नई दिल्ली. पीएम मोदी के प्रधान सचिव पीके मिश्रा ने चेतावनी दी है। उनका कहना है कि घरेलू मैन्युफैक्चरिंग का मकसद सिर्फ आयात का विकल्प ढूंढना नहीं होना चाहिए। असली टारगेट ऐसी क्षमताएं विकसित करना है जो प्रोडक्टिव, कॉम्पिटिटिव, स्केलेबल और भविष्य में एक्सपोर्ट ओरिएंटेड हों ताकि ग्लोबल मार्केट में मजबूती से टिक सकें।
प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव पीके मिश्रा का कहना है कि भारत की आर्थिक मजबूती की कोशिश का मतलब खुद को ग्लोबल मार्केट से अलग-थलग करना नहीं होना चाहिए। उन्होंने बताया कि घरेलू उत्पादन सबसे सस्ते ग्लोबल मार्केट से सामान खरीदने की तुलना में महंगा हो सकता है।
5वें कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव में पहुंचे मिश्रा ने कहा कि घरेलू क्षमता बनाने का फायदा मुश्किल या रुकावट के समय साफ दिखता है। उन्होंने कहा, 'घरेलू उत्पादन की लागत सबसे सस्ते ग्लोबल मार्केट से आयात करने से ज्यादा हो सकती है। इसका फायदा तभी पता चलता है जब कोई रुकावट आती है।'
वह बोले, 'मजबूती का मतलब दुनिया से अलग-थलग रहना नहीं हो सकता। इसका मतलब यह होना चाहिए कि हम दुनिया के लिए खुले रहें। लेकिन, उस पर बहुत ज्यादा निर्भर या कमजोर न हों।'
मिश्रा ने बताया कि अनिश्चितता आर्थिक व्यवहार को बदल देती है। कारण है कि बिजनेस तेजी से बदलते और अनिश्चित भविष्य को देखते हुए निवेश टालते हैं। सप्लायर बदलते हैं। ज्यादा इन्वेंट्री के साथ ही अतिरिक्त क्षमता बनाए रखते हैं।
इसी तरह सरकारें भी रिजर्व बनाती हैं। फिस्कल बफर मजबूत करती हैं। ऐसी क्षमताओं में निवेश करती हैं जो सामान्य समय में महंगी लग सकती हैं। लेकिन, झटकों के समय बहुत काम आती हैं। इससे पता चलता है कि मजबूती हासिल करने में अतिरिक्त लागत आती है।
उन्होंने कहा, 'इसका मतलब है कि वे मजबूती के लिए अतिरिक्त कीमत चुकाते हैं। आज हम दुनिया भर में ऐसा ही देख रहे हैं। कारण है कि अर्थशास्त्री हमें बताते हैं कि मजबूती मुफ्त नहीं मिलती।'
इस माहौल में पीके मिश्रा ने जोखिमों की सही कीमत तय करने और ज्यादा मजबूती के लिए अर्थव्यवस्थाओं की ओर से उठाई जा सकने वाली अतिरिक्त लागत के बीच संतुलन बनाने के महत्व पर जोर दिया। जोखिमों का आकलन कैसे किया जाता है, यह बताते हुए मिश्रा ने दो मुख्य तरीकों का जिक्र किया। पारंपरिक तरीका संभावित नतीजों (फायदे और नुकसान दोनों) की रेंज और संभावना पर विचार करता है। वहीं, दूसरा तरीका रिटर्न के एक अहम या 'आपदा' स्तर से नीचे गिरने की संभावना पर फोकस करता है। मिश्रा के अनुसार, 'आज कई देश दूसरे तरीके को अपना रहे हैं।'