मृत्यु संकट और मृत्यु उसे उतना ही कष्ट देती है। जंजीर देह, दैहिक कष्ट, पारिवारिक सामाजिक संताप होते हुए भी वह मरना नहीं चाहता। मरण की घड़ी आने पर भी वह नये जीवन एवं जन्म की कल्पना करता है। मोह की डोर में बँधा हुआ वह यह सोचता है कि अपने ही घर के किसी सदस्य के घर मुझे नया जन्म एवं जीवन मिले। मृत्यु भय की सघनता के पीदे एक तत्त्व और भी है कि यह भय हमें-हम सबको पूर्व जन्मों में भी मिला होगा। फिर भी आसक्ति की डोर नहीं टूटती। बार-बार मरण होने पर भी न तो किसी तरह मरण का भय छूटता है और न ही जीवन की लालसा।
पुराणों में कथा है राजा शतद्रुम की। यह बोधकथा बड़ी प्रबोधक एवं मर्मस्पर्शी है। पुराणकार कहते हैं कि महास्ज शतद्रुम बड़े प्रतापी सम्राट थे। उनका विशाल साम्राज्य, चतुरंगिणी सेना, राज ऐश्वर्य सभी कुछ ऐसा था जिसकी कथा कहते हुए लोग थकते नहीं थे। राजा शतद्रुम के सेनापति, मंत्रीगण सभी अति विश्वस्त थे। स्वयं महाराज के पराक्रम का भी पारावार नहीं था। वे जितने रणकुशल थे, उतने ही नीतिकुशल। परन्तु अपने इन अनेक गुणों के साथ महाराज राग-रंग के रसिक भी थे। विलासिता उनके अस्तित्व में रची-बसी थी। सभी की देह कभी न कभी काल का कौर बनती है।
महाराज शतद्रुम की बारी भी आ गयी। राजवैद्यों के अनगिन प्रयास भी उन्हें बचा न सके। अंत में उन्हें मरना ही पड़ा, परन्तु मरते-मरते भी उनकी जीवन लालसा छूटी नहीं। उन्होंने मरते समय अपने विश्वासपात्र मंत्रियों एवं महारानी से कहा कि मरने के बाद भी मेरा शरीर जलाया न जाए, बल्कि उसे सुरक्षित रखने का यत्न किया जाए और इस बीच किसी ऐसे तेजस्वी मुनि की खोज की जाए जो मेरे मृत शरीर में पुनः प्राणों का संचार कर दें।
मंत्रियों एवं महारानी ने महाराज शतद्रुम के इस आदेश का यथावत् पालन किया। बड़े यत्न से उन्होंने महाराज की मृतकाया को सुरक्षित करने का यत्न किया और लगे परम तेजस्वी पराविद्याओं के जानकार किसी महर्षि की खोज में। संयोग कहें या दैवकृपा ऐसे ऋषि मिल भी गये। मंत्रियों एवं महारानी ने उन्हें राजा की इच्छा से अवगत कराया। सारी बातें सुनकर महर्षि विचार मग्न हो गये। काफी देर चुप रहने पर उन्होंने कहा-इस कार्य में दो कठिनाइयाँ हैं। जिनमें से एक का हल मैं करूँगा, परन्तु दूसरी कठिनाई तुम सभी को मिलकर हल करनी पड़ेगी।
ये कठिनाइयाँ हैं क्या महर्षि? यह प्रश्न महारानी का था। उत्तर में महर्षि बोले-पहली कठिनाई यह है कि हमें यह पता करना पड़ेगा कि इस समय अपनी मृत्यु के बाद महाराज की जीवात्मा कहाँ किस योनि में है? इसका हल मैं अपने योगबल से कर लूँगा और दूसरी कठिनाई यह है कि महाराज इस समय जिस योनि में हैं, उन्हें उस योनि के शरीर से मुक्त करने का दायित्व आप सब पर है, क्योंकि मैं किसी प्राणी की हत्या नहीं कर सकता हूँ। हाँ उनके उस शरीर से मुक्त करने पर मैं उन्हें परकाया प्रवेश विद्या से महाराज के शरीर में अवश्य प्रवेश करा दूँगा।
महर्षि की बात सभी को ठीक लगी। महर्षि ने अपने कथानुसार पता लगाया कि महाराज इस समय राजोद्यान में एक कीड़े की योनि में है। राज उद्यान की आसक्ति ही उन्हें वहाँ ले गयी है। सुनकर आश्चर्य तो सभी को हुआ, परन्तु साथ ही इस बात का संतोष था कि एक कीड़े को मारने में कोई हानि भी नहीं है। सेनापति दल-बल के साथ उस कीड़े को मारने राजोद्यान पहुँच गये। भागदौड़ होने लगी। वह कीड़ा अपने मरण भय से विह्वल था। इधर-उधर छिपता भाग रहा था। यह स्थिति देखकर महर्षि हँस पड़े और बोले-यही अभिनिवेश है। जो एक कीड़े में उतना है, जितना कि महाराज शतद्रुम में था।
महाराज शतद्रुम जितना अपने पूर्व शरीर में सुखी थे, उतने ही वे अभी भी हैं। जब वह स्वयं अपने इस कीड़े के शरीर को नहीं छोड़ना चाहते तो उन्हें व्यर्थ परेशान न करो। सभी ने आश्चर्य चकित होते हुए महर्षि की बात मान ली।