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महिला संगीत के मज़ेदार अनुभव को याद कीजिए...! : महिला संगीत : रिश्तों की अग्निपरीक्षा : मौसा जी लहरा रहे हैं, मौसी शर्मा रही हैं...।

📅 26 July 2026, 08:09 PM ✍️ paliwalwani ⏱️ 11 मिनट में पढ़ें
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महिला संगीत के मज़ेदार अनुभव को याद कीजिए...! : महिला संगीत : रिश्तों की अग्निपरीक्षा : मौसा जी लहरा रहे हैं, मौसी शर्मा रही हैं...।
महिला संगीत के मज़ेदार अनुभव को याद कीजिए...! : महिला संगीत : रिश्तों की अग्निपरीक्षा : मौसा जी लहरा रहे हैं, मौसी शर्मा रही हैं...।

शादियाँ आजकल केवल दूल्हों की जान ही नहीं सुखा रही है, बल्कि रिश्तेदारों की भी परीक्षा ले रही है...। महिला संगीत में नाचने के अनुरोध के कारण...! ढोल पर जैसे तैसे मटकी और भांगड़ा करने वाली पीढ़ी को मंच पर नाचना होता है। यह आग के दरिया से डूब कर जाने जैसा होता है...।

पहले कुछ बच्चे आकर इधर-उधर का कुछ नाच जैसा कर देते हैं...। तब तक जनता का पूरा ध्यान खाने पर रहता है ...! पहले पेट पूजा, फिर काम दूजा...! फिर शुरू होता है असली खेल...।

पैसे देकर बुलाया गया एंकर चीखते हुए दूल्हे/दुल्हन के भाइयों को बुलाता है...। एक सस्ता सा शेर या जुमला फेंककर वह ताली बजवाने का पहला असफल प्रयास करता है...।

भाई लोग बेचारे नाचते कम हैं, उछलते-कूदते ज़्यादा हैं...। फिल्मों में देखे हीरो की तरह चमकीले कुर्ते-पजामे और दुपट्टा डालने से हकीकत नहीं बदलती...। इतनी मेहनत की भाइयों को आदत नहीं है...। बेचारे पसीने पसीने हो कर रिल डालने के बहाने से चल देते है...।

महिला संगीत में अब महिलाएं  पहली बार आती हैं...। बहनों को बुलाया जाता है...। यूट्यूब से देखकर सीखा डांस सबसे छोटी बहन या बेटी जैसे-तैसे सिखा-पढ़ाकर तैयार करवाती है...। पर वीडियो और असल में यही अंतर होता है ...। वीडियो कहीं भी रोक सकते हैं, पर मंच पर यह संभव नहीं...। एक दीदी के घुटनों में दर्द रहता है...। दूसरी के छोटे बच्चे मंच पर चढ़ चुके हैं और अपनी मां के आसपास डोल रहे हैं...। 

मां बेचारी बच्चों को हटाने में स्टेप भूल गई है...। डांस तैयार करवाने वाली दीदी इशारों में भूली गई स्टेप बता रही है...। पर कुछ नहीं हो सकता...। जैसे-तैसे बार-बार बदलते गानों पर कोई अपनी स्टेप उधर, कोई इधर करके बात संभालती हैं...। दीदियों के पति महाशय इधर-उधर मुंह छुपा रहे हैं...। क्योंकि “ बाकी सब तो नाच रहे है, बस आप ही नाटक करते हो...!" की धमकी के साथ उनका नंबर भी आने वाला है...। 

एक ताज़ा-ताज़ा जीजू ज़रूर फोन में वीडियो बनाते हैं, जोश में ताली भी बजाते हैं...। उनका उत्साह और उससे अधिक उनके चमकीले कपड़े देखकर लगता है कि अगली प्रस्तुति उन्हीं की होने वाली है...। कुछ देर बाद एंकर ज़ोर से ताली बजाने का दसवीं बार आग्रह कर मौसी-मौसा जी को बुला लेता है...। गाना पुराना लिया गया है, ताकि उनकी और गाने की गति सम पर आ जाए...।

इससे पहले मंच पर जाने का कोई मौका नहीं बना था, इसलिए  मौसी का ब्लडप्रेशर बढ़ा हुआ है...। मौसा जी तो "दवाई" लेकर आए हैं...। उनके भीतर का एंग्री यंग मैन बाहर आने को बेताब है...। पर अफसोस, गाना बज नहीं पा रहा...। बच्चे कोशिश में हैं पर कोई तकनीकी दिक्कत है...। मौसा जी लहरा रहे हैं, मौसी शर्मा रही हैं...। अचानक ज़ोर से गाना बज उठता है...। दोनों को कुछ समझ नहीं आता, मुखड़ा आगे बढ़ चुका है...। फिर नाचना शुरू होता है...। 

जीवन भर पत्नी को घर में भी "बच्चों की मां" बुलाने वाले मौसा जी मंच पर मौसी का हाथ नहीं पकड़ पाते...! अंगुलियां छूकर स्टेप पूरी करते हैं...। और दवाई की प्रेरणा के बाद भी, दूर-दूर से ही एक साथ रोमांटिक नृत्य हो जाता है...।

