जंतर-मंतर पर जेन-ज़ी और भोपाल में किसान, आखिर आंदोलन क्यों...?
संपादकीय : राजेन्द्र सिंह जादौन
लोकतंत्र बड़ा अजीब जीव है। चुनाव के समय जनता भगवान बन जाती है, चुनाव खत्म होते ही वही जनता "डेटा" बन जाती है। किसान "अन्नदाता" कहलाता है, युवा "देश का भविष्य" और मध्यम वर्ग "टैक्सपेयर"। लेकिन जैसे ही ये तीनों सवाल पूछने लगते हैं, इनके नाम बदल जाते हैं। किसान "आंदोलनकारी" हो जाता है, युवा "भ्रमित" और आम आदमी "विपक्ष के बहकावे में आया हुआ"।
पिछले कुछ दिनों की दो तस्वीरें पूरे लोकतंत्र का एक्स-रे करने के लिए काफी हैं। दिल्ली के जंतर-मंतर पर जेन-ज़ी की नई पीढ़ी थी। भोपाल में मध्यप्रदेश का किसान था। दोनों के मुद्दे अलग थे, लेकिन दोनों की मंजिल एक थी सरकार हमें सुन ले।
उधर देश का प्रधान था, इधर प्रदेश का प्रधान। उधर शिक्षा व्यवस्था पर सवाल थे, इधर खेती-किसानी की व्यवस्था पर। उधर सोशल मीडिया के मीम और वायरल वीडियो थे, इधर ट्रैक्टर, झंडे और "जय किसान" के नारे। लेकिन दोनों जगह लोकतंत्र की एक ही तस्वीर दिखाई दे रही थी जनता को अपनी बात कहने के लिए सड़क पर आना पड़ा।
देश और प्रदेश दोनों जगह एक ही राजनीतिक दल की सरकार है। भाषणों में विकास है, विज्ञापनों में उपलब्धियाँ हैं, सोशल मीडिया पर उपलब्धियों की रीलें हैं और मंचों से "सबका साथ-सबका विकास" की गूंज है। मध्यप्रदेश सरकार ने तो वर्ष 2026 को "कृषक कल्याण वर्ष" घोषित किया। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि किसान कल्याण वर्ष चल रहा है तो किसान सड़क पर क्यों है? यदि नई शिक्षा व्यवस्था भविष्य गढ़ रही है तो भविष्य जंतर-मंतर पर क्यों बैठा है?
कहते हैं लोकतंत्र में जनता मालिक होती है। लेकिन आजकल मालिक को अपनी बात सुनाने के लिए पहले आवेदन देना पड़ता है, फिर पोर्टल पर पंजीयन कराना पड़ता है, फिर ई-टोकन लेना पड़ता है, फिर ज्ञापन देना पड़ता है, फिर इंतजार करना पड़ता है और अंत में जब कोई रास्ता नहीं बचता तो सड़क पर उतरना पड़ता है। लगता है लोकतंत्र भी अब ऑनलाइन हो गया है, बस "सुनवाई" वाला सर्वर अक्सर डाउन रहता है।
भोपाल में किसान मूंग की खरीदी, समर्थन मूल्य, ई-टोकन और भुगतान जैसी समस्याओं को लेकर आंदोलन कर रहे थे। यह केवल फसल का सवाल नहीं था, यह भरोसे का सवाल था। किसान को भरोसा चाहिए कि उसकी मेहनत का सम्मान होगा। उसे घोषणा नहीं, व्यवस्था चाहिए। उसे भाषण नहीं, भुगतान चाहिए।
दूसरी ओर जंतर-मंतर पर जेन-ज़ी की आवाज़ थी। यह वही पीढ़ी है जिसे कहा जाता है कि भारत का भविष्य उसके हाथ में है। लेकिन भविष्य पूछ रहा था कि उसका वर्तमान किसके हाथ में है? यह पीढ़ी सोशल मीडिया पर ट्रेंड भी चलाती है और सड़कों पर ट्रेंड भी बना देती है। इसे चुप कराना पहले जितना आसान नहीं रहा।
सरकारें अक्सर आंदोलन शुरू होने तक कहती हैं कि कोई समस्या नहीं है। आंदोलन बड़ा हो जाए तो कहती हैं कि बातचीत होगी। आंदोलन और बड़ा हो जाए तो समिति बन जाती है। फिर समीक्षा होती है। फिर घोषणा होती है। और अंत में वही मांगें मान ली जाती हैं जिन्हें पहले दिन भी माना जा सकता था।
यानी लोकतंत्र में समाधान का नया फार्मूला शायद यह है पहले आंदोलन करो, तब समाधान मिलेगा। अगर ऐसा ही है तो फिर मंत्रालयों के बाहर बोर्ड लगा देना चाहिए "बिना आंदोलन प्रवेश वर्जित।"
लोकतंत्र में संवाद पहले होना चाहिए, संघर्ष बाद में। लेकिन अब लगता है संघर्ष पहले होता है और संवाद बाद में। सरकारें मानो यह मान बैठी हैं कि जब तक बैरिकेड नहीं टूटेंगे, तब तक फाइल नहीं खुलेगी।
आज प्रशासन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं रह गई कि उसने समस्या हल कर दी, बल्कि यह हो गई कि उसने आंदोलन को कितनी देर तक रोके रखा।
किसान की मांगों पर चर्चा तब होती है जब राजधानी की सड़कें जाम होने लगती हैं। युवाओं की आवाज़ तब सुनाई देती है जब सोशल मीडिया पर लाखों पोस्ट वायरल हो जाते हैं। यानी समस्या छोटी हो तो वह फाइल में रहती है, बड़ी हो जाए तो टीवी पर आ जाती है।
सबसे रोचक बात यह रही कि दोनों आंदोलनों में आखिरकार बातचीत हुई। सरकार ने किसानों की कई मांगों पर सकारात्मक निर्णय लिए। जेन-ज़ी के आंदोलन के बाद भी सरकार की ओर से संवाद और समाधान की पहल दिखाई दी। इसका मतलब साफ है कि समाधान संभव था। फिर प्रश्न यह है कि जब समाधान होना ही था तो पहले दिन क्यों नहीं हुआ?
