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इंदौर

कण-कण हुआ मैयामयी : शिखर पर पहुँची आस्था, शक्ति की साधना में लीन हुआ जन-मन : अष्टमी-नवमी की ओर बढ़ते कदमों के साथ चरम पर पहुंची नवरात्रि की महिमा

📅 30 November -0001, 12:00 AM • ✍️ नितिनमोहन शर्मा • ⏱️ 7 मिनट में पढ़ें
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कण-कण हुआ मैयामयी : शिखर पर पहुँची आस्था, शक्ति की साधना में लीन हुआ जन-मन :  अष्टमी-नवमी की ओर बढ़ते कदमों के साथ चरम पर पहुंची नवरात्रि की महिमा
कण-कण हुआ मैयामयी : शिखर पर पहुँची आस्था, शक्ति की साधना में लीन हुआ जन-मन : अष्टमी-नवमी की ओर बढ़ते कदमों के साथ चरम पर पहुंची नवरात्रि की महिमा

 डांडिया की थाप, गूंजते जयकारे और अखंड ज्योति की लौ में पिघला हर भेद 

 कला और आस्था के अद्भुत संगम से पंडालों में उतरी साक्षात् देवलोक की आभा 

 भक्ति का चरमोत्कर्ष, हवा में सिंदूरी महक, दिलों में मां का वास, नव-ऊर्जा से स्पंदित हुई सृष्टि 

भव्य पंडालों और रोशनी के महासागर के बीच नतमस्तक हुआ इंदौर, हर आंख में श्रद्धा के आंसू 

  • बिजासन टेकरी की पहाड़ियों से उतरती भोर की पहली किरण जब इंदौर के सुवर्ण शिखरों को चूमती है, और छप्पन दुकान से लेकर सराफा की गलियों तक धूप-गुग्गुल की महक के साथ जब समूचा शहर ‘जय माता दी’ के आलाप से गूंज उठता है, तब समझ आता है कि आस्था का महाशिखर क्या होता है। होल्कर कालीन रजवाड़े की ऐतिहासिक प्राचीर गवाह है कि इंदौर में नवरात्रि सिर्फ एक पर्व नहीं, बल्कि भक्ति की वो दिव्य मस्ती है जहाँ अहिल्या की इस नगरी का हर दिल मैयामयी हो चुका है।
  • शहर के भव्य पंडालों में सजी माँ भवानी की प्रतिमाओं का सौंदर्य ऐसा, मानो कलाकारों ने मिट्टी में साक्षात् प्राण फूंक दिए हों। यह इंदौर की ही तासीर है जहाँ रात के सन्नाटे को चीरती गरबे की थाप मनोरंजन नहीं, बल्कि सात्विक साधना का नृत्य-नमन बन जाती है, जहाँ पारंपरिक चनिया-चोली और धोती-कुर्ते में सजे हजारों कदम एक ताल में थिरककर आदिशक्ति के चरणों में अर्घ्य देते हैं। इस समय इंदौर अपनी चिर-परिचित जीवंतता के साथ भक्ति, कला और स्वाद के उस अनूठे त्रिवेणी संगम में डूबा है, जहाँ आँखें श्रद्धा से नम हैं और समूचा शहर माँ की ममतामयी छांव में निहाल है। नवरात्रि का पर्व अब भक्ति की उस दिव्य मस्ती पर पहुँच चुका है, जहाँ आत्मा और परमात्मा के बीच का हर फासला मिट गया है। 

