कैसा ये 'कृषक कल्याण वर्ष', जब किसानों को सड़कों पर उतरना पड़ा?
व्यंग्य – राजेन्द्र सिंह जादौन
भोपाल की ओर हजारों किसानों का मार्च क्यों हुआ?
लेकिन सवाल यह है कि यदि किसान इतना खुशहाल हो गया है, तो फिर राजधानी भोपाल की ओर हजारों किसानों का मार्च क्यों हुआ? आखिर पुलिस को भोपाल की सीमाएं बैरिकेडों से क्यों बंद करनी पड़ीं? किसानों को रोकने के लिए जगह-जगह पुलिस बल क्यों तैनात करना पड़ा? क्या यही कृषक कल्याण वर्ष की सबसे बड़ी उपलब्धि है?
सरकार ने वर्ष की शुरुआत में दावा किया था कि किसानों की आय बढ़ाना प्राथमिकता होगी। लेकिन आधा वर्ष गुजरने के बाद किसान आज भी अपनी उपज का उचित मूल्य पाने के लिए संघर्ष कर रहा है। मूंग की खरीदी इसका सबसे बड़ा उदाहरण बन गई। प्रदेश के कई जिलों हरदा, नर्मदापुरम, सीहोर, विदिशा, देवास, रायसेन और अन्य इलाकों के किसानों ने आरोप लगाया कि उनकी पूरी उपज समर्थन मूल्य पर नहीं खरीदी जा रही। कई किसानों का पंजीयन होने के बावजूद खरीदी सीमित कर दी गई। नतीजा यह हुआ कि किसान अपनी मांग लेकर सड़कों पर उतर आया।
जिस राजधानी में किसान सम्मान सम्मेलन होने चाहिए थे, वहां किसानों को प्रवेश से पहले पुलिस की बैरिकेडिंग का सामना करना पड़ा। जिस सरकार ने किसान कल्याण का वर्ष घोषित किया, उसी सरकार के कार्यकाल में किसान अपनी फसल बचाने के लिए आंदोलन करता दिखाई दिया। लोकतंत्र में विरोध करना अपराध नहीं है, लेकिन यदि किसान को अपनी उपज बेचने के लिए भी धरना देना पड़े, तो निश्चित ही व्यवस्था पर सवाल उठेंगे।
किसान का दर्द केवल मूंग तक सीमित नहीं है। खेती की लागत लगातार बढ़ती जा रही है। डीजल महंगा है। खाद और बीज महंगे हैं। कीटनाशकों की कीमतें बढ़ चुकी हैं। बिजली की समस्या अलग है और सिंचाई का खर्च अलग। मजदूरी भी पहले से अधिक हो चुकी है। ऐसे में किसान उम्मीद करता है कि कम से कम उसकी फसल उचित मूल्य पर बिक जाएगी। लेकिन जब खरीदी में देरी होती है, भुगतान अटकता है या मात्रा सीमित कर दी जाती है, तब किसान को मजबूर होकर व्यापारियों के हाथों कम कीमत पर फसल बेचनी पड़ती है।
कृषि अर्थशास्त्र का एक सीधा सिद्धांत है यदि लागत बढ़े और आमदनी न बढ़े तो घाटा तय है। यही आज मध्य प्रदेश के अनेक किसानों की वास्तविकता है। सरकारी भाषणों में आय दोगुनी करने की बात वर्षों से चल रही है, लेकिन गांवों में किसान आज भी बैंक का कर्ज, सहकारी समिति का बकाया और साहूकार का हिसाब चुकाने में उलझा हुआ है।
स्थिति यहां तक पहुंच रही है कि कई किसान अपनी कृषि भूमि बेचने पर मजबूर हो रहे हैं। गांवों के आसपास जमीनों की खरीद-फरोख्त तेजी से बढ़ रही है। जहां किसान मजबूरी में बेच रहा है, वहीं भू-माफिया अवसर तलाश रहे हैं। खेती यदि लाभ का व्यवसाय होती, तो किसान अपनी पुश्तैनी जमीन बेचने के बजाय उसे और बढ़ाने की कोशिश करता। लेकिन जब खेत से परिवार का खर्च नहीं निकलता, तब जमीन ही आखिरी पूंजी बन जाती है।
विडंबना देखिए, सरकार किसान को "अन्नदाता" कहती है, लेकिन वही अन्नदाता अपनी उपज बेचने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाता है। किसान खेत में मौसम से लड़ता है, मंडी में व्यवस्था से लड़ता है और अंत में अपनी ही सरकार से न्याय मांगता है।
