पुलिसिया गाथा : पीटीआरआई में नया प्रयोग या प्रशासनिक मजबूरी? टीआई को संस्थान सुरक्षा और टेलीफोन ड्यूटी ने खड़े किए कई सवाल?
विशेष टिप्पणी : राजेन्द्र सिंह जादौन
भोपाल. भोपाल स्थित पुलिस प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान (पीटीआरआई) में हाल ही में जारी एक प्रशासनिक आदेश पुलिस महकमे में चर्चा का विषय बन गया है। चर्चा इस बात को लेकर है कि एक टीआई अर्थात निरीक्षक स्तर के अधिकारी को संस्थान सुरक्षा और टेलीफोन ड्यूटी की जिम्मेदारी सौंपी गई है। पुलिस विभाग के लंबे इतिहास में यह कोई बहुत सामान्य व्यवस्था नहीं मानी जाती, इसलिए आदेश के सामने आते ही पुलिसकर्मियों, सेवानिवृत्त अधिकारियों और प्रशासनिक मामलों को समझने वालों के बीच सवालों का दौर शुरू हो गया है।
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि पुलिस विभाग एक अनुशासित और पदानुक्रम आधारित संगठन है। यहां प्रत्येक पद की अपनी भूमिका और जिम्मेदारियां निर्धारित होती हैं। सिपाही से लेकर पुलिस महानिदेशक तक हर स्तर के अधिकारी और कर्मचारी को उनकी योग्यता, अनुभव और प्रशासनिक जिम्मेदारियों के अनुरूप कार्य दिए जाते हैं।
सामान्य परिस्थितियों में निरीक्षक स्तर के अधिकारी से नेतृत्व, पर्यवेक्षण, प्रशिक्षण, कानून-व्यवस्था प्रबंधन और प्रशासनिक नियंत्रण जैसी जिम्मेदारियों की अपेक्षा की जाती है। वहीं संस्थान सुरक्षा, प्रवेश नियंत्रण, ड्यूटी रजिस्टर का रख-रखाव अथवा टेलीफोन संचालन जैसी व्यवस्थाएं आमतौर पर अधीनस्थ कर्मचारियों के माध्यम से संचालित होती रही हैं।
यही कारण है कि जब यह जानकारी सामने आई कि एक टीआई को संस्थान सुरक्षा और टेलीफोन ड्यूटी पर लगाया गया है, तो लोगों ने इसे एक असामान्य निर्णय के रूप में देखा। हालांकि यह भी उतना ही सच है कि अब तक सार्वजनिक रूप से ऐसा कोई नियम सामने नहीं आया है जो यह कहता हो कि निरीक्षक स्तर के अधिकारी को ऐसी ड्यूटी नहीं दी जा सकती। प्रशासनिक अधिकारों के अंतर्गत किसी भी अधिकारी को विशेष परिस्थितियों में अलग-अलग दायित्व सौंपे जा सकते हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि ऐसी आवश्यकता आखिर उत्पन्न क्यों हुई?
