राजनीति ही खाता और राजनीति ही पीता है इंडिया !
लोकसभा के आम चुनाव के बाद भी देश में कहीं न कहीं चुनाव हर समय होते रहते हैं। उदाहरण के लिए इस साल बंगाल, बिहार, तमिलनाडु, केरल और पुद्दुचेरी में विधानसभा चुनाव हुए तो अगले साल 7 राज्यों में फिर से चुनाव होंगे। इसके अलावा कहीं नगर निकाय चुनाव तो कहीं पंचायत चुनाव। कहीं छात्रसंघ चुनाव तो अब विधान परिषद चुनाव। कुल मिलाकर कहें तो 150 करोड़ का यह देश 12 महीने 365 दिन चुनावमय रहता है। जिन दिनों चुनाव न हों, चुनाव तैयारियों का शोर रहता है। फिर चुनाव का शोर और फिर अगले किसी चुनाव से पहले तक जीत हार की समीक्षा का महा लंबा दौर ।
श्रद्धांजलि समारोह में, ये शैतान राजनीति हमारा आपका पीछा नहीं छोड़ती
कुल मिलाकर कहें तो यह देश चुनाव ही खाता है, चुनाव पीता है और चुनाव में ही जीता है। चाय की दुकानों, चौपालों, ब्याह बारातों, सार्वजनिक आयोजनों आदि में राजनीति की चर्चा में काफी समय बीत जाता है। आप श्मशान पर हों अथवा श्रद्धांजलि समारोह में, ये शैतान राजनीति हमारा आपका पीछा नहीं छोड़ती। यह दर्शाता है कि विश्व में हम सबसे बड़े लोकतंत्र ही नहीं हैं। हम जीवंत लोकतंत्र हैं, अपने कर्तव्यों के लिए तो नहीं, पर अधिकारों के लिए सजग लोकतंत्र हैं। घर हो, दफ्तर हो, दुकान हो, शिक्षण संस्थान अथवा व्यवसायिक प्रतिष्ठान ; राजनीति हमारा पीछा नहीं छोड़ती।
पता नहीं हम राजनीति को जीने नहीं देते या राजनीति हमें मरने नहीं देती। राजनीति का ही कमाल है कि बड़े बड़े कमाई वाले पद छोड़कर लोग राजनीति में आ जाते हैं। शानदार नौकरियां छोड़कर लोग झाड़ू वाली पार्टी बन जाते हैं। यह राजनीतिक चकल्लस ही है कि विदेशों में पढ़ रहे लड़के लड़कियां खुशी खुशी काकरोच बन जाते हैं। राजनीति का भूत हमारे युवाओं पर इस कदर हावी है कि वे शरजील इमाम, उमर खालिद, बुरहान बानी जैसे आतंकवादियों के गुलाम बन जाते हैं, पाकिस्तान के दास बन जाते हैं और टुकड़े टुकड़े गैंग में बदल जाते हैं। यह राजनीति ही है जो हमारे लोगों को मार्क्स, लेनिन, स्टालिन और माओवाद का जड़ खरीद गुलाम बनाती है। राजनीति ही है जो हमारे देश के नागरिकों को राम कृष्ण, अयोध्या, मथुरा, काशी से नफरत करना सिखाती है ।
राजनीति दिलों में इस कदर नफरत भरती है कि जनता द्वारा निर्वाचित प्रधानमंत्री को उखाड़ने के षडयंत्र रचे जाते हैं। कुछ लोगों को राजनीति ने सिखाया है कि सत्ता देशवासियों की नहीं, बड़े खानदानों की धरोहर है। इन दरबारों के वारिस मूर्ख हों, द्रोही हों, घृणा के कूप हों, तो भी सत्ता उनकी खानदानी जागीर है। चुनाव में उन्हें सत्ता न मिले तो उन्हें सड़क पर भीड़ के सहारे सत्ता पाने का अधिकार है। देश का बड़ा व्यापारी वर्ग रोजी रोटी की दुहाई दे , फिर भी वे शहजादे हैं, उन्हें पेट पर ठोकर लगाने का अधिकार है । वे बड़े लोग हैं , राजनीति उनका शगल है, सत्ता उनकी दादलाई सल्तनत है। वाह री राजनीति तेरे रंग हजार ... बार बार लगातार ....
"इतिहास की गहराइयाँ हों या आज की राजनीति, सच को बेबाकी से कहना ही मेरी पहचान है। अगर आप भी तथ्यों और निष्पक्ष विश्लेषण के साथ जुड़ना चाहते हैं, तो इस सफर का हिस्सा बनें। ऐसे ही और बेबाक विचारों के लिए मुझे फॉलो करें और अपनी राय कमेंट में ज़रूर साझा करें।
अवधेश प्रताप सिंह : कानपुर, उत्तर प्रदेश M. 9451221253
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