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गुरु पूर्णिमा विशेष...: एकदम लल्लन टॉप गुरुओं से ज्ञान लेकर यहाँ तक पहुँचे हैं पत्रकारिता में...!

📅 31 July 2026, 01:23 AM ✍️ paliwalwani ⏱️ 13 मिनट में पढ़ें
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गुरु पूर्णिमा विशेष...: एकदम लल्लन टॉप गुरुओं से ज्ञान लेकर यहाँ तक पहुँचे हैं पत्रकारिता में...!
गुरु पूर्णिमा विशेष...: एकदम लल्लन टॉप गुरुओं से ज्ञान लेकर यहाँ तक पहुँचे हैं पत्रकारिता में...!

व्यंग्यात्मक विशेष लेख – राजेन्द्र सिंह जादौन

हर फील्ड में किसी न किसी का कोई गुरु होता है। कोई गुरु स्कूल में मिलता है, कोई कॉलेज में, कोई नौकरी में और कुछ ऐसे भी गुरु मिल जाते हैं जो बिना फीस लिए पूरी जिंदगी का सिलेबस पढ़ा देते हैं। मेरा नसीब देखिए कि मुझे तो गुरुओं के भी गुरु मिले। अब यही वजह है कि पत्रकारिता में मैं जितना अपनी मेहनत से आगे बढ़ा हूँ, उससे कहीं ज्यादा अपने गुरुओं की डाँट, प्यार, फटकार और आशीर्वाद से यहाँ तक पहुँचा हूँ।

वैसे मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी विशेषता यही रही कि मैं कभी किसी लाइन में सीधे नहीं चला। जहाँ लोग सड़क देखते थे, वहाँ मुझे पगडंडी दिखाई देती थी। जहाँ लोग नियम देखते थे, वहाँ मुझे सवाल दिखाई देते थे। शायद यही वजह रही कि पत्रकारिता ने मुझे चुना, मैंने पत्रकारिता को नहीं।

जब मैं छोटा था, तब मेरी पहचान एक होनहार छात्र की कम और मोहल्ले के सबसे बड़े शरारती बच्चे की ज्यादा थी। घरवालों को रोज किसी न किसी की शिकायत सुननी पड़ती थी। लेकिन कहते हैं कि हर शरारत के पीछे एक ऊर्जा छिपी होती है, बस उसे दिशा देने वाला मिलना चाहिए।

मेरे जीवन में वह दिशा लेकर आए शिखर सम्मान से सम्मानित स्वर्गीय के. जी. त्रिवेदी। उन्होंने मुझे रंगकर्म का ऐसा संस्कार दिया कि मेरी शरारतें अभिनय में बदल गईं। उन्होंने बताया कि मंच केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, समाज को आईना दिखाने की प्रयोगशाला है। संवाद कैसे बोला जाता है, चेहरे के भाव क्या कहते हैं, मंच पर खामोशी भी कैसे बोलती है यह सब उन्हीं से सीखा। आज जब मैं व्यंग्य लिखता हूँ तो कई बार लगता है कि मेरे भीतर बैठा रंगकर्मी ही शब्दों को अभिनय करवा रहा है।

थोड़ी उम्र बढ़ी तो टीवी और मनोरंजन की दुनिया आकर्षित करने लगी। कैमरे के पीछे खड़े लोगों को देखकर लगता था कि असली जादू तो यही करते हैं। सोचा कि फोटोग्राफी का डिप्लोमा किया जाए। लेकिन एक छोटी-सी समस्या थी डिप्लोमा की फीस किसी तरह जमा हो गई, मगर कैमरा खरीदने की औकात नहीं थी।

उस समय कैमरा खरीदना किसी मध्यमवर्गीय परिवार के लिए सपना हुआ करता था। मोबाइल कैमरे का जमाना नहीं था कि हर जेब में स्टूडियो घूमता रहे। ऐसे समय में बड़े भाई रिजवान ने मेरी मदद की। उन्होंने मावल साहब से कुछ दिनों के लिए कोसिना कैमरा प्रैक्टिकल के लिए उधार दिलवा दिया। आज भी वह कैमरा याद आता है तो लगता है कि वह सिर्फ कैमरा नहीं, मेरे भविष्य का पहला टिकट था।

उधर मेरे मित्र और बड़े भाई जुबेर कुरैशी भी कम उस्ताद नहीं निकले। उन्होंने भी हर मोड़ पर मेरा साथ दिया। संघर्ष के दिनों में मित्र अगर साथ खड़े हो जाएँ तो आधी लड़ाई वैसे ही जीत ली जाती है।

