बुजुर्ग की निशानी है कोई साइकिल, कोई घड़ी, कोई ट्रंक, कोई सिलाई मशीन : हीरोसाइकिल ओमप्रकाश मुंजाल

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एक टायर कंपनी के मैनेजर से मिलने के लिए उस आदमी को दफ्तर में पूरे दो दिन बैठना पड़ा था। आगे चलकर उसकी कंपनी दुनिया में सबसे ज्यादा साइकिलें बनाने लगी।

पर सबसे बड़ी बात वह नहीं है।

सबसे बड़ी बात यह है कि उस कंपनी का नाम उसने खुद नहीं गढ़ा था।

वह नाम उसे किसी और ने दिया था।

एक ऐसे आदमी ने, जो उन्हीं दिनों हिंदुस्तान छोड़कर जा रहा था।

जाते-जाते।

आज उस नाम को इस मुल्क का हर घर जानता है। दूधवाला जानता है, किसान जानता है, स्कूल जाता बच्चा जानता है।

अब शुरू से शुरू करते हैं।

कमालिया। टोबा टेक सिंह जिला। आज पाकिस्तान के पंजाब में है।

1928। बहादुर चंद मुंजाल के घर सबसे छोटे बेटे का जन्म हुआ। पिता की छोटी सी थोक अनाज की दुकान थी।

लड़के का नाम ओम प्रकाश।

पढ़ाई दसवीं से आगे नहीं गई।

1944 में परिवार का एक हिस्सा अमृतसर आ गया। भाई थे बृजमोहन लाल, दयानंद, सत्यानंद, और सबसे छोटा ओम प्रकाश। वहां उन्होंने साइकिल के कल-पुर्जों की दुकान खोली।

सबसे छोटा उस वक्त सोलह का था।

फिर 1947 आया।

कमालिया में दंगे भड़के। परिवार जान बचाकर निकला।

घर पीछे छूट गया। दुकान पीछे छूट गई। जो कुछ जमा किया था, सब पीछे छूट गया।

परिवार बिखर गया। कोई अमृतसर पहुंचा, कोई आगरा, कोई दिल्ली। किताब कहती है कि उनके पास बदन के कपड़ों से ज्यादा कुछ नहीं बचा था।

और फिर बंटवारे के बाद अमृतसर में कारोबार का माहौल ही टूट गया। सरहद इतनी पास थी कि व्यापार टिक नहीं सका।

तो भाइयों ने एक बार और सामान बांधा। इस बार लुधियाना के लिए।

यहीं वह दृश्य आता है, जिसके लिए यह पूरी पोस्ट लिखी गई है।

लुधियाना जाने की तैयारी चल रही थी। और उन्हीं दिनों उनका एक सप्लायर उल्टी दिशा में जाने की तैयारी कर रहा था।

उसका नाम था करीम दीन। वह साइकिल की गद्दियां बनाता था, और अपने माल के लिए एक ब्रांड नाम भी खुद ही गढ़ा था।

अब वह पाकिस्तान जा रहा था।

जाने से पहले वह अपने दोस्त ओम प्रकाश मुंजाल से मिलने आया।

और वहीं उस मुलाकात में ओम प्रकाश ने उससे पूछा कि क्या वे उसका वह ब्रांड नाम अपने काम के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं।

करीम दीन ने हां कर दी।

बस इतना ही हुआ। कोई कागज नहीं। कोई रकम नहीं। सिर एक बार हिल गया, और नाम हाथ बदल गया।

वह नाम था हीरो।

यह मैं अंदाजे से नहीं लिख रहा। यह किस्सा बृजमोहन लाल मुंजाल के बेटे सुनील कांत मुंजाल ने अपनी किताब 'द मेकिंग ऑफ हीरो' में खुद दर्ज किया है।

एक आदमी सब कुछ छोड़कर सरहद के इस पार आया था।

और सरहद के उस पार जाता हुआ एक आदमी उसे एक नाम दे गया।

दोनों की जमीन छिन रही थी। दोनों घर छोड़ रहे थे। और उसी शोर के बीच एक चीज ऐसी थी जो किसी दंगे की चपेट में नहीं आई।