यदि पीटीआरआई में कर्मचारियों की कमी है, तो यह अपने आप में एक गंभीर विषय है। यदि संस्थान के पास पर्याप्त अधीनस्थ बल उपलब्ध नहीं है और उसकी भरपाई के लिए निरीक्षक स्तर के अधिकारी को इस प्रकार की जिम्मेदारी देनी पड़ रही है, तो यह प्रशासनिक संसाधनों की स्थिति पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। दूसरी ओर यदि यह केवल एक प्रशासनिक प्रयोग है, तो उसके उद्देश्य और परिणामों को भी स्पष्ट किया जाना चाहिए।
पुलिस विभाग में कार्य विभाजन केवल सुविधा का विषय नहीं होता बल्कि यह प्रशासनिक दक्षता का भी प्रश्न होता है। एक प्रशिक्षित निरीक्षक की सेवाएं उस कार्य में अधिक उपयोगी मानी जाती हैं जहां निर्णय क्षमता, अनुभव और नेतृत्व की आवश्यकता हो। ऐसे में यदि उसी अधिकारी को उन कार्यों में लगाया जाता है जिन्हें सामान्यतः अधीनस्थ स्तर पर संपादित किया जाता है, तो स्वाभाविक रूप से यह चर्चा का विषय बनता है कि क्या विभाग अपने मानव संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग कर रहा है।
इस मामले का दूसरा पहलू भी है। कुछ अधिकारियों का मानना है कि किसी भी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी के लिए कोई कार्य छोटा या बड़ा नहीं होता। यदि प्रशासनिक आवश्यकता हो तो किसी भी स्तर का अधिकारी किसी भी प्रकार की ड्यूटी कर सकता है। यह तर्क अपने स्थान पर सही है और पुलिस जैसी अनुशासित सेवा में आदेश का पालन सर्वोपरि माना जाता है। लेकिन इसके साथ यह सवाल भी जुड़ा हुआ है कि क्या ऐसी व्यवस्थाएं नियमित प्रशासनिक नीति का हिस्सा बननी चाहिए या फिर केवल असाधारण परिस्थितियों तक सीमित रहनी चाहिए।
पीटीआरआई कोई सामान्य कार्यालय नहीं है। यह वह संस्थान है जहां पुलिस बल के प्रशिक्षण, अनुसंधान और क्षमता विकास का कार्य होता है। यहां लिए गए निर्णय अक्सर पूरे विभाग के लिए संदेश का काम करते हैं। इसलिए यहां जारी होने वाला प्रत्येक आदेश सामान्य से अधिक महत्व रखता है। जब किसी प्रशिक्षण संस्थान में पदानुसार कार्य वितरण से अलग व्यवस्था दिखाई देती है तो स्वाभाविक रूप से उसकी चर्चा व्यापक स्तर पर होती है।
यह भी संभव है कि इस आदेश के पीछे कोई विशेष प्रशासनिक कारण हो जिसकी जानकारी अभी सार्वजनिक न हो। कई बार अनुशासनात्मक, प्रबंधन संबंधी अथवा अस्थायी परिस्थितियों के कारण ऐसे निर्णय लिए जाते हैं जिन्हें बाहरी दृष्टि से समझ पाना आसान नहीं होता। इसलिए किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले संस्थान प्रशासन का पक्ष भी सामने आना आवश्यक है।
फिलहाल जो तथ्य सामने हैं, वे केवल इतना बताते हैं कि एक टीआई को संस्थान सुरक्षा और टेलीफोन ड्यूटी का दायित्व सौंपा गया है। इस आदेश ने पुलिस महकमे में चर्चा जरूर पैदा कर दी है, लेकिन इसके पीछे की वास्तविक वजह अभी स्पष्ट नहीं है। यदि यह प्रशासनिक नवाचार है तो उसके उद्देश्य और परिणामों पर चर्चा होनी चाहिए। यदि यह संसाधनों की कमी का संकेत है तो उस पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। और यदि इसके पीछे कोई विशेष परिस्थिति है तो उसे सार्वजनिक किए जाने से भ्रम की स्थिति समाप्त हो सकती है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रशासनिक निर्णयों पर सवाल उठाना असामान्य नहीं है। सवाल उठाना और जवाब मांगना किसी भी संस्थान को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाता है। पीटीआरआई का यह आदेश भी उसी श्रेणी का विषय है, जिस पर तथ्य आधारित चर्चा होनी चाहिए। क्योंकि मामला केवल एक अधिकारी की ड्यूटी का नहीं, बल्कि प्रशासनिक कार्यप्रणाली, संसाधन प्रबंधन और संस्थागत व्यवस्था की समझ का भी है।
अब निगाहें इस बात पर हैं कि पीटीआरआई प्रशासन इस आदेश को लेकर क्या स्पष्टीकरण देता है। तब तक यह मामला पुलिस महकमे के गलियारों में चर्चा का विषय बना रहेगा और लोग यही पूछते रहेंगे कि आखिर ऐसी कौन-सी परिस्थिति आ गई कि निरीक्षक स्तर के अधिकारी को संस्थान सुरक्षा और टेलीफोन ड्यूटी की जिम्मेदारी सौंपनी पड़ी।
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