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उत्तर प्रदेश में गन कल्चर और बाहुबलियों की सरकारी सुरक्षा पर हाईकोर्ट सख्त : कोर्ट ने पूछा- हथियारों का प्रदर्शन क्यों?

उत्तर प्रदेश Published by: paliwalwani Updated Sat, 23 May 2026 10:32 AM
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बृजभूषण, राजा भैया समेत 19 की क्राइम कुंडली मांगी

हलफनामे में पेश आंकड़ों पर कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई

उत्तर प्रदेश.

उत्तर प्रदेश में बढ़ते ‘गन कल्चर’ और आपराधिक छवि वाले प्रभावशाली लोगों को जारी शस्त्र लाइसेंसों पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है. कोर्ट ने राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन से सवाल किया है कि गंभीर आपराधिक मामलों में नामजद बाहुबलियों और दबंग नेताओं को आखिर किन आधारों पर हथियारों के लाइसेंस दिए गए. हाईकोर्ट ने बृजभूषण शरण सिंह, राजा भैया, धनंजय सिंह, विनीत सिंह और बृजेश सिंह समेत 19 चर्चित नामों का पूरा रिकॉर्ड तलब करते हुए पूछा है कि उनके खिलाफ कितने मुकदमे दर्ज हैं, किस परिस्थिति में लाइसेंस जारी हुए और उन्हें किस स्तर की सरकारी सुरक्षा उपलब्ध कराई गई है.

दरअसल, संतकबीर नगर निवासी जयशंकर ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक याचिका दाखिल कर आरोप लगाया कि प्रदेश में शस्त्र लाइसेंस जारी करने और उनके नवीनीकरण की प्रक्रिया में नियमों का पालन नहीं किया जा रहा है. याचिका में कहा गया कि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले कई लोग हथियारों के लाइसेंस लेकर खुलेआम उनका प्रदर्शन करते हैं, जिससे समाज में भय का माहौल बन रहा है और ‘गन कल्चर’ को बढ़ावा मिल रहा है. मामले की सुनवाई जस्टिस विनोद दिवाकर की अदालत में हुई. सुनवाई के दौरान प्रदेश सरकार की ओर से दाखिल हलफनामे में पेश आंकड़ों को देखकर कोर्ट ने भी गंभीर चिंता जताई.

राज्य सरकार की ओर से कोर्ट को बताया गया कि उत्तर प्रदेश में इस समय 10 लाख 8953 शस्त्र लाइसेंस धारक हैं. इनमें 6062 ऐसे लोग हैं जिनके खिलाफ दो या उससे अधिक आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं. सरकार ने यह भी बताया कि 23,407 लाइसेंस अभी लंबित हैं, जबकि 20,960 परिवार ऐसे हैं जिनके पास एक से ज्यादा हथियारों के लाइसेंस मौजूद हैं. इन आंकड़ों ने कोर्ट की चिंता और बढ़ा दी. कोर्ट ने सवाल उठाया कि आखिर जिन लोगों पर गंभीर आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं, उन्हें हथियार रखने की अनुमति कैसे दी गई?

हाईकोर्ट ने जिन चर्चित लोगों का रिकॉर्ड तलब किया है, उनमें कई बड़े राजनीतिक और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले चेहरे शामिल हैं. कोर्ट ने बृजभूषण शरण सिंह, राजा भैया, धनंजय सिंह, बृजेश सिंह, विनीत सिंह, अब्बास अंसारी, खान मुबारक, अजय प्रताप सिंह उर्फ अजय सिपाही, संजय सिंह सिंगला, अतुल वर्मा, मोहम्मद साहब, सुधाकर सिंह, गुड्डू सिंह, अनूप सिंह, लल्लू यादव, बच्चू यादव और जुगनू वालिया समेत अन्य नामों का पूरा ब्योरा मांगा है. अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि इन सभी के सही पते, उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक मुकदमों का विवरण, जारी शस्त्र लाइसेंस की जानकारी और उपलब्ध कराई गई सुरक्षा संबंधी पूरा रिकॉर्ड पेश किया जाए.

कोर्ट ने पूछा- हथियारों का प्रदर्शन क्यों?

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने हथियारों के सार्वजनिक प्रदर्शन पर भी सख्त नाराजगी जताई. कोर्ट ने कहा कि कई जगहों पर लाइसेंसी हथियारों का खुलेआम प्रदर्शन किया जाता है, जिससे समाज में गलत संदेश जाता है. खासकर सोशल मीडिया पर हथियारों के साथ फोटो और वीडियो डालने का ट्रेंड लगातार बढ़ा है. हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन से पूछा है कि ऐसे मामलों में अब तक क्या कार्रवाई की गई और लाइसेंस के दुरुपयोग को रोकने के लिए क्या व्यवस्था है. 

सुनवाई के दौरान सबसे अहम बात यह रही कि प्रदेश सरकार की ओर से दाखिल हलफनामे में कई चर्चित बाहुबलियों और आपराधिक छवि वाले लोगों के नाम शामिल नहीं थे. इस पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि जिन व्यक्तियों की पहचान बाहुबली या अपराध से जुड़ी रही है, उनका पूरा रिकॉर्ड भी अदालत के सामने पेश किया जाना चाहिए. इसके बाद कोर्ट ने अलग से 19 लोगों की सूची तैयार कर उनके खिलाफ दर्ज मामलों, आपराधिक इतिहास और शस्त्र लाइसेंस से जुड़ी विस्तृत जानकारी तलब कर ली.

सुरक्षा और लाइसेंस दोनों पर सवाल

हाईकोर्ट ने सिर्फ शस्त्र लाइसेंस ही नहीं, बल्कि इन बाहुबलियों को मिली सरकारी सुरक्षा पर भी सवाल उठाए हैं. कोर्ट जानना चाहता है कि जिन लोगों के खिलाफ गंभीर मुकदमे हैं, उन्हें सरकारी सुरक्षा किस आधार पर दी गई. साथ ही क्या सुरक्षा और हथियार दोनों साथ होने से कानून व्यवस्था पर असर पड़ता है?

क्या रद्द हो सकते हैं लाइसेंस?

हाईकोर्ट की सख्ती के बाद अब यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि क्या आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों के शस्त्र लाइसेंस रद्द किए जा सकते हैं? कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि अगर जांच में नियमों के उल्लंघन या गलत जानकारी देकर लाइसेंस लेने की बात सामने आती है तो प्रशासन कार्रवाई कर सकता है. हालांकि अंतिम फैसला कोर्ट और प्रशासनिक जांच पर निर्भर करेगा. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपर मुख्य सचिव गृह, पुलिस विभाग और सभी जिलों के अधिकारियों से विस्तृत जवाब मांगा है.

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