स्मार्टफोन आज जीवन का अभिन्न अंग : भविष्य को अंधकार में धकेल रहे...!

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स्मार्टफोन आज जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है । जीवन को सरल बनाने में यह अपनी प्रभावी भूमिका निभा रहा है। व्यक्ति का पूरा संसार जैसे एक फोन में सिमट गया है, लेकिन इसकी लत के चलते इससे जुड़े दुष्प्रभाव भी कम नहीं है जिनसे होने वाले घातक परिणाम चिंता का विषय बने हुए हैं, विशेष कर बच्चों व किशोरों के संदर्भ में, जो उनके भविष्य को अंधकार में धकेल रहे हैं।

हर समय मोबाइल की स्क्रीन से चिपके रहने की लत बच्चों और किशोरों के लिए घातक सिद्ध हो रही है। प्रत्येक वर्ष 20,000 बच्चे इसके कारण आत्महत्या कर रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार विभिन्न अध्ययनों से स्पष्ट होता है कि बच्चे और युवा प्रत्येक दिन 4 से 8 घंटा मोबाइल और स्क्रीन पर विता रहे हैं ,जो अपने चरम पर वर्ष भर में 100 दिनों से अधिक होते हैं। 

आश्चर्य नहीं की विश्व भर के 58देशों ने स्कूलों में फोन पर प्रतिबंध लगा दिया है। इंडोनेशिया दक्षिण पूर्व एशिया का पहला देश बन गया है, जिसने बच्चों को यूट्यूब, टिकटोक ,फेसबुक, इंस्टाग्राम ,थ्रेड्स, एक्स, बिंगो लाइव और रोब्लाक्सर  के उपयोग को प्रतिबंधित किया है। 

परित नियम 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों को उन डिजिटल प्लेटफार्म तक पहुंचने से रोकता है, जो उन्हें अश्लीलता, साइबर बुलिंग, ऑनलाइन धोखाधड़ी, और लत के संपर्क में ला सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों द्वारा सोशल मीडिया का उपयोग उनके मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है और चिंता व अवसाद को बढ़ा सकता है। 

इन खतरों को देखते हुए विशेषज्ञों के मत में सोशल मीडिया से बच्चों को दूर रखना आवश्यक हो गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2022-23 रिपोर्ट के अनुसार 11 से 15 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 10 से 13 प्रतिशत किशोरों में अवसाद, चिंता और नींद की कमी से जुड़े समस्या जनक सोशल मीडिया उपयोग के लक्षण पाए गए हैं। 

पीऊ रिसर्च सेंटर के 2022 के सर्वेक्षण के अनुसार सोशल मीडिया 59अमेरिकी  किशोरों के आत्मविश्वास और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है ।

जर्नल ऑफ एडोलसेंट हेल्थ के 2019 से 2023 के मध्य के अध्ययनों से स्पष्ट होता है कि प्रतिदिन 3 घंटे से अधिक सोशल मीडिया का उपयोग करने वाले किशोरों में अवसाद के लक्षणों की संभावना लगभग 60तक बढ़ जाती है । मोबाइल ,सोशल मीडिया और देर रात तक स्क्रीन का उपयोग युवाओं की नींद पर गंभीर प्रभाव डाल रहा है। 

विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल जीवन शैली के कारण युवाओं में नींद की कमी तेजी से बढ़ रही है और इससे अवसाद, आक्रामक व्यवहार और आत्महत्या की प्रवृत्ति तीव्रता से बढ़ रही है। 

अखंड ज्योति नवंबर 2026 पृष्ठ 5

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