BRICS की बढ़ती ताकत से अमेरिका बेचैन? भारत के सोलर पैनलों पर भारी टैरिफ लगाने की तैयारी
हाल ही में संपन्न हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की अभूतपूर्व सफलता और वैश्विक आर्थिक परिदृश्य पर इसके बढ़ते प्रभावों के बीच, अमेरिका ने भारत से आयात होने वाले सौर पैनलों पर भारी शुल्क लगाने की तैयारी शुरू कर दी है। इस कदम को ब्रिक्स समूह की बढ़ती ताकत और वैश्विक मंच पर भारत की सशक्त भूमिका से अमेरिका की कथित बेचैनी के तौर पर देखा जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (USTR) इस संबंध में गहन विचार-विमर्श कर रहा है और जल्द ही कोई बड़ा फैसला सामने आ सकता है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब वैश्विक व्यापार में संरक्षणवाद की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है और बड़े देश अपने घरेलू उद्योगों को बचाने के लिए नए-नए तरीके अपना रहे हैं।
भारतीय सोलर उद्योग पर क्या होगा असर?
यदि यह टैरिफ लागू होता है, तो इसका सीधा असर भारत के तेजी से बढ़ते सौर ऊर्जा उद्योग पर पड़ेगा। भारत, जो अपनी अक्षय ऊर्जा क्षमता को बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है और 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान के तहत घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा दे रहा है, उसके लिए यह एक बड़ी चुनौती साबित हो सकती है। भारतीय सौर पैनल निर्माताओं को अमेरिकी बाजार में अपनी प्रतिस्पर्धात्मकता बनाए रखने में मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है, जिससे उनके निर्यात पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। यह कदम ऐसे समय में उठाया जा रहा है जब भारत वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में अपनी स्थिति मजबूत करने का प्रयास कर रहा है और अमेरिका के साथ व्यापार संतुलन को बेहतर बनाने की दिशा में काम कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह अमेरिका की ओर से एक रणनीतिक दबाव बनाने की कोशिश भी हो सकती है।
भारत सरकार की क्या है तैयारी?
इस संभावित व्यापारिक बाधा से निपटने के लिए भारत सरकार के संबंधित विभाग सक्रिय हो गए हैं। वाणिज्य मंत्रालय और विदेश मंत्रालय इस पूरे घटनाक्रम पर पैनी नजर रख रहे हैं और कूटनीतिक तथा व्यापारिक स्तर पर आवश्यक कदम उठाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। भारत हमेशा से ही निष्पक्ष व्यापार का समर्थक रहा है और इस तरह के एकतरफा व्यापारिक प्रतिबंधों का विरोध करता रहा है। सरकार भारतीय निर्यातकों के हितों की रक्षा के लिए सभी संभावित विकल्पों पर विचार कर रही है, जिसमें विश्व व्यापार संगठन (WTO) में शिकायत दर्ज कराना भी शामिल हो सकता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि अमेरिका का यह कदम दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों और वैश्विक भू-राजनीति को किस दिशा में ले जाता है, खासकर ऐसे समय में जब दोनों देश कई अन्य मोर्चों पर सहयोग कर रहे हैं।
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