लुधियाना।

आगे बढ़ने से पहले यह समझ लीजिए कि उन दिनों साइकिल का कारोबार होता कैसे था।

लगभग सारे पुर्जे बाहर से आते थे, और उन्हें बांटने का काम पुरानी अंग्रेज एजेंसियों के हाथ में था, जो आजादी के बाद हिंदुस्तानी हाथों में चली गई थीं।

माल कोटे पर मिलता था। जितना वे तय करें, उतना।

यहीं वह दृश्य आता है जिससे यह पोस्ट शुरू हुई थी।

टायर और ट्यूब डनलप से आते थे। और उनके मैनेजर से मिलने के लिए ओम प्रकाश मुंजाल को दफ्तर में दो दिन बैठना पड़ा था।

यह बात उन्होंने खुद बरसों बाद घर में सुनाई थी।

जिस आदमी का घर छिन चुका था, वह दो दिन एक कुर्सी पर बैठा इंतजार करता रहा कि कोई उसे अंदर बुला ले।

फिर घर लौटकर भाइयों से एक बात कही गई।

कि अब हम खुद बनाएंगे।

भाइयों ने पहले मना किया। न तकनीक थी, न पूंजी। पुर्जे बनाने से पहले उनके सांचे बनाने पड़ते, और वह भी शून्य से।

पर फिर घर में एक वाक्य गूंजा, जो उस पूरी पीढ़ी का वाक्य है।

"यह भी कर लेंगे।"

1954। पहला प्रयोग।

दुकान के पिछवाड़े में एक छोटी भट्ठी लगी। दो मजदूर और एक फोरमैन।

और दोनों भाई कारीगरों के साथ वहीं जमीन पर उकड़ूं बैठकर कागज पर पुर्जों के नक्शे बनाते थे।

पहली चीज जो बनाई गई, वह साइकिल का कांटा था वह हिस्सा जो पहिए को थामे रखता है।

और फिर वह हुआ, जिसने पूरा कारोबार डुबो दिया होता।

बाजार में गए कुछ कांटों की वेल्डिंग चटक गई। पाइप टूट गए।

डीलरों ने गुस्से में सारा माल वापस भेज दिया।

अब भाइयों के सामने दो ही रास्ते थे। कानूनी बहस, शर्तें, टालमटोल। या फिर नुकसान अपने सिर लेना।

उन्होंने अपनी सारी जमा-पूंजी निकाली और हर उस आदमी का पैसा लौटा दिया जिसे नुकसान हुआ था।

बिना सवाल पूछे।

जेब लगभग खाली हो गई।

पर एक चीज बच गई।

साख बच गई। और जब भाइयों ने कांटा दोबारा बनाकर बाजार में भेजा, तो उन्हीं डीलरों ने दोबारा हाथ बढ़ा दिया क्योंकि पिछली बार किसी का एक रुपया नहीं डूबा था।

फिर हैंडल की बारी आई।

उसके लिए भाई लुधियाना के रामगढ़िया मिस्त्रियों के पास गए। वह कारीगर बिरादरी, जिसके पास कोई डिग्री नहीं थी, पर जिसके हाथों में पीढ़ियों का हुनर था।

बृजमोहन लाल ने बाद में इस रिश्ते के बारे में कहा था कि वे जन्मजात कारीगर हैं, और उनका हुनर पीढ़ी दर पीढ़ी उतरता है। उनके हाथ में बनाने की ताकत थी, और मुंजालों के पास बाजार तक पहुंचाने की।

हैंडल बन गए।

और यहीं से एक बात तय हुई, जो आगे चलकर करोड़ों घरों तक पहुंची।

साइकिल कैसी होनी चाहिए?

तय हुआ कि सुंदर होने की कोई जरूरत नहीं। बोझ उठा सके। दूधवाला अपने कनस्तर टांग सके, किसान अपनी टोकरी रख सके।

मरम्मत आसान हो, पुर्जे हर जगह मिलें, और कीमत इतनी कम कि आम आदमी खरीद सके।

यह सोच कहीं किताब से नहीं आई थी।

शुरुआती बरसों में भाई मॉडल टाउन वाले घर से गिल रोड की दुकान तक एक ही साइकिल पर लदकर जाते थे।

जिस चीज पर वे खुद एक साथ लदकर चलते थे, उसे बनाते वक्त उन्हें किसी सर्वे की जरूरत नहीं पड़ी।

