पेरिस. पांच नवंबर (एपी) फ्रांस में वेतन वृद्धि और सरकारी स्कूलों की स्थिति में सुधार की मांग को लेकर जारी राष्ट्रव्यापी विरोध-प्रदर्शनों में व्यापार संघ के लाखों सदस्य शामिल हुए, जिससे संकट से घिरी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की सरकार पर दबाव और बढ़ गया। 5 नवंबर 2026 को ट्रेड यूनियनों और लाखों कर्मचारियों ने देश भर में करीब 180 रैलियां निकालीं, जिनमें लगभग 2,70,000 से अधिक लोग शामिल हुए।
पूरे फ्रांस में पिछले एक महीने से अधिक समय से बड़े पैमाने पर और समय-समय पर हो रहे विरोध-प्रदर्शनों के बीच पेरिस, लियोन, मार्सिले और अन्य जगहों पर फिर से विशाल रैलियां निकाली गईं।
गृह मंत्री लॉरेंट नुनेज के करीबी अधिकारी ने बताया कि दोपहर तक राजधानी के बाहर 180 रैलियों में व्यापार संघ के लगभग 2,70,000 सदस्य शामिल हो गए। उन्होंने बताया कि इनमें से ज्यादातर विरोध-प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे।
हालांकि, अधिकारी ने बताया कि लियोन, नान्तेस, पो, ऑरलियन्स, रेनेस और टूलूज जैसे शहरों में छिटपुट हिंसा की खबरें सामने आईं। फ्रांस में बृहस्तिवार को छात्रों ने भी नये सिरे विरोध-प्रदर्शन किया। देशभर के लगभग एक-तिहाई हाईस्कूल छात्रों के प्रदर्शन या शिक्षकों की हड़ताव की वजह से बंद रहे। देश में सार्वजनिक परिवहन भी बुरी तरह प्रभावित हुआ। एफिल टॉवर को भी विरोध-प्रदर्शन के चलते बंद रखा गया।
फ्रांस में वेतन वृद्धि, महंगाई और सरकारी स्कूलों की स्थिति में सुधार की मांग को लेकर राष्ट्रव्यापी विरोध-प्रदर्शन तेज हो गए हैं, जिससे राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू की सरकार पर दबाव काफी बढ़ गया है।
प्रमुख घटनाक्रम और विरोध के कारण
• व्यापार संघों का प्रदर्शन: 5 नवंबर 2026 को ट्रेड यूनियनों और लाखों कर्मचारियों ने देश भर में करीब 180 रैलियां निकालीं, जिनमें लगभग 2,70,000 से अधिक लोग शामिल हुए।
• छात्र और शिक्षक आंदोलन: स्कूलों में शिक्षकों की कमी, खराब इमारतों, संसाधनों के अभाव और शिक्षा बजट में कटौती के खिलाफ छात्र और शिक्षक लगातार सड़कों पर हैं।
• हिंसा और गिरफ्तारियां: पेरिस, लियोन, नान्तेस और टूलूज जैसे शहरों में प्रदर्शनों के दौरान छिटपुट हिंसा, आगजनी और पुलिस के साथ झड़पें हुईं, जिसके बाद प्रशासन ने कड़ी कार्रवाई की है।
• राजनीतिक अस्थिरता: फ्रांस के बढ़ते सार्वजनिक कर्ज, जीवनयापन के ऊंचे संकट और आगामी राष्ट्रपति चुनाव से पहले राजनीतिक दलों (जैसे दक्षिणपंथी मरीन ले पेन और वामपंथी जीन-ल्यूक मेलेंचोन) के बढ़ते विरोध ने स्थिति को और पेचीदा बना दिया है।