महावीर के उपदेश : सेठ मोतीशा
“सेठ मोतीशा को फाँसी देते समय दो बार फाँसी का मंच टूट गया, तब रानी विक्टोरिया ने कहा—‘यह कोई साधारण आदमी नहीं है, इसकी फाँसी की सज़ा रद्द कर दो।’”
जैन शासन की प्रभावशाली परंपरा में अनेक महान श्रावकों ने धर्म, दान, जीवदया और जिनभक्ति के माध्यम से अपना जीवन सार्थक किया है। उन्हीं महान श्रावकों में सेठ मोतीशा का नाम अत्यंत श्रद्धा से लिया जाता है।
19वीं सदी में जन्मे मोतीशा सेठ ने अपने लगभग 54 वर्ष के जीवन में अनेक धार्मिक, सामाजिक और सेवाभावी कार्य किए और लोगों के हृदय में अमर हो गए। मुंबई के भायखला में उन्होंने ऐसा जिनालय बनवाया, जो आज भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र है। कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहाँ आकर शत्रुंजय तीर्थ की भावयात्रा करते हैं।
मोतीशा सेठ की दिनचर्या एक आदर्श श्रावक जैसी थी। वे धन-संपत्ति से अधिक परमात्मा को महत्व देते थे। नवकारशी, अष्टप्रकारी पूजा, प्रवचन, भक्ति, जीवदया, अनुकंपा, दान, पांजरापोल और वैयावच्च जैसे कार्यों में वे सदैव अग्रणी रहते थे।
उनके पूर्वज राजस्थान के पाली से गुजरात आए थे। उनके पिता अमीचंदभाई का जन्म खंभात में हुआ था। व्यापार के लिए वे मुंबई आए और वहीं जीवन व्यतीत किया। मोतीशा सेठ ने मुंबई के सामाजिक और सेवाभावी कार्यों में भी उदारतापूर्वक दान दिया। इसीलिए उन्हें धर्मवीर, कर्मवीर और दानवीर कहा जाता था।
गायों को बचाने की घटना : एक दिन मोतीशा सेठ ने देखा कि कुछ गायों को कसाई रस्सी से बाँधकर कत्लखाने ले जा रहा है। यह दृश्य देखकर उनकी करुणा जाग उठी। उन्होंने अपने बॉडीगार्ड को आदेश दिया कि किसी भी कीमत पर गायों को छुड़ाकर गौशाला में पहुँचा दिया जाए।
बॉडीगार्ड ने कसाई को समझाने का प्रयास किया, लेकिन वह गायों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुआ। विवाद बढ़ गया और दुर्भाग्य से हाथापाई में कसाई को चोट लगी तथा कुछ ही समय बाद उसकी मृत्यु हो गई। मोतीशा सेठ ने इस घटना की पूरी जिम्मेदारी स्वयं अपने ऊपर ले ली। उन्होंने पुलिस से कहा कि “मेरे आग्रह के कारण गायों को छुड़ाने का प्रयास हुआ। मेरे बॉडीगार्ड का इसमें कोई दोष नहीं है। यदि किसी को सजा देनी है तो मुझे दी जाए।”
मामला अदालत में पहुँचा। सेठ ने अपनी जिम्मेदारी स्वीकार की, इसलिए न्यायाधीश ने उन्हें फाँसी की सजा सुनाई। लोगों ने उन्हें समझाया कि उन्होंने स्वयं कसाई की हत्या नहीं की है, इसलिए अदालत में अपना पक्ष रखें। लेकिन मोतीशा सेठ अपने निर्णय पर अडिग रहे और अपने सेवक को बचाने की जिम्मेदारी से पीछे नहीं हटे।
फाँसी के समय अद्भुत घटना : फाँसी के दिन उन्हें जेल से फाँसी के मंच तक लाया गया। उस समय भी वे पूरी तरह शांत थे और नवकार महामंत्र में लीन थे। उन्होंने सभी जीवों से क्षमायाचना की और परमात्मा की शरण ग्रहण की।
जैसे ही फाँसी देने की प्रक्रिया शुरू हुई, फाँसी का मंच अचानक टूट गया और मोतीशा सेठ बच गए। यह समाचार ब्रिटेन की रानी विक्टोरिया तक पहुँचा। इसके बाद फिर से फाँसी का दिन निश्चित किया गया। मोतीशा सेठ ने अपनी अंतिम इच्छा के रूप में कहा कि फाँसी से पहले वे अपने आराध्य परमात्मा की पूजा करना चाहते हैं। उन्हें मंदिर ले जाया गया। उन्होंने अत्यंत भावपूर्वक अष्टप्रकारी पूजा की, भगवान को स्वर्ण-वरख चढ़ाया और भाव-विभोर होकर प्रार्थना की—
“मैं आपका बालक हूँ, आपकी शरण में आया हूँ। आप मेरी रक्षा करना… रक्षा करना…” इसके बाद उन्हें फिर फाँसी के मंच पर लाया गया। वे नवकार महामंत्र में लीन थे। जैसे ही फाँसी की प्रक्रिया दोबारा शुरू हुई, फिर से मंच टूट गया। लेख के अनुसार ऐसी घटना तीन बार हुई। इससे जेलर, न्यायाधीश और अंग्रेज सरकार भी आश्चर्यचकित रह गई।
अंततः यह बात रानी विक्टोरिया तक पहुँची। उन्होंने मोतीशा सेठ की परमात्मा-भक्ति, दयालुता और जीवदया की भावना को देखते हुए उनकी फाँसी की सजा समाप्त करने का आदेश दिया और उनकी इच्छा पूरी करने की बात कही।
लेख का मुख्य संदेश यह है कि सच्ची प्रभु-भक्ति, जीवदया, करुणा और धर्म के प्रति दृढ़ श्रद्धा मनुष्य को कठिन से कठिन परिस्थिति में भी आंतरिक शक्ति देती है।
“प्रभु को भजने वाला कभी टूटता नहीं; दुःख और दोषों से मुक्ति का रामबाण उपाय प्रभु-भक्ति है।”
आचार्य राजरक्षितसूरिजी


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