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जब दो भाइयों में दरार आई, "अब बनिए की नौकरी नहीं करनी!"

आपकी कलम Published by: indoremeripehchan.in Updated Sun, 10 May 2026 12:16 PM
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नैवेद्य पुरोहित

वक्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता। साल 1983 से शुरू हुआ भास्कर इंदौर का वो सुनहरा सफर, जिसने धूल उड़ाते हुए सफलता के झंडे गाड़े थे, साल 1989 तक आते-आते एक ऐसे मोड़ पर खड़ा हो गया जहाँ रिश्तों की डोर कमजोर पड़ने लगी थी। यह दैनिक भास्कर के इतिहास का वो दौर था जिसे आज भी पुराने पत्रकार भारी मन से याद करते हैं अग्रवाल भाइयों के बीच बंटवारे का दौर।

इंदौर न्यूज़ रूम, जो कभी खबरों की गहमागहमी और हंसी-ठिठोली से गूंजता था, वहां अब सन्नाटा पसरने लगा था। मालिकानों के बीच बंटवारे की लकीरें खिंच चुकी थीं। जबलपुर, रायपुर और इंदौर के बीच अखबार की मिल्कियत बंट रही थी। लेकिन साहब, अखबार सिर्फ मशीनों और दफ्तरों से नहीं बनता, वो बनता है उन वफादार सिपाहियों से जिन्होंने उसे अपने खून-पसीने से सींचा हो।
रमेश मिश्रा 'चंचल', जो मनमोहन अग्रवाल के साये की तरह थे और उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर एजेंसियां खड़ी की थीं, उनके लिए यह घड़ी बड़ी इम्तिहान वाली थी। बंटवारे के बाद जब मैनेजमेंट की तरफ से उन्हें रुकने का न्योता मिला और आगे साथ काम करने की बात हुई, तो मिश्र जी के भीतर का स्वाभिमानी पत्रकार जाग उठा।
रमेश मिश्र ने उस समय जो कहा, वो आज भी उनकी खुद्दारी की मिसाल माना जाता है। उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के दो टूक शब्दों में कह दिया, "नहीं साहब, अब बनिए की नौकरी नहीं करनी!"
उनके इस वाक्य में किसी बिरादरी के प्रति नफरत नहीं थी, बल्कि उस 'बंटवारे' की राजनीति के प्रति एक गहरी टीस थी। उनका मानना था कि जिस छत के नीचे भाई-भाई अलग हो रहे हों, वहां एक वफादार सिपाही का दिल नहीं लग सकता। उन्होंने तय कर लिया कि अब वो किसी के मुलाजिम बनकर नहीं, बल्कि अपनी शर्तों पर जिएंगे।
आत्मसम्मान को ऊपर रखकर, उन्होंने उस संस्थान से अपना इस्तीफा थमा दिया जहाँ उन्होंने 'कोरे कागजों' पर दस्तखत वाला भरोसा पाया था। भास्कर से विदाई लेना उनके लिए आसान नहीं था, लेकिन अपनी पहचान और सिद्धांतों के लिए उन्होंने एक झटके में उस ऊंचे ओहदे और रसूख को छोड़ दिया।
मगर साहब, पत्रकारिता तो उनकी रगों में दौड़ती थी। दैनिक भास्कर छूटा था, लेकिन कलम नहीं। दैनिक "आलोकन " कांग्रेस नेता बंसीलाल गांधी ने पूरे अधिकार सौंपा कि नई दिल्ली में नहीं आप रतलाम में संभालों,अखबार चल रहा था कि उनके एक भाई ने कहा था कि टाइटिल मेरे नाम का है, पारिवारिक सम्बन्ध खराब नहीं हो तो उसे छोड़ दिया,और स्वयं का साभार दर्शन, रतलाम दर्शन, नई दिल्ली से त्रैमासिक "पर्यावरण विमर्श"का निर्बाध प्रकाशन
किया था,अब बारी थी खुद का साम्राज्य खड़ा करने की जहाँ मालिक भी वही थे और मजदूर भी।
अगली किस्त में पढ़िएगा: भास्कर को अलविदा कहने के बाद कैसे शुरू हुआ 'साभार दर्शन' का सफर? रतलाम की गलियों से लेकर दिल्ली के सत्ता के गलियारों तक, रमेश मिश्र ने कैसे खड़ा किया अपना खुद का 'मीडिया साम्राज्य'? पढ़िए 'चंचल' जी की कामयाबी की नई इबादत, अगली किस्त में!
indoremeripehchan.in
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