उत्तर प्रदेश. सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार 30 सितंबर 2026 को एक एफआईआर से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए उत्तर प्रदेश पुलिस को कड़ी फटकार लगाई. जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की सुप्रीम कोर्ट बेंच ने एक आपराधिक मामले की जांच में कथित अनियमितताओं पर नाराजगी जताते हुए कहा कि अगर इसी तरह से मामलों को संभाला जाएगा तो लोग पुलिस पर भरोसा कैसे करेंगे. इस दौरान कोर्ट ने बेहद सख्त लहजे में कहा कि इससे तो अच्छा है कि हम यूपी पुलिस को ही खत्म कर दें और उसकी सभी जांचों में CBI को शामिल करने के लिए कहें.
दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने यह पाया कि FIR में उस व्यक्ति का नाम दर्ज नहीं किया गया, जिसे शिकायतकर्ता ने कथित तौर पर मौके पर पकड़कर पुलिस के हवाले किया था. FIR में आरोपी की जगह ‘अज्ञात’ लिखा गया था. वहीं बाद में हाईकोर्ट के दखल के बाद पुलिस की ओर से दाखिल दस्तावेजों में उसी मोटरसाइकिल सवार का नाम सामने आया. इसके बाद उसे जांच में क्लीन चिट दिए जाने की बात भी कोर्ट के सामने रखी गई.
आरोपी मौके पर पकड़ा तो FIR में ‘अज्ञात’ क्यों?
सुप्रीम कोर्ट के सामने शिकायतकर्ता ने दावा किया कि घटना के बाद उसने मोटरसाइकिल सवार को खुद पकड़ लिया था और उसे पुलिस के हवाले किया था. इसके बावजूद पुलिस ने FIR अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज की और आरोपी वाले कॉलम में नाम नहीं लिखा.
बेंच ने इसी बिंदु पर यूपी पुलिस के वकील से सवाल किया कि जब व्यक्ति मौके पर पकड़ा गया था तो FIR में उसे अज्ञात क्यों बताया गया? कोर्ट ने पूछा कि अगर शिकायतकर्ता ने आरोपी को पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया था, तो फिर पुलिस ने अज्ञात मोटरसाइकिल सवार के खिलाफ FIR दर्ज करने की जरूरत क्यों महसूस की. कोर्ट ने सवाल किया कि इस तरह की कार्रवाई के बाद आम लोग पुलिस पर भरोसा कैसे करेंगे.
‘हर चीज में आपका कोई न कोई एजेंडा’
सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस की कार्रवाई पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि आपके हर काम में किसी न किसी तरह का एजेंडा दिखाई देता है. कोर्ट ने सवाल किया कि अगर पुलिस इसी तरह मामलों को आगे बढ़ाएगी तो जनता उस पर भरोसा कैसे करेगी. बेंच ने यह भी कहा कि बेहतर होगा कि यूपी पुलिस की सभी जांचों में CBI को शामिल करने को कहा. इसी दौरान कोर्ट ने बेहद कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि ऐसी स्थिति में तो उत्तर प्रदेश पुलिस को ही भंग कर दिया जाए और सभी जांच CBI को सौंप दी जाएं.
हालांकि, ये टिप्पणियां कोर्ट की मौखिक टिप्पणियां थीं और इन्हें उत्तर प्रदेश पुलिस को भंग करने या सभी जांच CBI को सौंपने की सिफारिश के तौर पर नहीं देख जाना चाहिए.
‘कवर अप जॉब’ पर भी कोर्ट ने जताई नाराजगी
कोर्ट ने यूपी पुलिस की जांच के तरीके पर सवाल उठाते हुए कहा कि किसी के निर्देश का पालन करना एक बात है, लेकिन किसी मामले को इस हद तक मोड़ना अलग बात है. कोर्ट ने पुलिस की जांच प्रक्रिया को लेकर ‘कवर अप जॉब’ जैसे कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया और कहा कि इस पर जितना कम कहा जाए, उतना बेहतर है.
कोर्ट की नाराजगी का एक बड़ा कारण यह था कि FIR में आरोपी का नाम शुरुआत में दर्ज नहीं किया गया, जबकि पुलिस के सामने यह तथ्य था कि संबंधित मोटरसाइकिल सवार को मौके पर पकड़ लिया गया था. बाद की कार्रवाई में उसका नाम सामने आने और फिर उसे क्लीन चिट दिए जाने से जांच की प्रक्रिया पर सवाल उठे.
पुलिस के हलफनामे से भी संतुष्ट नहीं हुआ कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस की ओर से दाखिल जवाबी हलफनामे को भी पर्याप्त नहीं माना. कोर्ट ने कहा कि उसे यह हलफनामा ‘पूरी तरह प्रेरणाहीन’ लगा और संबंधित अधिकारी को अगली सुनवाई में बेहतर हलफनामा लेकर आने को कहा. कोर्ट ने खास तौर पर यह स्पष्टीकरण मांगा है कि जब मोटरसाइकिल सवार को मौके पर पकड़े जाने की बात स्वीकार की जा रही है, तब FIR में उसका नाम क्यों नहीं दर्ज किया गया. कोर्ट ने यह भी पूछा है कि शुरुआत में नाम खाली रखने के बाद उसे बाद में क्यों जोड़ा गया.
सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित पुलिस अधिकारी को अगली तारीख पर पेश होकर पूरे घटनाक्रम की सफाई देने को कहा है. खास तौर पर FIR में ‘अज्ञात’ आरोपी लिखे जाने और बाद में ‘तुषार’ नाम सामने आने के बीच की प्रक्रिया पर जवाब मांगा गया है.