ओम माथुर
ये महज संयोग है या कोई राजनीतिक संदेश? छह राज्यों में हुए एमएलसी चुनावों में आरएसएस के मुख्यालय और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी तथा महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के गढ़ नागपुर में भाजपा प्रत्याशी को कांग्रेस के हाथों हार का सामना करना पड़ा। यहां कांग्रेस के अभिजीत बंजारी ने भाजपा के सुधाकर कोहली को पराजित किया।
इसी तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्वाचन क्षेत्र काशी में भी भाजपा उम्मीदवार समाजवादी पार्टी से चुनाव हार गए। यहां भाजपा को शिक्षक और स्नातक, दोनों सीटों पर हार का सामना करना पड़ा। शिक्षक सीट पर सपा के बिहारी लाल यादव ने भाजपा के डॉ. प्रमोद मिश्रा को हराया, जबकि स्नातक सीट पर सपा के आशुतोष सिंह ने भाजपा के केदारनाथ सिंह को परास्त किया।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गढ़ गोरखपुर में शिक्षक सीट पर भाजपा उम्मीदवार धर्मेंद्र त्रिपाठी किसी तरह महज 307 मतों से जीत सके। राजधानी लखनऊ में भी भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। इस तरह उत्तर प्रदेश की 11 एमएलसी सीटों में भाजपा को छह और सपा को पांच सीटें मिलीं। सपा को पिछली बार के मुकाबले दो सीटों का फायदा हुआ।
दरअसल, इन चुनावों में पढ़ा-लिखा तबका मतदान करता है। इसलिए भाजपा के लिए ये नतीजे चिंता की बात हैं। यूजीसी, नीट पेपर लीक और जेन-जी जैसे आंदोलनों के बीच बुद्धिजीवी और शिक्षित वर्ग का भाजपा से थोड़ा भी किनारा करना इस बात का संकेत हो सकता है कि इन मुद्दों को लेकर लोगों में नाराजगी है। यह मानकर नहीं चला जा सकता कि शिक्षित वर्ग के बीच सरकार और उसके फैसलों को लेकर सब कुछ ठीक है।
हालांकि, एमएलसी और विधानसभा चुनावों के मिजाज में काफी अंतर होता है। विधानसभा चुनाव जातीय समीकरणों, सरकारी योजनाओं, नेताओं की लोकप्रियता और राष्ट्रीय व राज्य स्तरीय मुद्दों के आधार पर लड़े जाते हैं। वहीं एमएलसी चुनावों में उम्मीदवार का व्यक्तिगत संपर्क, शिक्षक और स्नातक जैसे मतदाता समूहों में उसकी पकड़ तथा लोकप्रियता ज्यादा मायने रखती है। इसलिए इन नतीजों को विधानसभा चुनावों का स्पष्ट संकेत नहीं माना जा सकता। लेकिन भाजपा के लिए आत्ममंथन का समय जरूर है।
दूसरी ओर, कांग्रेस की स्थिति भी कोई बहुत उत्साहजनक नहीं है। छह राज्यों की 28 सीटों में से कांग्रेस महज एक सीट नागपुर में जीत सकी है। लेकिन आरएसएस के मुख्यालय वाले नागपुर में जीत के बाद कांग्रेस को ऐसा लगने लगा है, मानो उसने कोई बड़ा राजनीतिक किला फतह कर लिया हो। इस एक जीत के बहाने उसे उत्तर प्रदेश विधानसभा से लेकर अगले लोकसभा चुनाव तक जनता का व्यापक समर्थन मिलने की उम्मीद दिखाई देने लगी है। जबकि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की हालत किसी से छिपी नहीं है।
समाजवादी पार्टी अगले विधानसभा चुनाव में सीटों के बंटवारे को लेकर कांग्रेस को 150 सीटें देने के बजाय महज 50-60 सीटों तक सीमित रखने के संकेत दे रही है। वर्तमान में उत्तर प्रदेश विधानसभा की 403 सीटों में कांग्रेस के महज दो विधायक हैं, जबकि लोकसभा की 80 सीटों में से उसके पास छह सीटें हैं। प्रदेश में वह करीब 37 साल से सत्ता से बाहर है। वहीं केंद्र की सत्ता से भी उसे 12 साल हो चुके हैं।
कांग्रेस के लिए एक और विरोधाभास यह है कि जिस कर्नाटक में उसकी सरकार है, वहां भी वह एमएलसी की चारों सीटें हार गई। ऐसे में नागपुर की एक जीत को देशभर में कांग्रेस के पक्ष में बदलते राजनीतिक माहौल का प्रमाण मान लेना जल्दबाजी होगी।
फिलहाल नागपुर और काशी की हार ने भाजपा के कान जरूर खड़े कर दिए हैं। पार्टी के उच्च स्तर पर इन नतीजों को लेकर मंथन शुरू होना भी स्वाभाविक है। भाजपा की एक खासियत यह रही है कि चुनावी हार या राजनीतिक झटके के बाद वह अपनी कमियों को तलाशने और संगठन को दुरुस्त करने में देर नहीं लगाती। इसके उलट कांग्रेस की समस्या यह है कि वह कई बार छोटी-सी उपलब्धि को भी बड़ी राजनीतिक जीत मानकर आत्ममुग्ध हो जाती है।
नागपुर की जीत कांग्रेस के लिए मनोवैज्ञानिक रूप से बड़ी उपलब्धि जरूर है, लेकिन इससे उसकी राजनीतिक जमीन मजबूत होने का दावा नहीं किया जा सकता। वहीं भाजपा के लिए नागपुर और काशी के नतीजे भले ही विधानसभा चुनावों का संकेत न हों, लेकिन इन्हें सामान्य चुनावी हार मानकर नजरअंदाज करना भी बड़ी भूल होगी।