आज मदर्स डे है, कायनात की ऐसी शख़्सियत जिसके बारे में मजरूह सुल्तानपुरी ने दादी माँ फ़िल्म का वह मशहूर गीत लिखा था “ऐ माँ तेरी सूरत से अलग भगवान की सूरत क्या होगी“। बेटे पिता की तुलना में माँ से अधिक निकट होते हैं, पिता की भारी भरकम शख़्सियत से विलग ममता की इस मूरत के सहारे वे अपनी ग़लतियों को बखूबी छिपा लेते हैं और वे बातें भी मनवा लेते हैं , जिनके बारे में पिता का राजी होना मुश्किल होता है।
मेरे लिए भी यही बात लागू होती थी। हम अपनी माँ को अम्मा कहा करते थे और जब भी बाबूजी से कोई कठिन बात मनवानी होती अम्मा के आँचल में छुप कर अपनी सिफ़ारिश करवा लेते । मेरी माँ बहुत सीधी थीं , पढ़ी लिखी बस इतनी थीं कि रामचरित मानस पढ़ लेती थीं , लेकिन लोगों की सूरत देख कर सीरत समझने में वे सिद्धहस्त थीं।
बिना डरे कोई नई बात सीखना मैंने उनसे ही सीखा। मंडला में पिताजी पोस्टमास्टर थे और मैं कक्षा तीसरी या चौथी में पढ़ता था । सुबह सुबह जब अम्मा कार्तिक स्नान के लिए नर्मदा तट पर जातीं तो मैं उनके पीछे लग जाता । मुझे पानी से डर लगता था सो मैं किनारे खड़ा देखता। एक दिन अम्मा बोलीं , तुम अंदर आ जाओ और पानी में हाथ पैर चलाओ , डरो मत मैं यहीं हूँ। “मैं यहीं हूँ “ मेरे कानों में गूँजता रहा और कुछ ही दिन में मैं तैरना सीख गया।
मेरी पहली नौकरी एमपीईबी में खरगोन जिले की अंजड़ तहसील में लगी। मुझे खाना बनाना नहीं आता था , अंजड़ में क्या करूँगा ? सोच कर मैंने अपनी परेशानी अम्मा को बतायी, अम्मा ने कहा वे मेरे साथ अंजड़ चलेंगी। छह माह बाद ही बाबूजी की चिट्ठी आ गई कि तुम्हारा एमपी पीएससी का इंटरव्यू काल आया है , घर आ जाओ। मैं इंटरव्यू देने छुट्टी लेकर गया , तो वापस आने का मन न हुआ, लगा अच्छे से तैयारी करूँ तो अगली बार सिलेक्शन पक्का होगा, लेकिन मध्यम वर्गीय परिवार के बड़े लड़कें को लगी लगाई सरकारी नौकरी छोड़ने में जो हिचक होती है वही मेरे भी मन में थी।
अम्मा से दुविधा कही तो बोलीं जाकर अपने बाबूजी को बता दो और यहीं रह कर तैयारी करो , एक क्षण में सारी शंकाओं का समाधान मिल गया । लेकिन किस्मत का खेल कहें या लापरवाही अगले बरस परीक्षा देने इंदौर गया , तो सुबह समय से नींद ही ना खुली । बाकी के पर्चे ऐसे थे कि पास होना पक्का था , पर एक पेपर ही ना दिया तो अनुत्तीर्ण होना पक्का था । कटनी लौट कर आया तो घर में सबसे पहले अम्मा को बताया , कि गलती हो गई , इस बार पास न हो पाऊँगा। अम्मा बोलीं कोई बात नहीं अगली बार हो जाएगा , और उनके आशीर्वाद से अगली बार मैं राज्य प्रशासनिक सेवा में चुन लिया गया ।
लेकिन सीधी सादी अम्मा अन्दर से कितनी मज़बूत थीं , वो मैंने तब पाया जब एक दुविधा में मैंने अम्मा से अपनी बात कही । छात्र जीवन की घटना है , हम कटनी शहर से जबलपुर पढ़ने जाने वाले छात्रों ने एक संगठन बनाया था , अप डाउन छात्र संघर्ष समिति। एक बार कटनी में इसी समिति के एक चुनाव में , जिसमें मैं चुनाव अधिकारी था, मुझ पर जोर डाला गया कि मैं उस शख़्स को विजयी घोषित कर दूँ जो दरअसल हार गया था , जबकि जीतने वाला शख़्स मेरा जिगरी यार था।
ये दबाव बाकायदा हथियारों से लैस था ,मैंने अम्मा से पूछा क्या करूँ? मुझे लगा था अम्मा बोलेंगी कहाँ गुण्डों से उलझता है , कहाँ चाकू छुरी वालों से पंगे लेता है पर अम्मा बोलीं , सच कहने के लिए , किसी से क्या डरना ? बस फिर क्या था , मैंने बेख़ौफ़ वही किया जो सही था , और आगे भी जीवन में ये सीख गाँठ बाँध ली ।