    नितिनमोहन शर्मा...✍️ 

    शरद ऋतु की सुहानी धूप और हवा में घुली सिंदूरी महक के बीच नवरात्रि उत्सव अब अपने चरम पर पहुंच चुका है। देश का कोना-कोना इस समय साक्षात् शक्ति साधना का जीवंत केंद्र बन गया है। मंदिरों के शिखरों से गूंजती घंटियों की सुरीली ध्वनि, धूप-गुग्गुल की अलौकिक सुगंध और ‘जय माता दी’ के गगनभेदी जयकारों ने हवा में एक ऐसा आध्यात्मिक सम्मोहन घोल दिया है, जहां हर हृदय केवल और केवल भक्ति के रस में सराबोर है। यह केवल नौ दिनों का व्रत नहीं, बल्कि आत्मा का परमात्मा से मिलन का एक महा-अनुष्ठान बन चुका है। 

    भक्ति और कला का अद्भुत संगम भी देखने को मिल रहा है। इस वर्ष का नवरात्रि उत्सव सौंदर्य और कलात्मकता की नई ऊंचाइयों को छू रहा है। भव्य पंडालों में स्थापित मां दुर्गा की प्रतिमाएं सिर्फ मिट्टी की मूर्तियां नहीं, बल्कि शिल्पकारों की अगाध श्रद्धा और कला की पराकाष्ठा हैं। मां के नयनों की करुणा, सिंह की जीवंतता और महिषासुर के संहार का दृश्य भक्तों को भाव-विभोर कर रहा है। दिन ढलते ही सड़कों पर रोशनी का महासमुद्र लहरा जाता है। रात होते ही पंडाल और मंदिर आधुनिक प्रकाश व्यवस्था से जगमगा उठते हैं, मानो आसमान के सारे सितारे मां की आरती उतारने जमीं पर उतर आए हों। 

    अष्टमी और नवमी की ओर बढ़ते इन कदमों के साथ भक्तों की साधना अब अपने अंतिम और सबसे कड़े दौर में है। अखंड ज्योति की लौ में भक्त अपने भीतर के अंधकार को मिटाने का संकल्प ले रहे हैं। यह उत्सव याद दिलाता है कि स्त्री शक्ति ही सृष्टि का मूल आधार है। आज जब पूरा देश मां के नौ रूपों के सामने नतमस्तक है, तब हर आंख में एक ही प्रार्थना है— हे मां! अपनी करुणा की यह छांव इस संसार पर हमेशा बनाए रखना। 

     रातभर थिरक रहे कदम, 'मिनी मुंबई' में भक्ति का महासैलाब 

    देश की सबसे स्वच्छ नगरी इंदौर इस समय पूरी तरह से देवी भक्ति और गरबे के उल्लास में डूब चुकी है। शहर के दुर्गा पंडालों में माता के दर्शन के लिए भक्तों का ऐसा जनसैलाब उमड़ रहा है कि देर रात तक सड़कों पर पैर रखने की जगह नहीं मिल रही है। रीगल चौराहा, विजय नगर, अन्नपूर्णा और केसरीबाग जैसे प्रमुख इलाकों में बने भव्य और कलात्मक पंडाल इस समय आकर्षण का मुख्य केंद्र हैं, जहां महाआरती के समय हजारों हाथ एक साथ मां की अगवानी में उठ रहे हैं।

    दूसरी ओर, शहर के पारंपरिक और कमर्शियल गरबा आयोजनों में धूम मची हुई है। पारंपरिक वेषभूषा (चनिया-चोली और धोती-कुर्ते) में सजे हजारों युवा जब गुजराती और मालवी लोकगीतों की थाप पर एक ताल में डांडिया घुमाते हैं, तो समां बंध जाता है। इंदौर की खास बात यह है कि यहाँ उत्सव सिर्फ पंडालों तक सीमित नहीं है। रात के 2 बजे भी छप्पन दुकान और सराफा बाजार में गरबा प्रेमियों की भारी भीड़ फलाहारी साबूदाना खिचड़ी, खोपरा पैटीस और शिकंजी का लुत्फ उठा रही है। पूरा शहर जाग रहा है, और सुरक्षा के कड़े इंतजामों के बीच महिलाएं और परिवार बेखौफ होकर इस उत्सव का आनंद ले रहे हैं।

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