आयुक्त महोदय... आपकी ईमानदारी कटघरे में नहीं, आपकी खामोशी है...!
अभिषेक मिश्रा
इंदौर.
इंदौर नगर निगम के आयुक्त क्षितिज सिंघल की ईमानदारी पर शायद ही किसी को संदेह हो। नगर निगम के भीतर उनकी पहचान एक साफ-सुथरी और कर्तव्यनिष्ठ छवि वाले अधिकारी की रही है। शायद यही कारण है कि नामांतरण घोटाले में सबसे बड़ी उम्मीद भी शहर को उन्हीं से है। लेकिन इतिहास केवल ईमानदार छवि नहीं देखता, वह कठिन समय में लिए गए निर्णय भी याद रखता है। इसलिए सवाल यह है कि इतने बड़े घोटाले के बाद भी सबसे कठोर कानूनी कदम अब तक क्यों नहीं उठाया गया?
संस्था की बदनामी घोटाले से नहीं, घोटाले पर पर्दा पड़ने के संदेह से होती है। इतने बड़े मामले में कार्रवाई का दायरा केवल छोटे कर्मचारियों तक सिमटता और बड़े स्तर पर सन्नाटा जैसा प्रतीत होने लगा है,हालांकि ये अब फैशन हैं..लेकिन ऐसे में स्वाभाविक रूप से उंगलियां ऊपर की ओर भी उठेंगी। यह किसी अधिकारी के लिए सबसे असहज स्थिति होती है, विशेषकर उस अधिकारी के लिए जिसकी सबसे बड़ी पूंजी उसकी निष्पक्ष और ईमानदार छवि हो।
संपत्तियों की रजिस्ट्रियां केवल कुछ निचले कर्मचारियों की क्षमता से संभव हो गईं। यदि ऐसा नहीं है...
कोई भी यह मानने को तैयार नहीं कि सैकड़ों नामांतरण, सरकारी रिकॉर्ड में व्यवस्थित बदलाव और उसके बाद संपत्तियों की रजिस्ट्रियां केवल कुछ निचले कर्मचारियों की क्षमता से संभव हो गईं। यदि ऐसा नहीं है, तो फिर पूरी श्रृंखला तक पहुंचने का साहस भी दिखाई देना चाहिए। आज शहर आयुक्त क्षितिज सिंघल से किसी सफाई की नहीं, एक निर्णायक संदेश की प्रतीक्षा कर रहा है, जिसमें नगर निगम में पद नहीं, प्रमाण बोलें..प्रभाव नहीं, कानून चले..और इस घोटाले में यदि कोई भी दोषी है, तो उसका कद नहीं, उसका कृत्य देखा जाएगा।
क्योंकि यदि यह संदेश समय रहते नहीं गया, तो कल सवाल घोटाले पर कम और कार्रवाई की निष्पक्षता पर अधिक उठेंगे। और तब नुकसान केवल नगर निगम का नहीं होगा, उस ईमानदार छवि का भी होगा, जिस पर आज पूरा शहर भरोसा करता है।
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