नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति सिर्फ नौकरी छोड़ना नहीं है, बल्कि यह कर्मचारी का एक अलग अधिकार है, जो नौकरी के लिए जरूरी साल पूरे होने पर मिलता है। जस्टिस जेके माहेश्वरी व जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने एक बैंक की अपील पर अपना फैसला सुनाया। इस अपील में बैंक ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के 2019 के दो अलग-अलग आदेशों को चुनौती दी थी।
पीठ ने कहा, यदि कोई कर्मचारी 20 वर्ष की सेवा पूरी करने के बाद 3 महीने का नोटिस देता है, तो वह स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का हकदार है। यदि नियोक्ता नोटिस अवधि में उसके आवेदन को अस्वीकार नहीं करता सेवानिवृत्ति स्वतः लागू हो जाती है। नोटिस अवधि पूरी होने के बाद की गई अस्वीकृति अमान्य मानी जाएगी। पीठ ने गौर किया कि कर्मचारी की नियुक्ति सितंबर 1983 में हुई थी और अप्रैल 2007 में उसे प्रमोट करके मैनेजर बना दिया गया था।
जुलाई 2010 में, रायपुर शाखा प्रबंधक के रूप में काम करते हुए बैंक को दो खातों में कुछ संदिग्ध लेन-देन की जानकारी मिली। इसी दौरान, कर्मचारी ने 4 अक्तूबर 2010 को महाप्रबंधक को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का नोटिस भेजा और इसके जवाब में, क्षेत्रीय कार्यालय ने पेंशन नियमों के तहत एक नया आवेदन मांगा। बाद में, स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए नोटिस में तय अवधि समाप्त होने पर कर्मचारी ने 16 मई, 2011 से बैंक में काम करना बंद कर दिया।
पीठ ने गौर किया कि बैंक ने कर्मचारी के रोजगार समाप्त करने के लगभग आठ महीने बाद, 5 मार्च 2012 को उस पर संदिग्ध लेन-देन के आरोप में अभियोग दायर किया था। इसके बाद कर्मचारी ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति की अस्वीकृति और शुरू की गई जांच और बर्खास्तगी को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट ने बैंक को उस कर्मचारी को सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले लाभ देने का निर्देश दिया था। पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट के निर्देशानुसार, कर्मचारी सेवानिवृत्ति के बाद के सभी परिणामी लाभों का हकदार होगा। पीठ ने बैंक को निर्देश दिया कि वह लागू ब्याज सहित सभी बकाया राशि का तीन महीने के भीतर भुगतान करे।