मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने इंदौर नगर निगम के दोषी अधिकारी पर ₹1 लाख की कॉस्ट अधिरोपित

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निरस्त हो चुकी वैधानिक धाराओं के आधार पर आदेश पारित करने पर न्यायालय की कड़ी टिप्पणी; कॉस्ट की राशि संबंधित अधिकारी से वसूलने के निर्देश

इंदौर. दिनांक 28 अक्टूबर 2026

मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ के माननीय न्यायमूर्ति श्री संदीप नटवरलाल भट्ट ने आज एक महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए मेसर्स बाफना हॉस्पिटल एंड ऑर्थोपेडिक्स रिसर्च सेंटर प्राइवेट लिमिटेड के विरुद्ध इंदौर नगर निगम द्वारा पारित विवादित आदेश दिनांक 30.09.2026 एवं उसके आधार पर जारी लेजर रिपोर्ट दिनांक 07.10.2026 को वापस लिए जाने के संबंध में नगर निगम की ओर से दिए गए कथन को अभिलिखित किया।

माननीय न्यायालय ने प्रकरण में गंभीर कानूनी त्रुटि पाए जाने तथा वर्ष 2020 में ही विलोपित हो चुकी वैधानिक धाराओं के आधार पर आदेश पारित किए जाने को गंभीरता से लेते हुए संबंधित दोषी अधिकारी पर ₹1,00,000/- की कॉस्ट अधिरोपित की। न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि कॉस्ट की राशि संबंधित अधिकारी से वसूल की जाए, ताकि इसका आर्थिक भार नगर निगम के सरकारी कोष पर न पड़े।

यह याचिका मेसर्स बाफना हॉस्पिटल एंड ऑर्थोपेडिक्स रिसर्च सेंटर प्राइवेट लिमिटेड की ओर से मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ के समक्ष प्रस्तुत की गई थी। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विभोर खंडेलवाल एवं जयेश गुरनानी ने पैरवी की, जबकि इंदौर नगर निगम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज मुंशी एवं अधिवक्ता शशांक श्रीवास्तव उपस्थित हुए। याचिका में नगर निगम द्वारा पारित आदेश दिनांक 30.09.2026 तथा उसके आधार पर जारी लेजर रिपोर्ट दिनांक 07.10.2026 को चुनौती दी गई थी। उक्त कार्यवाही के संबंध में याचिकाकर्ता द्वारा न्यायालय के समक्ष अपनी आपत्तियां एवं कानूनी तर्क प्रस्तुत किए गए।

प्रकरण की सुनवाई के दौरान नगर निगम की ओर से उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता ने संबंधित अधिकारी के निर्देश पर न्यायालय को अवगत कराया कि विवादित आदेश प्रथम दृष्टया विधि के विरुद्ध है तथा नगर निगम उक्त आदेश को वापस ले रहा है। हालांकि, माननीय न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल आदेश वापस लिए जाने के आधार पर मामले में उदार दृष्टिकोण अपनाना उचित नहीं होगा।

न्यायालय ने संबंधित अधिकारी की उपस्थिति तथा नगर निगम की ओर से दिए गए कथन को ध्यान में रखते हुए विवादित आदेश एवं उसके आधार पर जारी लेजर रिपोर्ट को वापस लिए जाने की बात दर्ज की, लेकिन साथ ही आदेश पारित करने में हुई गंभीर कानूनी त्रुटि और उससे न्यायालय के बहुमूल्य समय की बर्बादी को भी गंभीरता से लिया।

माननीय न्यायालय ने अपने आदेश में विशेष रूप से उल्लेख किया कि नगर निगम अधिनियम की धारा 143, 146 एवं 153, जिन्हें वर्ष 2020 में ही विलोपित किया जा चुका था, उनके आधार पर संबंधित प्राधिकारी द्वारा विवादित आदेश पारित किया गया। न्यायालय ने इस स्थिति पर गंभीर नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि नगर निगम जैसी वैधानिक संस्था के अधिकारियों का दायित्व है कि वे अपने समक्ष आने वाले मामलों का निर्णय प्रचलित कानून तथा विधि के विद्यमान प्रावधानों के अनुसार करें।

निरस्त हो चुकी धाराओं के आधार पर आदेश पारित किया जाना संबंधित जिम्मेदार अधिकारी की ओर से कानून के प्रति गंभीर अनभिज्ञता को दर्शाता है। न्यायालय ने ऐसी स्थिति को निराशाजनक एवं पीड़ादायक बताते हुए अपेक्षा व्यक्त की कि भविष्य में इस प्रकार की घटना की पुनरावृत्ति नहीं होनी चाहिए।

न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि संबंधित अधिकारी द्वारा उचित ढंग से विचार किए बिना तथा विधिक प्रावधानों की समुचित जांच किए बिना यांत्रिक तरीके से विवादित आदेश पारित किया गया। इस प्रकार की कार्यवाही के कारण याचिकाकर्ता को न्याय प्राप्त करने के लिए उच्च न्यायालय की शरण लेनी पड़ी और न्यायालय का बहुमूल्य समय ऐसे विवाद की सुनवाई में व्यय हुआ।

न्यायालय के अनुसार, वैधानिक अधिकारियों को प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग कानून के अनुरूप किया जाना आवश्यक है। जब कोई अधिकारी प्रासंगिक कानूनी प्रावधानों की अनदेखी करते हुए गलत आदेश पारित करता है, तो उसके कारण उत्पन्न मुकदमेबाजी तथा न्यायिक समय की बर्बादी को अनदेखा नहीं किया जा सकता।

माननीय न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि वैधानिक संस्थाओं के अधिकारी अक्सर मुकदमों में सार्वजनिक धन के माध्यम से पैरवी करते हैं। ऐसी स्थिति में किसी अधिकारी द्वारा गलत आदेश पारित किए जाने के कारण उत्पन्न मुकदमेबाजी का आर्थिक भार अनावश्यक रूप से सार्वजनिक कोष पर नहीं डाला जाना चाहिए। भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं को रोकने तथा संबंधित अधिकारियों को अपने वैधानिक दायित्वों के प्रति सजग करने के उद्देश्य से न्यायालय ने ₹1,00,000/- की अनुकरणीय कॉस्ट अधिरोपित करना उचित पाया।

न्यायालय ने निर्देश दिया कि अधिरोपित कॉस्ट में से ₹75,000/- मध्य प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, इंदौर के पक्ष में जमा किए जाएं, जबकि शेष ₹25,000/- याचिकाकर्ता को वाद-व्यय के रूप में भुगतान किए जाएं। उक्त राशि आदेश की तारीख से सात दिनों के भीतर जमा करने के निर्देश दिए गए हैं। 

संपर्क : अधिवक्ता जयेश गुरनानी

मोबाइल: 9827965692

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