- पर्युषण पर्व लेखमाला : अष्टम दिवस
दो फकीर थे, जो जगह-जगह साथ मे घूमते हुए बस्तियों में अपना गुजारा करते थे।उनमें से एक फकीर अपनी झोली में थोड़ा-बहुत पैसा आड़े वक्त के लिए जोड़कर रखने में विश्वास रखता था,इसके विपरीत दूसरे फकीर को परमात्मा पर पूरा भरोसा था और कुछ भी पास में नहीं रखने की सलाह वह दूसरे को भी देता था।इस बात पर दोनों में आए दिन बहस भी होती रहती थी।
एक बार वे चलते हुए घने जंगल में पहुंच गए,वहाँ से निकलने के लिए रास्ते में अचानक एक नदी पड़ी जिसे पार किए बिना आगे किसी गाँव में पहुँचना संभव नहीं था।तलाश करने पर बमुश्किल एक नाविक दो रुपए में नदी पार कराने को तैय्यार हुआ।जिस फकीर के पास कुछ न होता था उसने 'जोड़कर' रखने वाले फकीर की और आशाभरी निगाहों से देखा,दूसरा मुस्कराया और अपनी झोली में से दो रुपए निकालकर नाविक को देते हुए नदी पार करने चल दिए।रास्ते मे पहले फकीर ने दूसरे से कहा कि देखो !
मैं नही कहता था कि कुछ पास में हमेशा रखो,यदि आज मेरे पास जोड़ा पैसा नहीं होता तो हम नदी पार नहीं कर सकते।दूसरे फकीर ने तपाक से कहा कि नहीं!!- नदी पार तुम्हारे द्वारा जोड़े गए पैसे से नहीं बल्कि आज तुमने दो रुपए 'छोड़े' तो हुई; यदि तुम नहीं छोड़ते तो हम यहीं रहते...। इसी तरह भव सागर पार करने के लिए आचार्यों ने छोड़ने रूप 'उत्तम त्याग धर्म' की चर्चा की; जिसमें परोपकार के लिए अपने पास में से दूसरों को दान देने और स्व-उपकार हेतु मोह-राग-द्वेष जैसी विकारी वृत्तियों से मुक्त होने की बात कही गई है ; जिसे जानकर जीवन में उतारना प्रासंगिक होगा।
त्याग की बात आते ही सामान्यतः हमारे मन में दान का भाव आता है—किसी जरूरतमंद को भोजन दे दिया, वस्त्र दे दिए, धन दे दिया या अपनी कोई प्रिय वस्तु किसी के काम आने के लिए दे दी। निस्संदेह यह उदारता है और समाज के लिए अत्यन्त आवश्यक भी। जैन दर्शन ने भी दान की भरपूर प्रेरणा दी है। लेकिन दान और त्याग को एक ही मान लेना उचित नहीं है। दोनों में सूक्ष्म, लेकिन महत्वपूर्ण अंतर है। दान में हम किसी उपयोगी वस्तु को दूसरे के हित में देते हैं; त्याग में उस वस्तु या भाव से स्वयं को मुक्त करते हैं जो आत्मकल्याण में बाधक है। सरल शब्दों में कहें तो दान में किसी को कुछ दिया जाता है, त्याग में अपने भीतर से कुछ छोड़ा जाता है।
आज की युवा पीढ़ी के सामने यह बात और भी प्रासंगिक है। हम लगातार कुछ न कुछ जोड़ने में लगे हैं-नए कपड़े, नया फोन, नए गैजेट, नई उपलब्धियाँ, नए फॉलोअर्स, नई पहचान। लेकिन जीवन में एक समय ऐसा भी आना चाहिए जब हम पूछें-मेरे पास क्या-क्या है, यह तो मैं जानता हूँ; लेकिन इनमें से ऐसा क्या है जिसे छोड़ने पर मैं और हल्का, स्वतंत्र और बेहतर हो जाऊँगा?यही उत्तम त्याग का प्रवेश-द्वार है।
जैन दर्शन की दृष्टि से दान व्यवहार की दृष्टि से त्याग का एक रूप माना जा सकता है, लेकिन निश्चय से दान और त्याग अलग हैं। दान में परोपकार प्रमुख है,इसलिए वह पुण्य का कारण है; जबकि त्याग का लक्ष्य आत्मकल्याण और बंधन से मुक्ति है, इसलिए वह धर्म है। दान के लिए दाता, पात्र और देने योग्य वस्तु—इन तीनों की आवश्यकता होती है। कोई अपनी वस्तु किसी दूसरे को देता है, तभी दान की प्रक्रिया पूरी होती है। इस अर्थ में दान एक सामाजिक और परोपकारी प्रक्रिया है। इसके विपरीत त्याग मूलतः स्वाधीन आत्मिक प्रक्रिया है। आत्मा अपने कल्याण के लिए स्वयं ही अपने भीतर के बंधनों को छोड़ती है; इसके लिए किसी दूसरे व्यक्ति की आवश्यकता नहीं।
