वरिष्ठ पत्र दीपक जी शर्मा-चैतन्य लोक) की कलम से...
इंदौर.
मुंबई की देखादेखी हमारे इंदौर में भी जगह-जगह श्री गणेश जी की भव्य प्रतिमाएं स्थापित होने लगी है। एक ही मार्ग पर दस-दस प्रतिमाएं तक! लेकिन तुमने कभी सोचा है कि मुंबई के समुद्र की तरह हमारे पास इनके विसर्जन का क्या स्त्रोत है? स्वाभाविक है कि इन भव्य प्रतिमाओं की दुर्दशा होना है। चंदाखोरी और मोहल्ले में हीरो बनने की खातिर क्या कर रहे हो? हमारे पास जो जल के सीमित स्त्रोत हैं उन्हें भी प्रदूषत कर देंगे तो क्या स्थिति भविष्य में बनेगी?
सोचो इस बार मानसून हमारे यहां कम वर्षा कर विदा क्यों हो गया? खेतों में हमने कॉलोनियां काट दी है। विकास के नाम पर हरियाली का विनाश कर दिया है। धार्मिक भावनाओं के नाम पर जल स्त्रोतों को प्रदूषित कर दिया है। एक बड़ी दुर्घटना के बाद शहर की ज्यादातर बावड़ियां-कुएं बंद कर दिए गए हैं। इस बार समय से पूर्व जलसंकट के आसार नजर आ रहे हैं।
चलते मानसून में कई बोरिंग बैठ गए और रहवासियों को टैंकरों से पानी बुलवाना पड़ा है। यदि अब भी नहीं जागे तो कब जागोगे? शासन-प्रशासन के माथे पर संभावित जलसंकट को लेकर जो चिंता की लकीरें हैं वे आपको नहीं दिखती? एक समय था जब गणेशोत्सव के दौरान शहर के बाजारों में झांकियां सजाई जाती थी तथा पूरा शहर उन्हें देखने उमड़ता था।
यह परम्परा स्वतः खत्म हो गई और मुंबई की तरह लालबाग के राजा की तर्ज पर जगह-जगह भव्य प्रतिमाओं के रूप में “राजा” बैठाए जाने लगे। मुंबई में समुद्र होने के साथ एक सिस्टम भी काम करता है जो वहां स्थापित हजारों प्रतिमाओं को समुद्र में आगे तक ले जाकर उनका विसर्जन करवाता है। हमारे यहां स्थिति यह है कि घर में स्थापित श्री गणेश प्रतिमा विसर्जन तक की व्यवस्था नहीं है, तो बड़ी संख्या में भव्य प्रतिमाओं का विसर्जन कहां किया जाएगा? प्रदूषण से जो विकृतियां उत्पन्न हो रही है उसका जिक्र मैं पहले ही कर चुका हूं।