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माता की कृपा कब होती है?

धर्मशास्त्र Published by: indoremeripehchan.in Updated Sun, 19 Apr 2026 03:35 AM
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भारतवर्ष के धार्मिक और संस्कृत साहित्य से परिचित हर व्यक्ति ने विद्यारण्य स्वामी का नाम तो सुना होगा। वे विद्या के भण्डार सरस्वती के वरद्पुत्र, महान् तपस्वी और अद्भुत प्रतिभा सम्पन्न थे। संस्कृत भाषा में उनकी उच्चकोटि की कृतियाँ हैं, उनको उस युग का व्यास कहते हैं। गायत्री उपासना से ही उनकी प्रतिभा का इतना विकास हुआ था। 

श्री स्वामी विद्यारण्य जी का दक्षिण भारत के एक प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवार में जन्म हुआ था। इस परिवार के सब बच्चे बहुत बुद्धिमान और कर्तव्यनिष्ठ हुए हैं। स्वामी जी ने अपना बचपन विद्याध्ययन में बिताया। युवावस्था में प्रवेश करते ही उन्होंने गायत्री महामन्त्र द्वारा तपस्या शुरू की। यह तपश्चर्या पूरे २४ महापुरश्चरणों तक चलती रही उसकी पूर्णाहुति करने के बाद जीवन मुक्त स्थिति में रहकर वे संसार का कल्याण करते रहे। 

साधना काल में दो राजपुत्र उनकी शरण में आये। उनका राज्य छीन लिया गया था। वे मारे-मारे फिर रहे थे। स्वामी जी का आशीर्वाद पाकर अपना खोया हुआ राज्य फिर से प्राप्त किया और जीवन भर उन्होंने स्वामी जी के उपदेशों और आदर्शों के अनुसार ही अपना राज्य चलाया। समर्थ गुरु रामदास जी महाराज की प्रेरणा से छत्रपति शिवाजी ने आर्य संस्कृति की रक्षा के लिए राज्य की स्थापना की थी। उसी तरह स्वामी विद्यारण्य ही की कृपा और प्रेरणा से ये दो राजपुत्र विजयनगर नामक राज्य की स्थापना करने में समर्थ बने। 

स्वामीजी को तप करते-करते लम्बा समय बीत गया। २४ पुरश्चरण पूरे हुए फिर भी उनको गायत्री माता का साक्षात्कार न हुआ। अपनी असफलता का उनको भारी दुःख हुआ और निराश होकर उन्होंने संन्यास धारण कर लिया संन्यास धारण करने के बाद वे स्वामी विद्यारण्य के नाम से प्रसिद्ध हुए। 

वे संन्यासी बन गये तब एक दिन गायत्री माता ने उनको दर्शन दिये। इससे स्वामीजी को बहुत प्रसन्नता हुई और आश्चर्य भी हुआ। स्वामीजी ने माता से पूछा- 'मैंने २४ पुरश्चरण आपके दर्शन के लिए किये, आपने मुझे दर्शन क्यों नहीं दिये? जब मैं सब प्रकार की कामना छोड़कर संन्यासी हो गया हूँ तब आप अनायास ही दर्शन के लिए क्यों उपस्थित हुई हैं ?' तब माता ने उत्तर दिया- 'उसके दो कारण हैं।

एक जब तक साधक के पूर्व जन्म के संचित पापों का नाश नहीं होता तब तक साक्षात्कार करने वाले दिव्य नेत्र नहीं खुलते हैं। तुम्हारे २४ महापुरश्चरणों से पूर्वजन्मों के २४ महापापों का नाश हुआ है। तत्पश्चात् मेरे दर्शन के लिये योग्य बन सके हो। दूसरा कारण है- साधक के मन में रहने वाली कामनायें। इनके रहते साधक मेरा साक्षात्कार नहीं कर सकता। साधना में कामना की प्रवृत्ति जुट जाने से भावनाओं में पवित्रता नहीं रह पाती।

साधना का स्नेह स्वार्थपूर्ण रहता है। निष्काम बने बिना मेरा दर्शन पा सकना सम्भव नहीं है। तुम्हारे मन में मेरे दर्शन की कामना थी, यद्यपि यह इच्छा सतोगुणी थी किन्तु यह भी एक प्रकार की कामना थी। जब तुमने सभी कामनाओं का परित्याग कर दिया, समर्पित भाव से हमारी आराधना में प्रवृत्त हुए तब अपने वात्सल्य प्रेम को रोक नहीं सकी और तुरन्त दर्शन देने के लिये चली आई।' माता की स्नेहयुक्त वाणी को सुनकर विद्यारण्य जी भाव-विह्वल हो उठे। नेत्रों से प्रेमाश्रु बहने लगे तथा माँ के चरण धोने लगे। 

गायत्री माता ने विद्यारण्य से कहा- 'वत्स ! हम तुम्हारी निष्काम भक्ति भावना से अत्यन्त प्रसन्न हैं। तुम जो चाहो वर माँगो। माँ की दिव्य छवि के अवलोकन के आनन्द में डूबे स्वामीजी ने विह्वल होकर कहा -'माँ ! आपकी असीम कृपा से जिस दिव्यदर्शन आनन्द का अधिकारी बन सका हूँ उसे मैं भौतिक कामनाओं के बदले गँवाना नहीं चाहता। मुझे कुछ भी नहीं चाहिए, आपके चरणों में श्रद्धाभक्ति बनी रहे।'

माँ गायत्री प्रसन्न होकर बोलीं- 'तथास्तु !' उन्होंने निर्देश दिया कि लोकमंगल के लिए, सद्ज्ञान के प्रसार के लिए सद्ग्रंथों की रचना करो। स्वामी विद्यारण्य जी माँ की आज्ञा को शिरोधार्य कर सद्गंथों की रचना में लग गये। उन्होंने अनेकों आर्ष ग्रन्थों का भाष्य किया, तथा नवीन ग्रन्थों की रचना की। 

स्वामी विद्यारण्यजी की प्रसिद्ध रचनायें इस प्रकार (१) ऋग्वेद भाष्य, (२) यजुर्वेद भाष्य, (३) सामवेद भाष्य, (४) अथर्ववेद भाष्य, (५) शतपथ एतरेय, तैतरीय, ताण्ड्य आदि ब्राह्मण ग्रन्थों का भाष्य, (६) दशोपनिषद् दीपिका, (७) जैमिनीय न्यायमाला विस्तार, (८) अनुभूति प्रकाश, (९) ब्रह्म-गीता, (१०) सर्वदर्शन - संग्रह, (११) माधवीय धातु वृत्ति, (१२) शंकर दिग्विजय, (१३) काल-निर्णय, (१४) श्री विद्या महार्णव तन्त्र, (१५) पंचदशी आदि। इन सबके अलावा भी उनके कई ग्रन्थ हैं जिनमें से कुछ प्राप्त भी नहीं हैं। उनकी अगाध विद्वत्ता और महान आध्यात्मिक अनुभूति में गायत्री माता की कृपा का प्रत्यक्ष प्रकाश दिखाई देता है। 

स्वामीजी के जीवन की अनेक चमत्कारी घटनायें हैं किन्तु इन चमत्कारों में से सबसे बड़ा चमत्कार उनका ब्रह्मतेज था। उससे वे स्वयं का और संसार के असंख्य प्राणियों का कल्याण करने में समर्थ बन सके और शृंगेरी पीठ के अधिपति के रूप में प्रतिष्ठित हुए।

 पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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