विपक्ष को सड़क छाप बताने वाला सत्ता पक्ष खुद सड़क पर उतर आया है !

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  • तीसरी और अंतिम किश्त…

-अन्ना दुराई

देश में इन दिनों जो राजनीतिक हालात बनें हैं, वाकई इसकी कल्पना किसी को नहीं रही होगी। सत्ता पक्ष ने कभी सोचा नहीं होगा कि ऐसा भी हो सकता है। देखा जाए तो एक भरोसे और निश्चितता के साथ हमेशा सत्ता पक्ष बैठा हुआ दिखा। मानों सत्ता पक्ष ने अपनी एक अलग दुनिया बना ली, जिसमें सिर्फ और सिर्फ उसके सिवाय कोई नहीं था। यहां नियम भी उसके अपने, नीतियाँ भी उसकी अपनी। सोच उनका अपना और समझ भी उनकी अपनी। कंट्रोल भी अपना और रिमोट भी अपना। भाटगिरी, भड़काने और भटकाने वालों की टीम भी अपनी। वन मेन शो की तर्ज पर सारे के सारे फैसले और उनकी वाहवाही की बाध्यता अलग से।

ये सब होने के बाद भी स्थितियां अब अलग है। जो सत्ता पक्ष लंबे समय से चेन की बंसी बजा रहा था, वह बेचैन नजर आ रहा है। विपक्ष को सड़क छाप बताने वाला सत्ता पक्ष खुद सड़क पर उतर आया है। आम तौर पर मौन धारण कर लेने वाला सत्ता पक्ष मुखर हो चला है। उसने आमने सामने की इस लड़ाई में पूरी ताकत झोंक दी है।

उल जलूल तर्क और बचाव में बयानों की बौछार कर दी है। मुद्दों को टर्न देने और घुमाने की घिसी पिटी कोशिशें लेकिन असल मुद्दों पर मूल सवाल, आज भी अनुत्तरित। निर्वाचन प्रमुख को कानूनी तौर पर सौ खून माफ वाली संवैधानिक छूट सभी की समझ से परे। ऐसे कई प्रश्न हैं, जिन्हें सच्चाई का मुकाम नहीं मिल पा रहा। सड़क के संघर्ष को अब अराजकता का रंग दिया जा रहा है जो कि मूल मुद्दों से बेरंग लौटने का सूचक मात्र है।

इतना कुछ, बहुत कुछ है लेकिन अभी सत्ता पक्ष ने अपना स्वभाव बदला नहीं है। वह अभी भी उन हथियारों से धार तेज करने का प्रयास कर रहा है, जो बोथरे हो चुके हैं। प्रजातंत्र में विरोध के तरीके बदल चुके हैं। सभी का अपना अपना अंदाज है। विपक्ष भागकर आया, कि चलकर, विपक्ष ने टीशर्ट पहना कि बुशर्ट। ऐसे विवाद खड़े करने की लाख कोशिशें हों किंतु कोई उसमें पड़ने वाला नहीं।

युवा वर्ग आने वाले समय में गरबा खेलते या पटाखे चलाते हुए प्रदर्शन करे तो भी उनकी हँसी या मखौल बनाना, बेअसर ही होगा। उल्टे सीधे तर्क कुतर्क अब चलने वाले नहीं। सत्ता पक्ष को एक ना एक दिन मुल मुद्दों पर लौटते हुए, अपने जवाब से जनता को संतुष्ट करना होगा।

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