डेरी में डचौकेगा
गोबर से दीवारों को सजाने वाले हाथों में अब मोबाइल, परंपराएं इतिहास के पन्नों में दफन
डॉ. दीपक जैन घाटाबिल्लोद...✍️
समय सचमुच बहुत आगे निकल गया है भाईसाहब! कल तक जिस मालवा और निमाड़ की गलियों में गोबर से संजा माता गढ़ी जाती थी, आज वहां फ्लैटों की विडंबना यह है कि गोबर की जगह केवल वाई-फाई के सिग्नल तैर रहे हैं। अब घरों की दीवारों पर गाय के गोबर से चाँद-सूरज, किले और संजा बाई की आकृति कौन उकेरे? आधुनिकता की इस आंधी में संजा माता भी सोचती होंगी-"हम तो घर की दीवार पर गोबर के गहने पहनकर बैठती थीं, ये आधुनिक बच्चे टैबलेट और स्मार्टफोन की स्क्रीन पर हमें ढूंढ रहे हैं!"
गोबर से डिजिटल स्क्रीन तक का सफर
- गोबर के उपले बनाम एलईडी लाइट्स : कभी हमारे पुरखों के समय में संजा पर्व पर कुंवारी कन्याएँ शाम को गोबर से कलाकृतियाँ बनाकर फूल-पत्तियों से सजाती थीं और गीत गाती थीं। आज की आधुनिक कन्याओं के पास गोबर छूने का समय कहाँ है? उनके लिए तो 'संजा' मतलब इंस्टाग्राम की कोई फिल्टर वाली रील या व्हाट्सएप पर आया फॉरवर्डेड मैसेज बनकर रह गया है।
- पारंपरिक गीत और डीजे का शोर : पहले संजा के गीतों की मिठास मालवा की ठंडी हवाओं में गूँजती थी— "संजा थारो मेलो लाग्यो रे..."। अब पारंपरिक गीतों की जगह डीजे के लाउडस्पीकरों ने ले ली है, जहाँ संजा के लोकगीत भी रीमिक्स होकर किसी पब के गाने जैसे सुनाई देते हैं।
- दीवारों की बदहाली और पेंटेड बंगले : सीमेंट और मार्बल से बने आधुनिक घरों की चिकनी दीवारों पर गोबर टिकता ही नहीं। अब कोई संजा माता बनाए भी तो कहाँ? और बनाए तो क्या इंजीनियर और आर्किटेक्ट उसे इंटीरियर डिजाइनिंग के खिलाफ मानकर बाहर का रास्ता न दिखा दें!
संजा माता का मॉर्डन अवतार
यदि आज संजा माता धरती पर दोबारा आ जाएं, तो वे भी शायद अपना रूप बदलकर किसी हाई-टेक मॉल में नजर आएंगी। वे गोबर के हार की जगह डायमंड का सेट पहने मिलेंगी और उनके हाथ में खुरपी की जगह आईफोन होगा। लोक परंपराएँ अब इतिहास के पन्नों में या बुजुर्गों के संस्मरणों तक सिमट कर रह गई हैं।
संजा माता के विलुप्त होने का दुःख तो है, पर सांत्वना यह है कि अब हमें गोबर के उपले धोने की 'परेशानी' से मुक्ति मिल गई है! अब संजा माता लोकगीतों में कम और हमारी 'डिजिटल भूलने की बीमारी' (Amnesia) में ज्यादा जिंदा हैं।
- व्यंग्य का सार : संस्कृति को बचाना अब सिर्फ किताबों में अच्छा लगता है, बाकी हकीकत तो यह है कि मालवा-निमाड़ का आदमी अब गोबर की सुगंध भूलकर सेंट और डिओडोरेंट की खुशबू में मस्त है!