आज गांवों में एक नया मजाक चल पड़ा है। लोग कहते हैं कि किसान कल्याण वर्ष में किसान का सबसे बड़ा कल्याण यह हुआ कि उसे आंदोलन करने का नया अनुभव मिल गया। पहले किसान मौसम से डरता था, अब पोर्टल से डरता है। पहले ओलावृष्टि की चिंता होती थी, अब स्लॉट बुकिंग और पंजीयन की चिंता होती है। पहले फसल बचाने की लड़ाई थी, अब खरीदी बचाने की लड़ाई है।
सरकार का पक्ष भी है। सरकार कहती है कि समर्थन मूल्य पर रिकॉर्ड खरीदी हो रही है, किसानों के खातों में हजारों करोड़ रुपये भेजे जा रहे हैं, सिंचाई परियोजनाओं का विस्तार हो रहा है, प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है और नई तकनीकों से उत्पादन बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। ये प्रयास महत्वपूर्ण हैं, लेकिन किसी भी योजना का मूल्यांकन सरकारी प्रेस नोट से नहीं, बल्कि किसान के चेहरे की मुस्कान से होता है।
यदि किसान आंदोलन कर रहा है, तो यह संकेत है कि कहीं न कहीं संवाद की कमी है। यदि किसान राजधानी तक पहुंच रहा है, तो इसका अर्थ है कि स्थानीय स्तर पर उसकी बात नहीं सुनी गई। यदि पुलिस को किसानों को रोकना पड़ रहा है, तो यह प्रशासनिक सफलता नहीं, बल्कि व्यवस्था की असफलता का संकेत भी माना जाएगा।
कृषक कल्याण वर्ष का अर्थ केवल कार्यक्रमों की संख्या बढ़ाना नहीं होना चाहिए। इसका अर्थ यह होना चाहिए कि किसान की लागत घटे, समय पर खाद मिले, सिंचाई की व्यवस्था मजबूत हो, प्राकृतिक आपदा में तुरंत राहत मिले, समर्थन मूल्य पर पूरी उपज खरीदी जाए और भुगतान निर्धारित समय में किसान के खाते में पहुंच जाए। यदि ये मूल बातें पूरी नहीं होतीं, तो बाकी सारी घोषणाएं केवल सरकारी फाइलों की शोभा बनकर रह जाती हैं।
आज प्रदेश का किसान किसी विशेष सुविधा की मांग नहीं कर रहा। वह केवल इतना चाहता है कि उसकी मेहनत का उचित मूल्य मिले। उसे अपनी फसल बेचने के लिए सड़कों पर बैठना न पड़े। उसे अपनी बात कहने के लिए राजधानी की ओर कूच न करना पड़े। उसे पुलिस के बैरिकेड नहीं, मंडियों के खुले दरवाजे मिलें।
सरकारों का मूल्यांकन घोषणाओं से नहीं, परिणामों से होता है। यदि कृषक कल्याण वर्ष में ही किसान सबसे अधिक परेशान दिखाई दे, तो विपक्ष सवाल उठाएगा, मीडिया लिखेगा और इतिहास भी इसे दर्ज करेगा। किसान किसी दल का नहीं होता, वह खेत का होता है। उसकी समस्या का समाधान राजनीतिक बहस नहीं, प्रशासनिक संवेदनशीलता से निकलता है।
अभी भी समय है। सरकार किसानों के संगठनों से खुली बातचीत करे, मूंग सहित सभी खरीफ फसलों की खरीदी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाए, भुगतान में देरी समाप्त करे, लागत कम करने के ठोस कदम उठाए और जिला स्तर पर शिकायतों का त्वरित समाधान सुनिश्चित करे। यदि ऐसा होता है, तो कृषक कल्याण वर्ष केवल सरकारी घोषणा नहीं, बल्कि किसानों के जीवन में वास्तविक परिवर्तन का वर्ष बन सकता है।
लेकिन यदि वर्ष समाप्त होने तक भी किसान आंदोलन करता रहा, फसल औने-पौने दाम पर बिकती रही, खेती घाटे का सौदा बनी रही और किसान अपनी जमीन बेचने को मजबूर होता रहा, तो आने वाली पीढ़ियां शायद इस वर्ष को किसी और नाम से याद करेंगी। वे लिखेंगी कि "यह वह वर्ष था जिसे सरकार ने कृषक कल्याण वर्ष कहा था, लेकिन किसान उसे आंदोलन वर्ष कहने पर मजबूर हो गया।" अंतिम पंक्ति भी शायद यही होगी "सरकार ने किसान वर्ष मनाया, किसान ने धरना वर्ष बिताया, और भू-माफिया ने अवसर वर्ष मना लिया।"
नोट: यह एक व्यंग्यात्मक लेख है। इसमें व्यक्त विचार सार्वजनिक घटनाओं और नीतियों पर लेखक की टिप्पणी हैं।
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