ऑनलाइन गेमिंग ऐप अब सिर्फ मनोरंजन नहीं रहे, बल्कि कई परिवारों के लिए खतरे की घंटी बनते जा रहे हैं. उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में तीन बहनों की मौत ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर बच्चों को जानलेवा बनती गेमिंग की लत से कैसे बचाया जाए. कोरोना काल के बाद मोबाइल और ऑनलाइन गेम्स बच्चों की दिनचर्या का हिस्सा बन गए हैं, लेकिन अगर समय रहते निगरानी न की जाए, तो यही आदत गंभीर परिणाम दे सकती है. ऐसे में जरूरी है कि माता-पिता सतर्क हों और सही तरीकों से बच्चों को गेमिंग की लत से दूर रखें.
आज ऑनलाइन गेमिंग बच्चों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण बन चुकी है. घंटों मोबाइल या लैपटॉप में डूबे रहना, बाहर खेलने से दूरी और परिवार से कटाव इसकी आम तस्वीर है. कई मामलों में यह लत बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डालती है, जिससे चिड़चिड़ापन, गुस्सा, डिप्रेशन और अकेलापन बढ़ने लगता है.
बच्चों को स्मार्टफोन देना पूरी तरह गलत नहीं है, लेकिन उस पर नियंत्रण जरूरी है. छोटे बच्चों के फोन में एज रेटिंग, पैरेंटल कंट्रोल और ऐप लिमिट जैसी सेटिंग जरूर करें. साथ ही उन्हें यह भी समझाएं कि हर गेम उनकी उम्र के लिए सही नहीं होता. इस दौरान माता-पिता का रवैया सख्त नहीं, बल्कि समझदारी और प्यार भरा होना चाहिए.
बच्चे दिनभर क्या कर रहे हैं, कितना समय मोबाइल पर बिता रहे हैं और कब अकेले कमरे में रहते हैं—इन सभी बातों की जानकारी माता-पिता दोनों को होनी चाहिए. कोशिश करें कि बच्चे के साथ खाना खाएं, बातें करें और रोजमर्रा की गतिविधियों में शामिल हों, ताकि वह ज्यादा से ज्यादा समय परिवार के साथ बिताए.
अगर माता-पिता खुद हर समय मोबाइल में लगे रहेंगे, तो बच्चों से उम्मीद करना बेकार है. बच्चों को गेमिंग से दूर रखना है, तो सबसे पहले खुद स्क्रीन टाइम कम करना होगा. जब बच्चा देखेगा कि उसके माता-पिता फोन से दूरी बना रहे हैं, तो वह भी इसे अपनाने की कोशिश करेगा.
मारपीट और हिंसा वाले गेम्स बच्चों के दिमाग पर गलत असर डालते हैं. ऐसे गेम्स से बच्चे गुस्सैल और आक्रामक हो सकते हैं. इसलिए जरूरी है कि माता-पिता यह जानें कि बच्चा कौन सा गेम खेल रहा है और जरूरत पड़ने पर ऐसे गेम्स को पूरी तरह ब्लॉक कर दें.
बच्चों को डांटकर या अचानक गेम से रोकना सही तरीका नहीं है. इससे वे जिद्दी हो जाते हैं और चोरी-छिपे खेलने लगते हैं. बेहतर है कि उन्हें शांति से समझाया जाए कि ज्यादा गेम खेलने से आंखों की रोशनी कमजोर हो सकती है, शरीर में दर्द, मोटापा, कमजोरी, नींद की परेशानी और मानसिक तनाव बढ़ सकता है. जब बच्चे को सही तरीके से समझाया जाता है, तो वह धीरे-धीरे बात मानने लगता है.
गेमिंग पूरी तरह बंद करने के बजाय उस पर सीमा तय करें. बच्चे के साथ बैठकर एक रूटीन बनाएं, जिसमें पढ़ाई और खेलकूद के बाद ही सीमित समय के लिए गेम खेलने की अनुमति हो. रोज 30 मिनट या एक घंटा काफी है. हफ्ते में एक-दो दिन पूरी तरह स्क्रीन फ्री रखें.
कई बच्चे इसलिए गेम्स में डूब जाते हैं क्योंकि उन्हें अकेलापन महसूस होता है. माता-पिता के साथ समय बिताने से बच्चे भावनात्मक रूप से मजबूत होते हैं. उनके साथ पार्क जाएं, वॉक करें, बात करें और उनके पसंदीदा खेलों में शामिल हों. इससे बच्चे को ऑनलाइन गेम्स की जरूरत कम महसूस होगी.
खुले में खेलना बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए बेहद जरूरी है. शुरुआत में माता-पिता खुद बच्चे के साथ बाहर जाएं चाहे वॉक हो, साइकिलिंग या कोई बॉल गेम. धीरे-धीरे बच्चा खुद बाहर खेलने में रुचि लेने लगेगा और स्क्रीन टाइम अपने आप कम हो जाएगा.
ऑनलाइन गेम खेलने वाले बच्चों का दिमाग तेज होता है, बस जरूरत है उसे सही दिशा देने की. बच्चों को पेंटिंग, म्यूजिक, डांस, कुकिंग या किसीटिव एक्टिविटी से जोड़ें. उन्हें क्विज, आर्ट या टैलेंट प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करें. जब बच्चा कुछ नया सीखने लगेगा, तो गेमिंग की लत धीरे-धीरे छूटने लगेगी.