दिल्ली की पत्रकारिता छोड़कर भोपाल आया तो लगा था कि राजधानी में अवसरों की कमी नहीं होगी। लेकिन भोपाल ने सबसे पहले मेरा परिचय बेरोजगारी से कराया। कई-कई दिन ऐसे गुजरते थे जब जेब में बस आने-जाने भर के पैसे भी नहीं होते थे। पत्रकारिता का जुनून पेट से बड़ा था, इसलिए संघर्ष चलता रहा।

इसी बीच मेरी मुलाकात हुई उस्तादों के भी उस्ताद ए. एम. फारूकी साहब से। उन्होंने मेरे कैमरे की समझ, फ्रेम बनाने की कला और फोटो के पीछे छिपे विचार को देखा। शायद उन्हें लगा कि यह लड़का अगर भूखा भी रहेगा तो कैमरा नहीं छोड़ेगा। उन्होंने मुझे एक अखबार में बतौर फोटो पत्रकार नौकरी दिलवा दी। उस दिन लगा कि जिंदगी ने पहली बार मेरे कंधे पर हाथ रखा है। लेकिन उस्ताद को शायद यह नहीं मालूम था कि मेरा और विवादों का रिश्ता जन्मों पुराना है।

नौकरी जॉइन किए ज्यादा समय भी नहीं हुआ था कि दशहरे पर शस्त्र पूजन का कार्यक्रम आया। तत्कालीन मुख्यमंत्री पुलिस की बंदूक से फायर कर रहे थे। मैंने वही तस्वीर खींची और अगले दिन अखबार में प्रकाशित हो गई।

बस फिर क्या था...

सरकार के माथे पर शिकन, विपक्ष के चेहरे पर मुस्कान, अखबार के मालिकों के हलक सूख गए और संपादकीय विभाग में सन्नाटा छा गया। फोन की घंटियाँ रुकने का नाम नहीं ले रही थीं।

उस्ताद फारूकी साहब ने मुझे बुलाया। मैं सोच रहा था कि आज नौकरी गई। लेकिन उन्होंने मुस्कुराते हुए धीमी आवाज़ में सिर्फ इतना कहा

"कमाल कर दिया..."

उन दो शब्दों में जितनी सीख थी, उतनी शायद किसी किताब में नहीं मिलती। उसी दिन समझ आया कि पत्रकार का कैमरा सिर्फ तस्वीर नहीं खींचता, कई बार सत्ता की धड़कन भी तेज कर देता है।

इसके बाद मैंने कला की दुनिया में भी अपनी किस्मत आजमाई। भोपाल की कई प्रतिष्ठित आर्ट गैलरियों में फोटो प्रदर्शनियाँ लगाईं। उद्घाटन शानदार हुए, मेहमान आए, कलाकारों ने तारीफ की, अखबारों में खबरें छपीं। मुझे लगा कि अब तस्वीरें बिकेंगी और नाम भी होगा। लेकिन हुआ वही जो अक्सर कलाकारों के साथ होता है।

जितनी तस्वीरें नहीं बिकीं, उससे कहीं ज्यादा पैसा फ्रेम, हॉल, निमंत्रण पत्र और चाय-नाश्ते में खर्च हो गया। तब समझ आया कि कला का पहला पुरस्कार ताली होती है, पैसा नहीं।

इसी दौरान मेरी गतिविधियों पर कुछ वरिष्ठ पत्रकारों की नजर पड़ी। शायद उन्हें लगा कि यह लड़का कैमरे से ज्यादा सवाल पूछता है। परिणाम यह हुआ कि मुझे तहलका एमपी-सीजी में भेज दिया गया। वहाँ कैमरे के साथ कलम भी हाथ में थमा दी गई।

शुरू-शुरू में लगा कि कैमरे वाला आदमी लिखेगा कैसे? लेकिन जैसे-जैसे खबरें लिखीं, महसूस हुआ कि तस्वीर और शब्द दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। फोटो सच दिखाती है और शब्द सच समझाते हैं।

यहीं से मेरी लेखनी का सफर तेज हो गया।

बाद में नागपुर से संचालित यूसीएन केबल नेटवर्क ने मेरी लेखनी पर भरोसा जताया और मुझे समूह संपादक की जिम्मेदारी सौंप दी। लोग मुझे संपादक कहने लगे, लेकिन अंदर बैठा कलाकार आज भी कैमरे की क्लिक सुनते ही जाग जाता है।

आज लोग पूछते हैं कि आपने पत्रकारिता क्यों चुनी?