क्या लोकतंत्र में समाधान की भी कोई न्यूनतम भीड़ तय कर दी गई है? क्या सौ लोग कम पड़ते हैं और हजार लोग होने पर फाइल खुलती है? क्या ज्ञापन की स्याही हल्की होती है और सड़क पर बैठने से वही मांग भारी हो जाती है?
यदि सरकार सवाल उठते ही समाधान की प्रक्रिया शुरू कर दे, तो शायद न देश की जनता को सड़कों पर उतरना पड़े, न किसान को राजधानी घेरनी पड़े और न ही जेन-ज़ी को जंतर-मंतर पर लोकतंत्र का प्रैक्टिकल करना पड़े।
यदि समय पर संवाद हो जाए तो ट्रैफिक जाम नहीं होगा। पुलिस बैरिकेड लगाने में नहीं, कानून-व्यवस्था बनाए रखने और थानों में बैठे पीड़ितों को न्याय दिलाने में अपनी पूरी ताकत लगाएगी। प्रशासन आंदोलन की तैयारी नहीं, विकास की तैयारी करेगा। मीडिया भी "किसानों ने घेरा" और "युवाओं का प्रदर्शन" जैसी ब्रेकिंग न्यूज की जगह "समस्या का समय पर समाधान" जैसी खबरें दिखाएगा।
दुर्भाग्य यह है कि आज सरकारों की संवेदनशीलता का थर्मामीटर भीड़ देखकर बढ़ता है। जितनी बड़ी भीड़, उतनी बड़ी बैठक। जितना बड़ा प्रदर्शन, उतनी बड़ी घोषणा। यह प्रवृत्ति किसी एक सरकार की नहीं, बल्कि हमारी लोकतांत्रिक कार्यशैली का हिस्सा बनती जा रही है। यही सबसे बड़ा खतरा है।
लोकतंत्र की खूबसूरती इस बात में नहीं कि सरकार आंदोलन के बाद झुक जाए। लोकतंत्र की खूबसूरती इस बात में है कि सरकार को झुकने की नौबत ही न आए, क्योंकि उसने समय रहते जनता की बात सुन ली हो।
आख़िर में सवाल फिर वहीं खड़ा है यदि देश अमृतकाल में है, यदि प्रदेश किसान कल्याण वर्ष मना रहा है, यदि विकास की गति रिकॉर्ड पर है, यदि योजनाएँ सफल हैं, यदि व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त है, तो फिर जंतर-मंतर पर जेन-ज़ी और भोपाल में किसान आखिर आंदोलन क्यों कर रहे हैं?
लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। लोकतंत्र जनता की धड़कन सुनने की कला है। सरकारें जितनी जल्दी यह कला सीख लेंगी, उतनी जल्दी सड़कों पर भीड़ कम होगी। क्योंकि जनता को आंदोलन का शौक नहीं होता, उसे समाधान की उम्मीद होती है। और याद रखिए, जब जनता को अपनी बात मनवाने के लिए बार-बार सड़क पर उतरना पड़े, तो यह केवल जनता की बेचैनी नहीं बताता, बल्कि व्यवस्था की सुनने की क्षमता पर भी सवाल खड़े करता है।
शायद अब समय आ गया है कि सरकारें आंदोलन को कानून-व्यवस्था का विषय मानने से पहले उसे संवाद की विफलता के रूप में देखें। क्योंकि लोकतंत्र की सबसे बड़ी जीत यह नहीं कि आंदोलन शांत हो गया, बल्कि यह है कि आंदोलन करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी।
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