1956। पंजाब सरकार से साइकिल बनाने का लाइसेंस मिला। बैंक से पचास हजार का कर्ज लिया गया।

पहले साल कुल छह सौ उनतालीस साइकिलें बनीं।

आगे की कहानी आप जानते हैं। 1986 में वह कंपनी गिनीज बुक में दर्ज हुई दुनिया की सबसे बड़ी साइकिल निर्माता के तौर पर।

और यहीं यह कहानी खत्म हो जानी चाहिए थी।

हो जाती, अगर ओम प्रकाश मुंजाल सिर्फ कारखानेदार होते।

वे नहीं थे।

ओम प्रकाश मुंजाल शायर थे।

उर्दू में लिखते थे। अपने शेर सिर्फ शायरों की महफिल में नहीं, कारखानेदारों और अफसरों के बीच भी सुना देते थे।

लुधियाना की एक कारोबारी सभा की पुरानी अखबारी रिपोर्ट में दर्ज है कि उन्होंने राज्यपाल का परिचय तक शायरी में कराया। और रिपोर्ट में एक शब्द जुड़ा है "हमेशा की तरह।"

यानी यह कोई एक दिन की अदा नहीं थी।

वे अदीब इंटरनेशनल नाम की संस्था के संस्थापक सदस्यों में थे, और आखिर तक उसके मुख्य संरक्षक रहे। लुधियाना का सांस्कृतिक समागम उन्हीं के दम पर चलता रहा।

उनके जाने के दिन उस संस्था के अध्यक्ष और उर्दू लेखक केवल धीर ने अखबार से कहा था कि उत्तर भारत में उर्दू शायरी को जिंदा रखने में इसी आदमी का सबसे बड़ा हाथ था।

एक कारखानेदार के बारे में यह वाक्य किसी और के लिए कहा गया हो, याद नहीं आता।

और अब वह चीज, जो मुझे इस पूरी रिसर्च में सबसे आखिर में मिली और जिसने कहानी का घेरा बंद कर दिया।

हीरो हर साल एक डायरी छापता था।

उस डायरी में ओम प्रकाश मुंजाल के अपने शेर होते थे। पर सिर्फ अपने नहीं।

उसमें उन नए शायरों की पंक्तियां भी छपती थीं, जिन्हें कोई नहीं जानता था। जिनका कहीं छपना अभी बाकी था।

उनके जाने के अगले दिन एक अखबार ने लिखा कि यह सिलसिला पचपन बरस से ज्यादा चला, और उन डायरियों की दो लाख से ऊपर प्रतियां छपीं।

दोनों बातें एक साथ रखकर देखिए।

एक आदमी को, जब उसके पास कुछ नहीं बचा था, एक जाते हुए इंसान ने अपना नाम दे दिया था।

और उस आदमी ने बाकी उम्र यही किया अनजान लोगों को अपनी डायरी में जगह देता रहा।

जो मिला था, वही आगे बांट दिया।

साहित्य में उनके काम के लिए पंजाब के राज्यपाल ने उन्हें साहिर सम्मान दिया।

यानी लुधियाना के सबसे बड़े शायर के नाम वाला सम्मान, लुधियाना के सबसे बड़े कारखानेदार को।

आखिरी हिस्सा।

जुलाई 2015 में उन्होंने कंपनी की कमान अपने बेटे पंकज को सौंप दी।

उसके तीन हफ्ते बाद, 13 अगस्त को, वे नहीं रहे। छियासी बरस के थे।

जिस अस्पताल में उनकी सांस टूटी, उसका नाम हीरो हार्ट सेंटर है। उसे खड़ा करने में उन्हीं के परिवार के हीरो समूह की बड़ी भूमिका थी।

यानी जो नाम एक जाते हुए आदमी ने उन्हें दिया था, आखिरी दिन वही नाम उनके सिरहाने लिखा था।

और एक बात, जिस पर शायद किसी की नजर नहीं गई।

अगले दिन उनकी अंतिम यात्रा मॉडल टाउन वाले घर से निकली।

वही मॉडल टाउन, जहां से बरसों पहले भाई एक ही साइकिल पर लदकर दुकान जाया करते थे।

और फिर, आठ महीने के भीतर, बाकी भाई भी चले गए।

जो लड़के कभी सब कुछ छोड़कर एक साथ सरहद के इस पार आए थे, वे लगभग एक साथ ही विदा हुए।

