“तुम पाँचों भाई वन में जाओ। वहाँ जो कुछ भी अद्भुत या विचित्र दिखाई दे, उसे देखकर मेरे पास लौट आओ।
महाभारत के युद्ध की समाप्ति के पश्चात, जब समय का चक्र पुनः अपनी सामान्य गति से चलने लगा, तब एक दिन भगवान श्रीकृष्ण ने पाँचों पांडवों को आज्ञा दी—
“तुम पाँचों भाई वन में जाओ। वहाँ जो कुछ भी अद्भुत या विचित्र दिखाई दे, उसे देखकर मेरे पास लौट आओ। मैं तुम्हें उसका प्रभाव और अर्थ समझाऊँगा।”
पाँचों पांडव वन की ओर प्रस्थान कर गए।
सबसे पहले धर्मराज युधिष्ठिर ने एक विचित्र दृश्य देखा। उन्होंने देखा कि एक हाथी की दो सूँड हैं। यह दृश्य उन्हें अत्यंत आश्चर्यजनक लगा।
दूसरी ओर अर्जुन ने देखा कि एक पक्षी है, जिसके पंखों पर वेदों की ऋचाएँ अंकित हैं, किंतु वह मृत मांस का भक्षण कर रहा है। यह दृश्य भी उन्हें चकित कर गया।
तीसरा आश्चर्य भीम ने देखा। उन्होंने देखा कि एक गाय ने बछड़े को जन्म दिया है और उसे इतना अधिक चाट रही है कि बछड़ा लहूलुहान हो गया है।
चौथा दृश्य सहदेव ने देखा। उन्होंने पाया कि छह-सात कुएँ पास-पास हैं। चारों ओर के कुओं में पानी भरा है, किंतु बीच का कुआँ—जो सबसे गहरा है—पूरी तरह सूखा पड़ा है।
पाँचवें भाई नकुल ने भी एक अद्भुत दृश्य देखा। उन्होंने देखा कि पर्वत की चोटी से एक विशाल शिला लुढ़कती हुई नीचे आई। वह अनेक वृक्षों के तनों से टकराई, कई चट्टानों से टकराई, पर कहीं भी रुक न सकी। अंततः एक अत्यंत छोटे से पौधे का स्पर्श होते ही वह शिला वहीं स्थिर हो गई।
इन सभी दृश्यों को देखकर पाँचों पांडव अत्यंत विस्मित थे। सायंकाल वे श्रीकृष्ण के पास लौटे और अपने-अपने अनुभवों का वर्णन किया।
युधिष्ठिर ने कहा—
“प्रभु, मैंने दो सूँड वाला हाथी देखा। यह मेरे लिए अत्यंत आश्चर्यजनक था।”
श्रीकृष्ण बोले—
“कलियुग में ऐसे शासक होंगे जो दोनों ओर से शोषण करेंगे। उनकी कथनी और करनी में भेद होगा। वे कुछ कहेंगे और कुछ करेंगे। ऐसे लोगों का शासन होगा, इसलिए तुम पहले धर्मपूर्वक राज्य कर लो।”
इसके बाद अर्जुन ने अपने देखे हुए पक्षी का वर्णन किया।
इस पर श्रीकृष्ण बोले—
“कलियुग में ऐसे लोग होंगे जो बड़े-बड़े विद्वान और धर्माचार्य कहलाएँगे, किंतु उनकी दृष्टि केवल धन पर होगी। वे अवसर खोजते रहेंगे कि कौन मरे और उसकी संपत्ति हमारे नाम हो जाए। चाहे वे कितने ही ऊँचे पद पर क्यों न हों, उनका मन लोभ से मुक्त नहीं होगा। ऐसे लोगों की संख्या अधिक होगी, सच्चे संत विरले ही होंगे।”
भीम ने गाय और बछड़े का दृश्य सुनाया।
श्रीकृष्ण बोले—
“कलियुग में लोग अपने बच्चों के प्रति इतना अधिक मोह करेंगे कि उनके स्वतंत्र विकास का मार्ग ही बंद कर देंगे। यदि किसी का पुत्र साधु बने तो समाज उसे पूजेगा, किंतु यदि अपना पुत्र वैसा करे तो लोग विलाप करेंगे। इस अति - ममता में मनुष्य अपने बच्चों को बंधनों में जकड़ देगा।
वास्तव में पुत्र-पुत्रियाँ तुम्हारी संपत्ति नहीं हैं—
यह शरीर मृत्यु की अमानत है और आत्मा परमात्मा की। जो इस सत्य को जान लेता है, वही भवसागर पार करता है।”
सहदेव ने सूखे कुएँ का वर्णन किया।
कृष्ण बोले—
“कलियुग में लोग विवाह, उत्सव और दिखावे पर अपार धन खर्च करेंगे, किंतु पास में कोई भूखा हो तो उसकी ओर दृष्टि भी नहीं डालेंगे। विलास, व्यसन और भोग में धन लुटाया जाएगा, पर किसी के आँसू पोंछने की इच्छा नहीं होगी। जिनके हृदय में करुणा शेष रहेगी, उन पर कलियुग का नहीं, ईश्वर का प्रभाव होगा।”
अंत में नकुल ने शिला और छोटे पौधे का प्रसंग सुनाया।
श्रीकृष्ण बोले—
“कलियुग में मानव का मन पतन की ओर जाएगा। न धन की चट्टानें उसे रोक पाएँगी, न सत्ता के वृक्ष। किंतु हरिनाम का एक छोटा-सा अंकुर, हरि-कीर्तन का एक छोटा-सा बीज, उसके पतन को रोक सकता है।”
यद्यपि ये दृश्य पांडवों ने उस युग में देखे थे, किंतु कलियुग में वे अपनी पूर्ण सत्यता के साथ प्रकट होते दिखाई देते हैं।
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