इसीलिए यह समझना जरूरी है कि दान में अच्छी और उपयोगी वस्तु दी जाती है, जबकि त्याग में त्याज्य वस्तु या भाव छोड़ा जाता है। किसी भूखे को भोजन देना दान है, क्योंकि भोजन उसके लिए हितकारी है। रोगी को औषधि देना दान है। किसी को ज्ञान देना ज्ञानदान है। भयभीत व्यक्ति को अभय देना अभयदान है। जैन परम्परा में दान के ये चार प्रमुख रूप बताए गए हैं-आहार दान, औषधि दान, ज्ञान दान और अभय दान। इनका उद्देश्य दूसरे के जीवन में सहारा, सुरक्षा और कल्याण पहुँचाना है।त्याग का प्रश्न अलग है।
यदि कोई वस्तु हमारे लिए अनुपयोगी हो गई है और हम उसे किसी जरूरतमंद को दे देते हैं, तो वह मुख्यतः दान है। लेकिन यदि किसी वस्तु के प्रति हमारा मोह ही आत्मकल्याण में बाधक बन रहा है और हम उस ममत्व को छोड़ते हैं, तो यह त्याग की दिशा है। इसलिए बाहर से दोनों में “छोड़ना” दिखाई दे सकता है, लेकिन भाव अलग है।इसे एक उदाहरण से समझें। किसी व्यक्ति के पास दस हजार रुपये हैं और वह उनमें से एक हजार रुपये किसी जरूरतमंद को दे देता है—यह दान है। उसके पास अभी भी नौ हजार रुपये हैं।
दूसरी ओर, त्यागी मुनिराज के पास निजी परिग्रह का संग्रह नहीं होता। वे किसी वस्तु के स्वामित्व का संग्रह नहीं करते। इसलिए दानी के पास बहुत सम्पदा हो सकती है, लेकिन त्यागी का गौरव ही इस बात में है कि उसने परिग्रह के स्वामित्व और ममत्व से स्वयं को अलग किया है। दान सम्पदा के सदुपयोग की संस्कृति है; त्याग सम्पदा के प्रति आसक्ति से मुक्ति की साधना है।इसीलिए दानी और त्यागी की तुलना करते समय इस अंतर को समझना आवश्यक है। गृहस्थ मुनिराज को आहार देते हैं; यह महान दान है और इससे पुण्य का बंध होता है।
लेकिन मुनिराज उस आहार को ग्रहण करके भी परिग्रह का संग्रह नहीं करते और अपनी आत्मसाधना में स्थित रहते हैं। इसलिए दान करने वाला महान पुण्य का अर्जन करता है, जबकि परिग्रह का सर्वथा त्याग करने वाला आत्मकल्याण के धर्ममार्ग पर आगे बढ़ता है। दोनों की अपनी गरिमा है, लेकिन उनके प्रयोजन अलग हैं।यहीं से उत्तम त्याग का वास्तविक अर्थ खुलता है।
त्याग केवल वस्तु छोड़ने का नाम नहीं है। वस्तु बाहर है, लेकिन “यह मेरी है” का भाव भीतर है। वस्तु छोड़ दी और उसका मोह बना रहा तो बाहरी परिवर्तन हुआ, भीतर का नहीं। इसलिए निश्चय की दृष्टि से आत्मा में उत्पन्न मोह, राग-द्वेष और परभावों के प्रति ममत्व का त्याग ही वास्तविक मुक्ति की दिशा है। वस्तु का त्याग व्यवहार में दिखाई देता है; भावों का त्याग आत्मा के भीतर घटित होता है।
आचार्य कुन्दकुन्ददेव की समयसार की आत्मदृष्टि हमें इसी गहराई तक ले जाती है। आत्मा अपने ज्ञान-दर्शनमय स्वभाव में स्थित है; पर-पदार्थ आत्मा का स्वभाव नहीं हैं। जब उपयोग पर-पदार्थों में उलझकर उनमें “मेरा-तेरा” का भाव करता है, तब पराधीनता पैदा होती है। आत्मा की ओर लौटना इस पराधीनता से मुक्त होना है। इसीलिए वास्तविक त्याग का प्रश्न केवल यह नहीं कि मैंने क्या छोड़ा? बल्कि यह है कि मेरे भीतर किसका ममत्व छूटा?
