नैवेद्य पुरोहित
व्यास जी अपने समय के नेशनल फुटबॉल खिलाड़ी रहे हैं। उन्होंने अपनी पूरी सेवा नूतन स्कूल में एक फिजिकल इंस्ट्रक्टर के रूप में दी और वहाँ से उनके अनुशासन के किस्से आज भी मशहूर हैं। उनके द्वारा पढ़ाए गए विद्यार्थियों में से आज कई बड़े नेता-मंत्री है जो आज भी उनका आशीर्वाद लेने व्यास जी के घर आते है।
उन्होंने बड़े गर्व से बताया कि कैसे उन्होंने 18 लड़कों को नेशनल लेवल तक पहुँचाया। उनकी दबंगई ऐसी थी कि स्कूल के समय में अगर कोई छात्र फिल्म देखने अलका या ज्योति टॉकीज़ चला जाता, तो व्यास सर वहाँ पहुँचकर लाइट जलवा देते थे और पर्दे के सामने खड़े होकर अनुशासन का पाठ पढ़ाते थे।
व्यास जी की पहचान उनकी 74 मॉडल की लाल बुलेट से भी जुड़ी है, जिसे उन्होंने 6500 रुपये में खरीदा था। आज भी वह गाड़ी 'हाफ किक' में स्टार्ट होती है और उनके व्यक्तित्व की तरह ही मजबूती से खड़ी है।
हमारी बातचीत के दौरान जब मैंने उन्हें भोपाल के सप्रे संग्रहालय में मिली 1955-58 की 'पालीवाल मासिक पत्रिका' के अंक दिखाए, तो उनकी आँखें चमक उठीं। अक्टूबर 1958 के उस अंक में पालीवाल विद्यार्थी संघ के अंतर्गत उनका नाम 'क्रीड़ा मंत्री' के रूप में दर्ज था और उनकी जवानी की एक तस्वीर भी थी, जब वे पालीवाल क्लब के कैप्टन थे और उन्हें भारतीय क्रीड़ा में प्रथम पुरस्कार मिला था। हमारे समाज में क्रीड़ा मंत्री, उप क्रीड़ा मंत्री, प्रचार मंत्री एवं कानून समिति समेत कई पद जो उस वक्त थे आज खत्म कर दिए गए या निष्क्रिय हो गए..?
व्यास जी ने मेरे परदादाजी पालीवाल समाज इंदौर के प्रथम पत्रकार स्वर्गीय गणेशचन्द्र जी पुरोहित के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया था। उन्होंने याद किया कि कैसे उस समय समाज के लिए लोग निःस्वार्थ सेवा करते थे। जब मेवाड़ के महाराजा भगवंत सिंह जी इंदौर आए थे, तब व्यास जी अपनी लाल बुलेट पर उनके आगे-आगे और महाराजा की मोटर कार पीछे-पीछे चल रही थी। मंदिर के दरवाज़े से लेकर अंदर मंच तक महाराजा के स्वागत के लिए लाल कार्पेट बिछाया गया था। यह एक भव्य दृश्य था। उन्होंने उस ज़माने में मोहनलाल सुखाड़िया, गिरिजा व्यास और श्यामाचरण शुक्ल जैसी हस्तियों के समाज के कार्यक्रमों में आने के संस्मरण भी साझा किए।
व्यास जी ने बताया कि धर्मशाला और मंदिर का निर्माण किसी एक व्यक्ति की बदौलत नहीं हुआ है। पूरे समाज के सहयोग से यह भवन तैयार हुआ था एक-एक हजार रुपये घर-घर से इकट्ठा किए गए थे। समाज में बढ़ते दिखावे और फिजूलखर्ची पर उन्होंने अपनी चिंता जताई। उनकी पत्नी ने भी समाज की महिलाओं को संगठित करने के लिए सर्वप्रथम 'पालीवाल महिला सहकारी साख संस्था' रजिस्टर्ड की स्थापना की।