मैं हमेशा हँसकर कहता हूँ

"साहब... हम पत्रकारिता में आए नहीं हैं, हमें पत्रकारिता में लाया गया है। यह हमारे कर्मों का फल है, जिसे हम बड़े आनंद से भुगत रहे हैं।"

वैसे पत्रकारिता भी बड़ा अजीब पेशा है। यहाँ छुट्टी वाले दिन सबसे बड़ी खबर आ जाती है। त्योहार पर घर जाने का कार्यक्रम बनाओ तो कोई घोटाला सामने आ जाता है। परिवार समझता है कि आदमी घर में है, लेकिन पत्रकार का दिमाग हमेशा घटनास्थल पर रहता है।

पत्रकारिता ने मुझे बहुत कुछ दिया पहचान दी, सम्मान दिया, मित्र दिए, विरोधी दिए, मुकदमे दिए, धमकियाँ दीं और सबसे बड़ी बात, लोगों का विश्वास दिया।

हाँ, कुछ लोगों ने यह भी समझाया कि पत्रकारिता केवल खबर लिखने का नाम नहीं है। यह सत्ता से सवाल पूछने की हिम्मत भी है और समाज के दर्द को शब्द देने की जिम्मेदारी भी।

इस सफर में अनेक ऐसे लोग मिले जिन्होंने बिना किसी स्वार्थ के मेरा हाथ थामा। कुछ जनसंपर्क अधिकारियों ने कठिन समय में सहयोग किया। कई वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों ने मेरी खबरों को गंभीरता से लिया। अनेक संपादकों ने मेरी गलतियाँ सुधारीं। कई साथियों ने प्रतिस्पर्धा की, तो कुछ ने प्रेरणा दी। मैं उन पाठकों को भी अपना गुरु मानता हूँ जिन्होंने मेरी खबरों पर सवाल पूछे। क्योंकि पाठक जब सवाल पूछता है, तभी पत्रकार बेहतर बनता है।

आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि यदि स्वर्गीय के. जी. त्रिवेदी मुझे रंगमंच का संस्कार न देते, यदि रिजवान भाई कैमरा न दिलवाते, यदि जुबेर कुरैशी साथ न देते, यदि ए. एम. फारूकी साहब अवसर न देते, यदि संपादकों ने भरोसा न किया होता, तो शायद मैं आज भी किसी चौराहे पर कैमरे का सपना देख रहा होता।

गुरु केवल वह नहीं होता जो किताब पढ़ाए। गुरु वह भी होता है जो गिरने पर उठना सिखाए, गलती पर डाँटे, सफलता पर सिर न चढ़ने दे और असफलता में कंधे पर हाथ रख दे। मुझे ऐसे ही गुरु मिले।

इस गुरु पूर्णिमा पर मैं उन सभी उस्तादों, गुरुओं, मित्रों, सहयोगियों, संपादकों, जनसंपर्क अधिकारियों, प्रशासनिक अधिकारियों और उन तमाम लोगों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ जिन्होंने किसी न किसी मोड़ पर मेरी उँगली पकड़कर आगे बढ़ाया।

अगर मेरी कलम में थोड़ी-सी धार है, तो वह मेरे गुरुओं की देन है।

अगर मेरे कैमरे की नजर में संवेदना है, तो वह मेरे उस्तादों का आशीर्वाद है।

अगर आज भी मैं सत्ता से सवाल पूछने का साहस रखता हूँ, तो वह उन लोगों का विश्वास है जिन्होंने मुझे सिखाया कि पत्रकार का सबसे बड़ा धर्म सत्ता की जय-जयकार करना नहीं, बल्कि सच का साथ देना है।

और अंत में उन लोगों का भी धन्यवाद, जिन्होंने रास्ते में मेरे पैर खींचे। क्योंकि अगर वे मुझे गिराने की कोशिश नहीं करते, तो शायद मुझे यह भी पता नहीं चलता कि मैं कितनी मजबूती से खड़ा हूँ।

आप सभी गुरुओं को सादर प्रणाम।

आप सबका स्नेह, आशीर्वाद और मार्गदर्शन यूँ ही बना रहे।

जय माँ जगदम्बा!

जय महाकाल!

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