसीलिए आज आवश्यकता किसी व्यक्ति, पद या संस्था की आलोचना करने की नहीं, बल्कि एक बार स्वयं के भीतर झाँककर देखने की है।

हम सभी का उद्देश्य एक ही है—जैन धर्म की गरिमा, समाज की एकता और आने वाली पीढ़ी का उज्ज्वल भविष्य।

संघ और समाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए व्यवस्था, पद और जिम्मेदारियाँ आवश्यक हैं। उनका सम्मान भी होना चाहिए। लेकिन साथ ही यह भी विचार करें कि कहीं पद और प्रतिष्ठा से अधिक महत्व सेवा, त्याग, तप और धर्माचरण को तो नहीं मिलना चाहिए?

हमारे तीर्थंकर भगवान महावीर की वाणी हमें सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र की ओर ले जाती है।

तो फिर हमारा सबसे बड़ा सम्मान किसका होना चाहिए?

उसका जो पद पर है—या उसका जो धर्म के लिए त्याग और तप कर रहा है?

यह प्रश्न किसी व्यक्ति के लिए नहीं है।

यह प्रश्न हम सभी के लिए है।

दान भी तभी सुंदर बनता है, जब उसमें अहंकार न हो, दिखावा न हो और किसी प्रतिफल की अपेक्षा न हो।

कहा गया है : “सच्चा दान वह है, जिसमें देने वाले को भी अपने दान का अभिमान न रहे।”

आज हमारे समाज को धन की कमी नहीं है।

जरूरत है ऐसे धर्मबंधुओं की, जो अपना समय, अनुभव और सामर्थ्य समाज एवं धर्म की सेवा में निःस्वार्थ भाव से लगाएँ।

एकता ही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है

  • आज जैन समाज पहले से ही संख्या में छोटा है। ऐसे समय में यदि हम आपसी मतभेद, गुटबाजी या मनमुटाव को बढ़ाएँगे, तो नुकसान किसी एक व्यक्ति का नहीं-पूरे समाज का होगा।
  • हमारे विचार अलग हो सकते हैं, लेकिन हमारा धर्म एक है।
  • हमारी पसंद अलग हो सकती है, लेकिन हमारी जड़ एक है।
  • अनेकांत हमें यही सिखाता है कि मत अलग हो सकते हैं, मन अलग नहीं होने चाहिए।
  • इसलिए किसी को हराने के बजाय एक-दूसरे को साथ लेकर चलना ही सच्ची विजय है।

आने वाली पीढ़ी के लिए

हम अपने बच्चों को क्या विरासत देना चाहते हैं?

केवल धन-संपत्ति?

या ऐसा समाज भी, जहाँ वे कह सकें—

“हम अलग-अलग विचार रखते हैं, फिर भी हम एक-दूसरे के साथ खड़े हैं।”

यदि हम एक रहेंगे तो समाज मजबूत होगा।

यदि समाज मजबूत होगा तो हमारी आने वाली पीढ़ी भी धर्म और संस्कारों से मजबूत होगी।

संगठन में ही शक्ति है, एकता में ही समाज की मजबूती है।

दो पंक्तियाँ समाज के नाम

“मतभेद रहें तो विचारों तक रखें, मन में दीवारें न बनाएँ,

जैन समाज को बाँटें नहीं—एक होकर आने वाली पीढ़ी को मजबूत बनाएँ।”

और एक छोटा-सा नारा:

“एकता हमारी शक्ति है - जैन समाज की भक्ति है।”

या:

“धर्म रहे, समाज रहे, हम सबका सम्मान रहे।”

यह संदेश किसी व्यक्ति, पदाधिकारी या संस्था के विरोध में नहीं, बल्कि अपने समाज के प्रति प्रेम और जिम्मेदारी की भावना से लिखा गया है।

यदि मेरे शब्दों से किसी भी धर्मबंधु को जाने-अनजाने ठेस पहुँचे हो तो मैं हृदय से क्षमाप्रार्थी हूँ।

मिच्छामि दुक्कडम्।  जय जिनेंद्र 

पारस भाई कोठारी : सायन, मुंबई

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