नरेंद्र मोदी की रीढ़ की हड्डी क्या टेढ़ी हो गई है..?
ओम कसारा "ओमेंद्र"
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चंद कॉकरोचों की खातिर जब धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेना पड़ा तो उस समय मेरा मन भी अन्य राष्ट्रभक्तों की तरह ही यह सोचकर बहुत आहत था कि नरेंद्र मोदी उन देश विरोधी ताकतों के सामने झुक गए जिनका उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी से नीचे उतारना है।
उस समय तक केंद्र सरकार सोनम वांगचुक का अनशन तुड़वाने में सफल हो गई थी और यह माना जा रहा था कि अब इस आंदोलन की धार कुंद पड़ गई है, जिससे कुछ ही समय में थकहार कर कॉकरोच जनता पार्टी को अपना आंदोलन समाप्त करना पड़ेगा। खास बात यह है कि वांगचुक के केंद्रीय मंत्रियों के हाथों जूस पीने से खुद विपक्ष भी सकते में था और यह मान बैठा था कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा होना लगभग असंभव है।
यही नहीं, जंतर-मंतर पर किए जा रहे प्रदर्शन में छात्रों के साथ शामिल अराजक तत्वों ने जिस प्रकार से 120 अधिकारियों और पुलिसकर्मियों को पीट-पीटकर अधमरा कर दिया उससे आमजन में यह धारणा बलवती होती जा रही थी कि सीजेपी का उद्देश्य सिर्फ छात्रों का हित नहीं बल्कि देश में कानून और व्यवस्था की स्थिति को समाप्त करना है और वो चाहते हैं कि भारत में भी बांग्लादेश, नेपाल व श्रीलंका जैसी स्थिति उत्पन्न करके मोदी सरकार का तख्ता पलट दिया जाए।
आमजन यह भी जान चुका था कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर मजबूरन बल प्रयोग किया अन्यथा असामाजिक तत्व जबरन संसद में प्रवेश कर अपने मंसूबे में कामयाब हो जाते। अब सवाल उठता है कि यदि वास्तव में ऐसा ही था और धीरे-धीरे स्थितियां केंद्र सरकार के पक्ष में होती जा रही थी तो फिर धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेकर देश के दुश्मनों का हौंसला क्यों बढ़ाया गया?
यहीं पर नरेंद्र मोदी की दूरदर्शी सोच नजर आती है, जो यह जानते थे कि इन आंदोलनकारियों में सिर्फ अराजक तत्व ही नहीं अपितु हमारे और आपके वो बच्चे भी शामिल हैं जिनका पेपर लीक होने पर भविष्य बर्बाद हो जाता है। इसीलिए मोदी उन पीड़ितों से सोशल मीडिया के द्वारा सीधे मुखातिब हुए और कहा कि पेपर लीक होना कोई साधारण समस्या नहीं है।
लिहाज़ा सरकार दोषियों को सजा दिलवाने के लिए एक कठोर बिल संसद में लाएगी और त्वरित कानूनी कार्यवाही के लिए फास्ट ट्रैक अदालतों का गठन करेगी तथा पेपर लीक समस्या के स्थाई समाधान हेतु उच्च स्तरीय समिति गठित की जाएगी। मजे की बात यह है कि मोदी ने जो कुछ कहा वह तत्काल ही कर दिखाया और जवाबदेही तय करते हुए संबंधित विभाग के 47 अधिकारियों को बर्खास्त कर धर्मेंद्र प्रधान का भी इस्तीफा ले लिया।
प्रधानमंत्री के इन निर्णयों से भारतवासियों में यह धारणा बलवती हुई है कि मोदी न तो युवा विरोधी है और न ही तानाशाह। हां, यहां नरेंद्र भाई द्वारा उठाए गए इन कदमों की टाइमिंग को लेकर सवाल जरूर खड़ा होता है कि उन्होंने विद्यार्थियों के प्रदर्शन की शुरुआत में ही ऐसा क्यों नहीं किया? तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि किसान आंदोलन हो या शाहीन बाग प्रकरण अथवा जंतर-मंतर पर मचा कोहराम! यह शुरू होते ही दबा दिए जाते तो भारत में ही रहने वाले उन भेदियों के चेहरे कैसे सामने आते जो विदेशी फंडिंग के सहारे हिंदुस्तान को तोड़ने का ख्वाब देखते हैं? ऐसों के खिलाफ पहले भी कार्यवाही हुई और अब भी कठोर कानूनी शिकंजा कसने का क्रम बदस्तूर जारी है।
दूसरी ओर, विपक्ष के हालात देखें तो पता चलता है कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का श्रेय अभिजीत दीपके ले गया और विरोधी दल के नेताओं के हाथ आया बाबाजी का ठुल्लू! संसद में इन विरोधियों का हाल यह है कि सरकार द्वारा लाए गए पेपर लीक संबंधी कठोर बिल पर चर्चा करने की बजाय वो अनावश्यक हंगामा करके उन देशद्रोहियों के पक्ष में खड़े नजर आ रहे है जिन्होंने पुलिस वालों पर हमला किया।
यही नहीं राहुल हो या अखिलेश, ऐसे सबके पेट में इस बात से जबर्दस्त ऐंठन हो रही है कि पुलिस भारत विरोधियों के विरुद्ध कार्यवाही क्यों कर रही है?सारांश यही कि अपनी खराब नियत और अदूरदर्शी सोच के चलते विपक्ष, पेपर लीक प्रकरण जैसा शानदार मुद्दा हाथ में आने के बाद भी वहीं खड़ा दिखता है जहां पहले था।
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