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योजना बंद, नौकरी चालू... निगम में CMM-CO का ‘बैकडोर खेल’....? : निगम के अपने कर्मचारी 20-25 साल से इंतजार में... बाहर से आए कर्मियों पर मेहरबानी..? : एक और घोटाला ED "लोकायुक्त भी हुए असहाय..?

📅 03 November 2026, 12:55 PM • ✍️ indoremeripehchan.in • ⏱️ 12 मिनट में पढ़ें
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योजना बंद, नौकरी चालू... निगम में CMM-CO का ‘बैकडोर खेल’....? : निगम के अपने कर्मचारी 20-25 साल से इंतजार में... बाहर से आए कर्मियों पर मेहरबानी..? : एक और घोटाला ED "लोकायुक्त भी हुए असहाय..?
योजना बंद, नौकरी चालू... निगम में CMM-CO का ‘बैकडोर खेल’....? : निगम के अपने कर्मचारी 20-25 साल से इंतजार में... बाहर से आए कर्मियों पर मेहरबानी..? : एक और घोटाला ED "लोकायुक्त भी हुए असहाय..?
  • भोपाल से नियुक्त 10 कर्मियों का डे-एनयूएलएम 2024 में खत्म, फिर भी निगम के खजाने से वेतन-सुविधाएं जारी...! 
  • कार, पेट्रोल और ड्राइवर तक की मेहरबानी... जबकि निगम के 20-25 साल पुराने विनियमित कर्मचारी समान वेतन के लिए भटकते रहे।
  • अफसर नेता मिलकर बना रहे"मामा जो नियमों में नहीं वो भी कर गुजर रहे"महापौर पुष्यमित्र भार्गव के कार्यकाल में एक और घोटाला ED "लोकायुक्त भी हुए असहाय..? 
  • इन्दौर मेट्रो, प्रदीप गुर्जर...इन्दौर।

    indoremetro.com

    इन्दौर मेट्रो अखबार अब नगर निगम के उन सफेद चेहरों से पर्दा उठाने जा रहा है जो अपनी ईमानदारी के ढोल पीटते है लेकिन ढोल के पीछे कितनी पोल है यह इस मामले से सामने आ जाएगा... नगर निगम की आर्थिक तंगहाली, वर्षों से सेवा दे रहे विनियमित कर्मचारियों के वेतन और अधिकारों पर सवाल उठते रहे हैं...,

    \लेकिन इसी निगम में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने पूरी व्यवस्था पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं... दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन (डे-एनयूएलएम) के तहत नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग भोपाल से इन्दौर के लिए नियुक्त किए गए सिटी मिशन मैनेजर (CMM) और सामुदायिक संगठकों (CO) का मिशन 30 सितंबर 2024 को खत्म हो गया... इसके बावजूद निगम इन कर्मचारियों को अपने मद से वेतन और सुविधाएं देता रहा..

    मामला सिर्फ वेतन तक सीमित नहीं है...आरोप है कि निगम ने ऐसे कर्मचारियों को कार, पेट्रोल और ड्राइवर जैसी सुविधाएं तक उपलब्ध कराईं गई., जबकि वे मूल रूप से नगर निगम के नियमित अथवा विनियमित कर्मचारी नहीं हैं...उपलब्ध दस्तावेज में पांच CMM और पांच CO यानी कुल दस प्रभावित कर्मियों का उल्लेख है... दस्तावेज में CMM के रूप में निखिल कुलमी, राजवीर धाकड़, दामिनी रावत, कृष्णा बनाइता और प्रभा भास्कर तथा CO के रूप में नितिन जायसवाल, प्रशांत रैकवार, सौरभ गोयल, विष्णु कुमार मालवीय और सुश्री शीला डांगी के नाम दर्ज हैं..।

    योजना खत्म... लेकिन ‘सिस्टम’ क्यों नहीं खत्म हुआ..?

    सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब डे-एनयूएलएम मिशन की अवधि 30 सितंबर 2024 को समाप्त हो चुकी थी.., तो इसके अंतर्गत नियुक्त कर्मचारियों को निगम अपने स्तर से किस आधार पर लगातार भुगतान करता रहा..? नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के आयुक्त की ओर से निगम को जारी पत्र में मिशन की समाप्ति और अनुबंध संबंधी स्थिति स्पष्ट किए जाने के बाद भी भुगतान और कार्य जारी रहने के आरोप हैं.. विभागीय निर्देशों में स्थानीय निकाय को अपनी निधि से भुगतान का निर्णय लेने की गुंजाइश होने की बात सामने आती है.., लेकिन सवाल यह है कि क्या इसके लिए नए पद की विधिवत स्वीकृति, नियुक्ति प्रक्रिया, विज्ञापन और निगम की सक्षम स्वीकृति ली गई..?

    यही वह बिंदु है जहां पूरे मामले की निष्पक्ष जांच जरूरी हो जाती है..।

    निगम के अपने कर्मचारी 20-25 साल से इंतजार में... बाहर से आए कर्मियों पर मेहरबानी..?

    एक तरफ निगम के विनियमित कर्मचारी वर्षों से समान कार्य के लिए समान वेतन और विनियमितीकरण की मांग को लेकर संघर्ष कर रहे हैं.. दूसरी तरफ आरोप है कि मिशन के नाम पर नियुक्त कर्मचारियों को बंद हो चुकी योजना के बाद भी निगम के खजाने से भुगतान किया जाता रहा..विनियमित कर्मचारी संघ का आरोप है कि लंबे समय से निगम में काम कर रहे कर्मचारियों को समान कार्य के लिए समान वेतन देने के मामले में निगम गंभीर नहीं है..

    उनका कहना है कि जिन कर्मचारियों ने वर्षों तक पानी, सफाई, बिजली और दूसरे महत्वपूर्ण काम संभाले.., उनके वेतन में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं हुई.., जबकि मिशन से जुड़े मैनेजर स्तर के कर्मचारियों को करीब 55 से 70 हजार रुपये तक भुगतान किए जाने की बात सामने आ रही है..यानी सवाल सीधा है..निगम के पास अपने वर्षों पुराने कर्मचारियों के अधिकारों के लिए पैसा नहीं, लेकिन बंद हो चुके मिशन के कर्मचारियों के लिए खजाना खुला कैसे..?

    निखिल कुलमी को महापौर का OSD बनाने पर भी सवाल...

    मामले को और गंभीर बनाने वाला तथ्य यह है कि दस्तावेज में दर्ज CMM निखिल कुलमी को महापौर का OSD बनाए जाने को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं..उपलब्ध दस्तावेज में उनके संबंध में विशेष मेहरबानी और पद पर बनाए रखने के प्रयास का आरोप दर्ज है..दस्तावेज में पांच CMM और पांच CO को लेकर पूर्व में की गई शिकायतों का भी उल्लेख है.. इनमें कुछ नामों के संबंध में हाईकोर्ट में याचिका होने तथा कुछ के खिलाफ शिकायतों का जिक्र किया गया है..!

    लोकायुक्त तक पहुंचा मामला... फिर भी ‘खेल’ जारी..?

    सूत्रों का दावा है कि इस पूरे मामले को लेकर शिकायत लोकायुक्त सहित संबंधित जांच एजेंसियों तक भी पहुंची है.. दस्तावेज में शिकायत के बाद वैधानिकता की जांच, लोकायुक्त, EOW, GAD और विधिक विभाग से जुड़े पहलुओं का उल्लेख है..इसी बीच सूत्रों का दावा है कि CMM-CO सहित करीब दर्जनभर कर्मियों को किसी न किसी रास्ते से निगम में बनाए रखने अथवा बैकडोर एंट्री देने की कवायद चल रही है...

    निगम के गलियारों में इस प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक हस्तक्षेप और कथित ‘सेटिंग’ की चर्चाएं भी हैं...हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है...सूत्रों के इन आरोपों में महापौर पुष्यमित्र भार्गव और एमआईसी सदस्य मनीष ‘मामा’ की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं.. यदि किसी स्तर पर राजनीतिक अथवा प्रशासनिक दबाव में नियमों को दरकिनार कर नियुक्ति या भुगतान कराया गया है, तो इसकी जांच होना जरूरी है..!