आज की युवा पीढ़ी के लिए यह बात बिल्कुल नए ढंग से समझी जा सकती है। फोन बदलना आसान है, लेकिन फोन के प्रति अपनी निर्भरता देखना कठिन है। कपड़े दान करना आसान है, लेकिन दूसरों से तुलना करने की आदत छोड़ना कठिन है। सोशल मीडिया अकाउंट से किसी को unfollow करना आसान है, लेकिन दूसरों की स्वीकृति पाने की बेचैनी छोड़ना कठिन है। घर का सामान कम करना आसान है, लेकिन “मेरे पास यह भी होना चाहिए” वाली मानसिकता छोड़ना कठिन है। उत्तम त्याग बाहरी clutter से पहले भीतर के clutter को कम करता है।
त्याग का अर्थ संसार छोड़ देना भी नहीं है। गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी व्यक्ति परिग्रह की मर्यादा रख सकता है, अपनी आवश्यकताओं को सीमित कर सकता है, अनावश्यक संग्रह छोड़ सकता है, उपयोग में न आने वाली वस्तुओं को दान कर सकता है और सबसे महत्वपूर्ण—उन वस्तुओं के प्रति ममत्व घटा सकता है। इस तरह दान और त्याग एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि अलग-अलग स्तरों पर जीवन को शुद्ध करने वाले साधन हैं। दान से दूसरे का जीवन बेहतर होता है; त्याग से अपना जीवन हल्का होता है।
त्याग का एक बहुत सुंदर रूप, समय और अहंकार का त्याग भी है। किसी जरूरतमंद के लिए समय देना दान है; लेकिन हर जगह स्वयं को महत्वपूर्ण साबित करने की चाह छोड़ देना त्याग की दिशा है। अपनी गलती स्वीकार कर लेना, अपनी जिद छोड़ देना, आवश्यकता पड़ने पर अपनी सुविधा छोड़कर किसी दूसरे के लिए जगह बना देना-ये त्याग के ऐसे रूप हैं जिन्हें कोई वस्तु खरीदे बिना भी हर व्यक्ति अपने जीवन में उतार सकता है।
वास्तव में हमारा सबसे बड़ा संग्रह वस्तुओं का नहीं, ममत्व का है। वस्तुएँ जितनी हैं, उससे कहीं अधिक उनका मानसिक भार हमें ढोना पड़ता है। “मेरी सम्पत्ति”, “मेरी प्रतिष्ठा”, “मेरी उपलब्धि”, “मेरी बात”, “मेरा सम्मान”-‘मेरा’ शब्द जितना बढ़ता जाता है, भीतर का बोझ उतना ही बढ़ता जाता है। उत्तम त्याग इस ‘मेरा’ को धीरे-धीरे हल्का करता है।
जैन दर्शन में त्याग इसलिए केवल सामाजिक उदारता नहीं, मोक्षमार्ग की आत्मिक साधना है। दान से पुण्य का अर्जन हो सकता है, लेकिन मोह और राग-द्वेष का क्षय ही आत्मा को बंधन से मुक्त करने की दिशा में ले जाता है। इसीलिए त्याग की चरम अवस्था बाहरी सम्पत्ति के त्याग से भी आगे है—वह आत्मा को परभावों की पराधीनता से मुक्त करने की साधना है।
दशलक्षण महापर्व के इस अष्टम दिवस पर उत्तम त्याग का संकल्प इसलिए केवल यह न हो कि हम कोई वस्तु किसी को दे देंगे। संकल्प यह भी हो कि एक अनावश्यक वस्तु छोड़ेंगे, एक अनावश्यक इच्छा रोकेंगे, एक अनावश्यक आग्रह छोड़ेंगे और अपने भीतर के एक ‘मेरा’ को थोड़ा हल्का करेंगे। किसी के काम आने वाली वस्तु दान करेंगे, लेकिन साथ ही उसके प्रति अपने ममत्व को भी देखेंगे।
अन्ततः त्याग का अर्थ जीवन को खाली करना नहीं, अनावश्यक से मुक्त करना है। दान में हाथ खुलता है, त्याग में मन खुलता है। दान दूसरे के जीवन में प्रकाश पहुँचाता है, त्याग अपने भीतर जगह बनाता है। दान पुण्य की ओर ले जाता है और निश्चय से त्याग आत्मकल्याण और मुक्ति की दिशा खोलता है। इसलिए उत्तम त्याग हमें कुछ खोने की शिक्षा नहीं देता; वह सिखाता है कि जो वास्तव में हमारा नहीं, उसके पीछे अपनी आत्मिक स्वतंत्रता क्यों खोएँ?
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जब “मेरा” कम होता है, तब मन हल्का होता है; जब ममत्व कम होता है, तब आत्मा के लिए जगह बनती है। वस्तु को छोड़ना त्याग की शुरुआत हो सकती है, लेकिन वस्तु के प्रति मोह को छोड़ देना-यही उत्तम त्याग की वास्तविक दिशा है।