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आत्ममीमांसा : राहुलजी ने नई दुनिया को बौद्धिक आँगन बनाया, धंधेबाजी से दूर रखा

आपकी कलम Published by: paliwalwani Updated Mon, 15 Dec 2025 11:48 AM
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आत्ममीमांसा (115)

सतीश जोशी, वरिष्ठ पत्रकार

राजेन्द्र जी माथुर लिखते हैं कि राहुलजी बारपुते की वजह से ही नई दुनिया के साथ अच्छे लोग जुड़े और अखबार लोकप्रिय हुआ। यह बात एकदम सही है। बारपुतेजी 37वर्ष सम्पादक रहे। सबसे बड़ी बात यह है कि राहुलजी की चुम्बक उपस्थिति के कारण यह समाचार पत्र एक ऐसा बौद्धिक एवं सांस्कृतिक आंगन बन गया, जिसकी ओर इस इलाके की हर किस्म की नवोदित प्रतिभा खिंच कर आने लगी। 

इस आँगन का आकर्षण

शायद ही कोई राजनेता, शिक्षा शास्त्री, सामाजिक कार्यकर्ता, कवि, कहानीकार, राजनीतिक समीक्षक, विचारक, संस्कृतिकर्मी, खबरखोजी पत्रकार ऐसा होगा, जिसने इस आंगन का आकर्षण महसूस न किया हो। गुलाब और कैक्टस, अनार और बेर, अपनी समूची उत्कृष्टता में नईदुनिया के कॉलमों में उग सकें, यह श्री राहुल बारपुते के जन्मजात खुलेपन और उनकी उदारता के कारण ही संभव हुआ है। 

राहुलजी ने नई दुनिया बौद्धिक बनाया

अपने से बेहतर लोगों का चुनाव करने में और उन्हें अवसर देने में हिन्दी का पत्रकार प्रायः कृपण हो जाता है, लेकिन राहुलजी ने अखबार को मानों एक बौद्धिक मंच बना दिया, जिसके ऊपर लिखा था कि जो भी बेहतर सोच और  मन में एक सामाजिक सुगबुगाहट हो, वह अन्दर आ सकता है।

ऐसा नहीं होता तो अखबार बढ़ता नहीं

यदि ऐसा नहीं होता तो अखबार बढ़ता नहीं, और यदि प्रसार संख्या की दृष्टि से बढ़ भी जाता, तो वह स्नेह और आदर का पात्र नहीं बनता। इन 37 वर्षों में अच्छा अखबार निकालने की कोई कम कोशिशें इन्दौर या मध्यप्रदेश में या आसपास नहीं हुई, और कई बार वे सफल होती भी लगी। लेकिन यदि ऐसे अधिकांश प्रयास नाकाम हुए, तो इसका कारण शायद यह रहा है कि अखबार के छपते ही सम्पादक से लेकर रिपोर्टर तक की पदेन आवभगत होने लगती है, बढ़ा चढ़ा मान सम्मान मिलने लगता है, और प्रतीति होती है कि बस शिखर पर पहुंच गए। 

राहुलजी शार्टकट से दूर रहे

इस शार्ट कट सफलता के कारण दस बीस साल तक वह धैर्य कोई रख ही नहीं पाता, जो सच्ची उत्कृष्टता के लिए जीवन के हर क्षेत्र में जरूरी है। राहुलजी को पदेन और कृत्रिम यश की कभी चाह नहीं रही, इसलिए नईदुनिया के पत्रकार और प्रबंधक दोनों माह प्रति माह, वर्ष प्रति वर्ष, दशक प्रति दशक, धैर्य रख सके और एक अच्छे अखबार की कल्पना उन्हें लगातार क्षितिज की ओर ठेलती रही।

वे घनिष्ठ अंग बने रहे

इसके बाद राहुलजी प्रधान सम्पादक नहीं, बल्कि वे नईदुनिया के और भी घनिष्ठ अंग बन गए। वे नईदुनिया के स्वामित्व में भागीदार हो गए। बरसों पहले जब स्वामित्व में भागीदारी का प्रस्ताव उनके सामने रखा गया था, तब उन्होंने इस आधार पर इंकार कर दिया था कि प्रधान सम्पादक के नाते उन्हें श्रमजीवी बने रहना चाहिए। 

पदमुक्ति पर माने

जब दुबारा प्रस्ताव रखा गया, तो उनकी शर्त थी कि पहले उन्हें पद मुक्त कर दिया जाए, और वह इस्तीफा मंजूर कर लिया जाए, जो वे महीनों पहले लिख कर दे चुके थे। माथुरजी ने लिखा कितने सम्पादक ऐसी शर्तें लगा सकते हैं?

धंधेबाजी से दूर रखा

राहुलजी ने अपने समूचे कार्यकाल में एक आदर्शमय शुभ्रता अखबार में बनाए रखी। जिस धंधेबाजी में बड़े, मझले और छोटे, सभी अखबार आजकल प्रायः उलझ जाते हैं, उससे उन्होंने नईदुनिया को अंतिम सांस तक भरसक दूर रखा।

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