मानसून बनाम मानसून सत्र : कीचड़ की असली कहानी?
व्यंग्य - राजेन्द्र सिंह जादौन
नई दिल्ली. भारत में मानसून का आना हमेशा से जीवन का उत्सव माना गया है। जैसे ही बादल घिरते हैं, धरती की सूखी परतों में हलचल शुरू हो जाती है, बीज फूटने लगते हैं और हरियाली अपनी जगह बनाने लगती है। किसान की आँखों में उम्मीद लौट आती है और प्रकृति बिना किसी शोर-शराबे के अपने काम में लग जाती है। यह वह समय होता है जब सृजन अपने सबसे ईमानदार रूप में दिखाई देता है। लेकिन इसी देश में एक और मानसून आता है, जिसे हम “मानसून सत्र” कहते हैं, और यहाँ से कहानी अचानक बदल जाती है।
मानसून सत्र आते ही कीचड़ का एक अलग ही खेल शुरू हो जाता है। फर्क सिर्फ इतना है कि यह कीचड़ खेतों को उपजाऊ नहीं बनाता, बल्कि बहसों को बंजर कर देता है। यहाँ शब्दों से कीचड़ उछाला जाता है, आरोपों से रास्ते भरे जाते हैं और सच्चाई इतनी फिसलन भरी हो जाती है कि कोई उसे पकड़ना ही नहीं चाहता। जहाँ मानसून में पानी गिरता है तो जीवन उगता है, वहीं मानसून सत्र में शब्द गिरते हैं तो विवाद उगते हैं। यह विडंबना ही है कि एक ही समय में देश दो अलग-अलग दिशाओं में चल रहा होता है एक तरफ प्रकृति सृजन कर रही होती है और दूसरी तरफ व्यवस्था अपने ही बनाए जाल में उलझती जा रही होती है।
आज जब हम विकास की बात करते हैं तो उसका अर्थ भी अजीब तरीके से बदल चुका है। विकास अब सिर्फ सड़कों, स्कूलों और अस्पतालों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वह एक ऐसा शब्द बन गया है, जिसे हर फैसले को सही ठहराने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। अगर जंगल काटे जा रहे हैं तो कहा जाता है कि यह विकास है, अगर नदियों का रास्ता बदला जा रहा है तो कहा जाता है कि यह विकास है, अगर लोगों को उनकी जमीन से हटाया जा रहा है तो भी यही तर्क दिया जाता है कि यह सब राष्ट्रहित में है। सवाल यह नहीं है कि विकास होना चाहिए या नहीं, सवाल यह है कि विकास किसके लिए और किस कीमत पर हो रहा है।
यहाँ सबसे दिलचस्प बात यह है कि जैसे-जैसे सवाल बढ़ते हैं, वैसे-वैसे जवाब कम होते जाते हैं। और जहाँ जवाब नहीं होते, वहाँ एक नया हथियार सामने आता है अंधभक्ति। यह अंधभक्ति हर तर्क को भावनाओं में बदल देती है और हर असहमति को विरोध में बदल देती है। अगर कोई पूछे कि पेड़ क्यों काटे जा रहे हैं तो उसे विकास विरोधी कह दिया जाता है, अगर कोई आदिवासियों के अधिकारों की बात करे तो उसे प्रगति का दुश्मन बताया जाता है और अगर कोई सच्चाई दिखाने की कोशिश करे तो उसकी नीयत पर ही सवाल खड़े कर दिए जाते हैं। इस तरह धीरे-धीरे एक ऐसा माहौल बन जाता है जहाँ सच बोलना सबसे बड़ा जोखिम बन जाता है।
मानसून का कीचड़ अस्थायी होता है, वह कुछ दिनों की बारिश के बाद अपने आप साफ हो जाता है, लेकिन मानसून सत्र का कीचड़ धीरे-धीरे हमारी सोच में जमने लगता है। यह सिर्फ सड़कों या गलियों में नहीं रहता, बल्कि दिमाग और दृष्टिकोण को प्रभावित करता है। यही वजह है कि अब हमें शोर सामान्य लगने लगा है, हंगामा सामान्य लगने लगा है और जवाबदेही का अभाव भी सामान्य लगने लगा है। यह आदत ही सबसे बड़ा खतरा है क्योंकि जब गलत चीजें सामान्य लगने लगती हैं, तब उन्हें बदलने की इच्छा भी खत्म हो जाती है।
कभी इस देश को “सोने की चिड़िया” कहा जाता था, लेकिन आज वही चिड़िया विकास के नाम पर धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही है। उसके पंख काटे जा रहे हैं और उसे यह समझाया जा रहा है कि यह उड़ान के लिए जरूरी है। जंगल कम हो रहे हैं, नदियाँ सिमट रही हैं और हवा का स्वभाव भी बदल रहा है, लेकिन इन सबके बीच हम आंकड़ों और नारों में उलझे हुए हैं। यह एक ऐसा दौर है जहाँ वास्तविकता से ज्यादा उसकी प्रस्तुति महत्वपूर्ण हो गई है। जो दिखाया जा रहा है, वही सच माना जा रहा है और जो सच है, उसे दिखाने की जरूरत ही नहीं समझी जा रही।
आज राजनीति भी किसी इथेनॉल से चलने वाली गाड़ी की तरह हो गई है। वह चल तो रही है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि उसकी दिशा क्या है और उसका ईंधन कब खत्म हो जाएगा। फैसले लिए जा रहे हैं, योजनाएँ बन रही हैं, लेकिन यह समझना मुश्किल होता जा रहा है कि इन सबका अंतिम उद्देश्य क्या है। और अगर उद्देश्य है भी, तो वहाँ पहुँचने तक क्या-क्या खो जाएगा, इसका हिसाब कोई नहीं रख रहा।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि आम जनता अब इस पूरे खेल की आदी होती जा रही है। उसे यह अजीब नहीं लगता कि संसद में बहस की जगह शोर हो, मुद्दों की जगह आरोप हों और नीतियों की जगह प्रचार हो। यह स्वीकृति ही इस कीचड़ को और गहरा बनाती जा रही है। क्योंकि जब जनता सवाल करना बंद कर देती है, तब व्यवस्था जवाब देना भी बंद कर देती है।
मानसून हमें हर साल यह सिखाता है कि सृजन और विनाश दोनों प्रकृति का हिस्सा हैं, लेकिन संतुलन बनाए रखना जरूरी है। वहीं मानसून सत्र हमें यह दिखा रहा है कि जब संतुलन बिगड़ता है तो कीचड़ सिर्फ जमीन पर नहीं, व्यवस्था और सोच दोनों में फैल जाता है। आज जरूरत इस बात की है कि हम इस फर्क को समझें और यह तय करें कि हमें किस तरह का मानसून चाहिए वह जो जीवन दे या वह जो सिर्फ कीचड़ छोड़े।
अगर हम अब भी नहीं समझे, तो शायद आने वाले समय में हरियाली सिर्फ तस्वीरों में रह जाएगी और कीचड़ हमारी पहचान बन जाएगा। और तब हम यही सोचते रह जाएंगे कि गलती मौसम की थी या हमारी।
पालीवाल वाणी WhatsApp चैनल से जुड़ें
ताज़ा ब्रेकिंग न्यूज़ और समाज के सभी समाचार सबसे पहले अपने फोन पर पाएं।
संबंधित खबरें
सभी देखें →
₹60 से ₹70 प्रति किलो तक पहुंची कीमत : सिर्फ ₹35 किलो मिलेगा प्याज : मंहगाई ने तोड़ी जनता की कमर गरीबों का प्याज हुआ गरीबों से दूर