मामा-मामी, चाचा-चाची, सबकी यही कहानी बनती है...। महिलाएं तो फिर भी छोटी-मोटी कोशिश कर लेती हैं, पर पुरुष कमर पर हाथ रखने और इधर-उधर घूमने के अलावा कुछ खास कर नहीं पाते...। बेचारे कभी स्कूल के वार्षिक उत्सव में भी नहीं नाचे और यहां पीटी टीचर या ट्रैफिक पुलिस बने मंच पर है...। पर स्मार्ट फोटोग्राफर के कारण कुछ फोटो तो बन ही जाते हैं, जिन्हें कल फैमिली ग्रुप में भेजा जा सकता है...।

एंकर अब हाथ उठाकर ताली बजाकर दिखाता है...। उसे लगता है शायद लोग उसकी बात समझ नहीं पा रहे, कि ताली बजाना किसे कहते हैं...। वह इशारों में समझाने का प्रयास करता है, पर नतीजा वही रहता है...। वह भैया भाभी को बुलाता है...। भैया पुराने शौकीन हैं, नाचने के...। वे तो पड़ोस से गुज़रती पराई बारात में भी नाच लेते हैं...। नृत्य के नागिन घराने के माहिर कलाकार हैं...।

रोमांटिक गानों के गुलदस्ते पर नाच शुरू होता है...। भैया के चेहरे के भाव और फिल्मी हीरो जैसी कलाकारी पर सीटियां बजने लगती हैं...। उधर बेचारी भाभी सारे ससुराल के सामने यह सब देखकर सकुचा रही हैं...। भैया हैं कि मानते नहीं, बार-बार हाथ पकड़ते हैं, बाहों में लेने की कोशिश करते हैं...। भाभी करंट लगने जैसी प्रतिक्रिया देकर दूर जा रही हैं...। पर चलो, आखिर गाना खत्म होता है...। भैया खुश हैं, भाभी शरम से पानी-पानी...!

अब एंकर भी पैंतरा बदलकर हल्की शायरी पर उतर आया है...। फर्क फिर भी नहीं पड़ता, मजमा ताली से खाली ही रहता है...। इधर गहरे रंग के कुर्ते पर महरून जैकेट पहने एक फूफा जी कविता सुनाने लगते हैं...। मंच के कवियों को देखकर सीखी अदाएं कविता के साथ घातक सिद्ध होती हैं...। कविता जारी है, लोग आपस में बात करने लगे हैं, उठकर जा रहे हैं...। माहौल बिगड़ता देख कवि महोदय अपने ससुराल वालों की ओर हाथ करके सुनाए जाते हैं...। वे बेचारे मजबूरी में फंसे हैं...। 

दामाद को दहेज़ के बाद दाद भी देनी पड़ेगी, उन्होंने कभी सोचा ही न था...। जैसे-तैसे कविता खत्म होती है...। तो दूसरे वाले, पुराने ऑर्केस्ट्रा पार्टी के गायकों जैसे कोट पहने, चश्मा लगाए हाज़िर हो जाते हैं...। वे रुककर साउंड वाले को डांटते हुए इको बढ़वा लेते हैं...। दो पैग और कराओके का रियाज सामने आता है...। वे आंखें बंद कर सुर छेड़ते नहीं बस छोड़ ही देते हैं...। 

मुंह में कुनैन की गोली रखने जैसा भाव बनाकर गाते रहते हैं...। पल-पल करके उनका पल-पल दिल के पास खत्म होता है, और वे मंच से दूर होते हैं...। आखिर में पापा-मम्मी की बारी है...। मम्मी थकी हैं, पर बच्चों ने उत्साह से डांस तैयार करवाया है...। राजस्थानी गाने पर रजवाड़ी जैसा कोई स्टेप कर मम्मी तो बच जाती हैं...। बेचारे पापा...! मंच पर प्रपंच नहीं कर पाते, और बस दोनों हाथ उठाकर हिला देते हैं...। जैसे फिल्मों में पुलिस के घेर लेने पर विलेन लोग करते हैं...।

अंत में दूल्हा-दुल्हन आते हैं...। सारी जहमत तो इन्हीं के फोटो के लिए हुई है...। दोनों एक जैसे रंग के कपड़ों में हीरो-हीरोइन जैसे स्टेप करते हैं...। भाभियां देखकर मुंह बना रही हैं कि हमें तो सूट भी नहीं पहनने देते, और इन्हें देखो...!

एंकर बेचारा अब अंग्रेज़ी में बोलने लगा है...। उसे लग रहा है, शायद ये लोग अंग्रेज़ी समझ लेंगे, और उसके बोलते ही ऑस्कर सेरेमनी की तरह खड़े होकर ताली बजाएंगे...। पर फिर कुछ नहीं होता...!  दूल्हा-दुल्हन फोटो में व्यस्त हो जाते हैं...। बाकी लोग प्रदर्शन करने वालों की झूठी प्रशंसा करने चल देते हैं...। 

एंकर बेचारा निराश है, पर मिलने वाले पैसे उसकी हिम्मत अगले कार्यक्रम में जाने लायक तो बना ही देते हैं...। मंच पर नाचने का दबाव अब खत्म हो चुका है...। नीचे खड़े होकर हाथ-पैर हिला रहे आनंदित लोग अब खुलकर नाच रहे हैं...। असली उत्साह और खुशी फूट फूट कर निकलने लगती है...। और बाकी लोग सोचते रह जाते हैं कि रिश्ते निभाने में सच में बहुत नाच नाचने पड़ते हैं...।

विश्वास व्यास,  इंदौर 

प्रभात किरण के माननीय संपादक जी और प्रिय मित्र Abhishek Kanungo का आभार

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