    ‘मुंह मीठा’ की चर्चा... जांच हुई तो खुलेगा राज..?

    सूत्रों के अनुसार निगम के गलियारों में इस पूरे मामले में कथित आर्थिक लेन-देन और ‘मुंह मीठा’ किए जाने की चर्चाएं भी हैं.. इन आरोपों की पुष्टि के लिए पूरा मामला जांच का विषय है...लेकिन सवाल गंभीर है...यदि योजना खत्म होने के बाद भी भुगतान हुआ, सुविधाएं दी गईं और अब उन्हीं कर्मचारियों को किसी दूसरे रास्ते से निगम में बनाए रखने की तैयारी है.., तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी..?

    MIC के सिर पर जिम्मेदारी डालने की कोशिश..?

    उपलब्ध दस्तावेज में यह भी सवाल उठाया गया है कि शिकायतों और वैधानिकता के सवाल उठने के बाद मामले को MIC के निर्णय की ओर मोड़ने की कोशिश हुई.. आरोप है कि जिम्मेदारी से बचने के लिए निर्णय को महापौर-इन-काउंसिल के पाले में डालने का प्रयास किया गया..यानी सवाल सिर्फ दस कर्मचारियों का नहीं, बल्कि उस पूरी प्रक्रिया का है जिसमें योजना बंद होने के बाद भी भुगतान, पद और सुविधाएं जारी रहीं।

    मनीष शर्मा बोले - ‘मामला मेरे संज्ञान में नहीं’..

  • मामले में एमआईसी सदस्य मनीष शर्मा से पक्ष जानने पर उन्होंने कहा - “मामला मेरे संज्ञान में नहीं है। रही बात प्रस्ताव की, ऐसे प्रस्ताव की जानकारी भी नहीं है।”
  • वहीं नगर निगम के अपर आयुक्त  का कहना है कि शासन की ओर से निर्देश हैं कि मिशन से जुड़े कार्यों के लिए स्थानीय निकाय अपनी निधि से वेतन भुगतान का निर्णय ले सकता है और पीएम स्वनिधि व सामाजिक सुरक्षा जैसी योजनाओं का काम इनके माध्यम से आगे बढ़ाया जा सकता है...लेकिन यही जवाब एक और बड़ा सवाल खड़ा करता है...जब मूल मिशन ही 30 सितंबर 2024 को समाप्त हो चुका था.., तो वर्तमान में इन कर्मचारियों की सेवा किस पद, किस स्वीकृति और किस नियुक्ति प्रक्रिया के तहत चल रही है..?

    अब जांच हो तो सिर्फ कर्मचारियों की नहीं, फैसले लेने वालों की भी हो..!

    यदि जांच में यह सामने आता है कि बिना स्वीकृत पद, बिना विधिवत नियुक्ति प्रक्रिया अथवा सक्षम अनुमति के बंद हो चुके मिशन के कर्मचारियों को लंबे समय तक निगम निधि से भुगतान किया गया.., तो मामला केवल भुगतान की वैधता तक सीमित नहीं रहेगा..ऐसे में भुगतान की जिम्मेदारी तय करने, नियम विरुद्ध दी गई सुविधाओं की वसूली और निर्णय प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों-पदाधिकारियों की भूमिका की जांच भी जरूरी होगी...क्योंकि असली सवाल यह नहीं कि दस CMM-CO को निगम में रखा जाए या नहीं...असली सवाल यह है...योजना भोपाल की थी... नियुक्ति भोपाल से हुई... योजना 2024 में बंद हो गई... फिर दो साल तक इन्दौर नगर निगम के खजाने से वेतन और सुविधाएं किसके आदेश पर चलती रहीं..? 

    और अब सबसे बड़ा सवाल..क्या बंद योजना के कर्मचारियों को ‘बैकडोर’ से निगम का कर्मचारी बनाने की तैयारी हो रही है...? यह सवाल ,जन चर्चा का विषय बन अब निगम के गलियारों में गूंज रहा है ।

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