अब मेरी बात।

मैं बरसों से दूसरों की लिखी खबरें दुरुस्त करता हूं। नाम, तारीख, हिज्जे दिन भर यही जांचता रहता हूं।

और आज तक मैं यह मानकर बैठा था कि 'हीरो' कोई अंग्रेजी शब्द है, जो किसी विज्ञापन वाले के दिमाग की उपज होगा।

आज इस पोस्ट पर रिसर्च करते हुए पता चला कि वह नाम एक ऐसे आदमी का दिया हुआ है, जो सामान बांधकर सरहद के उस पार जा रहा था।

जो चीज हमारे घरों के बाहर बरसों से खड़ी रही, उसके नाम तक की कहानी हमने कभी नहीं पूछी।

आज हिंदुस्तान में हर साल करोड़ों साइकिलें बिकती हैं, और उनमें सबसे पहचाना हुआ नाम अब भी वही है। कंपनी अब बिजली से चलने वाली साइकिलें भी बना रही है।

लुधियाना को आज भी साइकिलों का शहर कहा जाता है।

एक आदमी जाते-जाते उन्हें एक नाम दे गया था।

उन्होंने उस नाम को दुनिया के सबसे बड़े कारखाने तक पहुंचा दिया।

पर उससे बड़ी बात शायद यह है कि उस नाम के साथ जो नेकी मिली थी, उसे उन्होंने अपने पास नहीं रखा।

वो तीन बातें, जो मैं इस रिसर्च से निकालकर अपनी डायरी में लिख रहा हूं।

1. जब कोई आपका माल लौटाए, तो सबसे सस्ता रास्ता बहस है और सबसे महंगा रास्ता पैसा लौटाना। पर बहस में साख जाती है, और पैसे में सिर्फ पैसा। मुंजाल भाइयों ने जेब खाली की और साख बचा ली और अगला ऑर्डर उसी साख पर आया।

2. जो चीज आपको मुफ्त में मिली है, उसे रोककर मत रखिए। एक नाम मुफ्त मिला था, तो उम्र भर अनजान शायरों को डायरी में जगह मुफ्त मिलती रही। कर्ज इसी तरह उतरता है।

3. जिस चीज को आप खुद रोज बरतते हैं, उसे बनाने में आपसे बेहतर कोई नहीं। भाई खुद एक ही साइकिल पर लदकर चलते थे इसीलिए उन्हें पता था कि उसे कितना बोझ उठाना है।

ये तीन बातें अब यहीं दर्ज हैं। जिस दिन लगे कि आपके पास शुरू करने लायक कुछ नहीं बचा, ये इसी पोस्ट में मिल जाएंगी।

यह कहानी उस आदमी तक पहुंचनी चाहिए, जो अभी-अभी सब कुछ गंवाकर खाली हाथ खड़ा है और सोच रहा है कि अब क्या बचा। और उस हिंदुस्तानी तक भी, जिसका परिवार कभी सरहद के उस पार था, या जो आज किसी और मुल्क में बैठकर अपने पुराने घर की तस्वीर देखता है। क्योंकि यह कहानी उसी दरवाजे से शुरू होती है।

इस पन्ने पर कोई कहानी अंदाजे से नहीं लिखी जाती। हर तारीख जांची जाती है, और जो पुष्ट न हो, वह छोड़ दिया जाता है चाहे वह कितनी ही खूबसूरत क्यों न हो।

और मुझे एक बात बताइए।

आपके घर में कोई एक चीज ऐसी जरूर होगी, जो किसी बुजुर्ग की निशानी है कोई साइकिल, कोई घड़ी, कोई ट्रंक, कोई सिलाई मशीन।

उसका नाम आज यहां लिख दीजिए। मैं एक-एक पढ़ूंगा और हो सकता है किसी दूसरे घर में उसी चीज की कोई और कहानी निकल आए।

बुजुर्ग की निशानी है कोई साइकिल, कोई घड़ी, कोई ट्रंक, कोई सिलाई मशीन : हीरोसाइकिल ओमप्रकाश मुंजाल लुधियाना बंटवारा करीमदीन

Rahul Mishra

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