- एकतरफा प्रेस वार्ता के बाद पुलिस का ‘समन्वय’ ,
- समन्वय बैठक से डीसीपी अभिषेक रंजन को मिल पाया सबक ..?
- क्या अब पत्रकारों की खबरों, सबूतों और अधिकारों पर भी सुनेगी कमिश्नरी...समन्वय पर उठे सवाल ..?
- "प्रेस" के आगे "दंडवत"..."कमिश्नरेट" "प्रवक्ता"...!
इन्दौर. मेट्रो, सोनू पवार/फरीद शेख इन्दौर
जिस प्रेस के सवालों से बचने की कोशिश कल तक पुलिस के कुछ अफसरों की कार्यशैली का हिस्सा नजर आ रही थी..., उसी प्रेस के सामने अब पुलिस महकमा ‘समन्वय’ की मुद्रा में दिखाई दिया... रानी सराय स्थित पुलिस सभागृह में हुई पुलिस-प्रेस बैठक ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं... सवाल यह नहीं कि बैठक हुई क्यों.., सवाल यह है कि क्या यह समन्वय सिर्फ पुलिस की उपलब्धियों और कार्रवाई की खबरों तक सीमित रहेगा या पत्रकारों की शिकायतों और अधिकारों पर भी पुलिस उतनी ही गंभीरता दिखाएगी....?
जोन-3 डीसीपी अभिषेक रंजन की कथित एकतरफा प्रेस वार्ता को लेकर मीडिया में नाराजगी के बीच हुई, इस बैठक को उसी घटनाक्रम के बाद उपजे दबाव के असर के तौर पर भी देखा जा रहा है... बैठक में पुलिस प्रवक्ता एवं एडीसीपी क्राइम राजेश दंडोतिया, डीसीपी जोन-3 अभिषेक रंजन, प्रेस क्लब अध्यक्ष दीपक कर्दम सहित बड़ी संख्या में पत्रकार मौजूद रहे... मैदानी रिपोर्टर और कैमरामैन ने बाइट, विजुअल और वीडियो से जुड़ी दिक्कतें अधिकारियों के सामने रखीं और पुलिस अधिकारियों ने सहयोग का भरोसा दिलाया....
पुलिस की तरफ से जताया गया कि "इन्दौर पुलिस और मीडिया एक परिवार के साथी हैं"...! लेकिन सवाल यही है कि परिवार वाली यह भावना सिर्फ तब क्यों दिखाई देती है..., जब पुलिस को अपनी कार्रवाई जनता तक पहुंचानी होती है...? पुलिस की सही हो या गलत कार्रवाई -जनता के बीच अपनी छवि बनाने के लिए मीडिया की ताकत का इस्तेमाल पुलिस महकमा खूब करता है... कार्रवाई बड़ी हो तो कैमरे बुलाए जाते हैं.., बाइट दी जाती है..., प्रेस नोट जारी होते हैं और पुलिस की ‘सफलता’ जनता तक पहुंचाई जाती है... लेकिन जब उसी मीडिया का रिपोर्टर किसी अफसर, पुलिसकर्मी, माफिया, अवैध निर्माण या कथित गड़बड़ी/भ्रष्टाचार को लेकर सवाल उठाता है..., तब समन्वय की यही भाषा गायब क्यों हो जाती है....?
मैदानी पत्रकारों का आरोप रहा है कि खबरों के दबाव में कई बार पत्रकारों के खिलाफ झूठी शिकायतें लेकर प्रभावशाली लोग पुलिस तक पहुंचते हैं.... सवाल यह है कि ऐसे मामलों में पुलिस कितनी निष्पक्षता से जांच करती है...? और दूसरी तरफ, पत्रकारों द्वारा खबरों के साथ दिए गए दस्तावेज और प्रमाण सामने होने के बावजूद क्या हर शिकायत पर पुलिस उतनी ही तेजी दिखाती है.., जितनी पत्रकार के खिलाफ शिकायत आने पर दिखाई देने का आरोप लगता है...?
यही इस ‘समन्वय बैठक’ की असली परीक्षा है....रानी सराय में पुलिस और प्रेस ने साथ बैठकर संवाद की बात तो कर ली...लेकिन अब देखना यह होगा कि यह संवाद सिर्फ पुलिस की तारीफों की खबरों तक सीमित रहता है या पत्रकारों की स्वतंत्रता, सवाल पूछने के अधिकार और उनकी शिकायतों पर कार्रवाई तक भी पहुंचता है...क्योंकि प्रेस के सामने पुलिस का बैठना समन्वय हो सकता है..., लेकिन पत्रकारों के सवालों के सामने पुलिस का निष्पक्ष होकर खड़ा होना ही असली समन्वय की पहचान होगी....।
फिलहाल तो प्रेस और पुलिस की समन्वय बैठक"में दोनों पक्षों की और से क़दम उठाए गए हैं। अब देखना ये होगा कि ये कदम ताल मेल खाते हैं या नहीं..?
इन्दौर मेट्रो ने कल ही *"रंजन ने पाली" रंजिश"* *मीडिया" से या सवालों" से..!* के शीर्षक के साथ खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया था"इन्दौर मेट्रो के खुलासे ने प्रेस और पुलिस के बीच बड़ी इस खाई को"प्रबलता के साथ उजागर किया। खबर है कि इन्दौर मेट्रो की खबरों और जमीनी स्तर पर मीडिया कर्मियों के आक्रोश और " प्रेस के क्लब से लेकर_उठते विरोध के बाद... पुलिस प्रेस संवाद की नीव बनी"इन्दौर मेट्रो की खबर ने पूरे मामले को मीडिया जगत के साथ पुलिस महकमें में भी चर्चा का विषय बना दिया। खैर अच्छा हुआ...जो भी हुआ।
पुलिस और पत्रकार संवाद बैठक की इस पहल का इन्दौर मेट्रो"स्वागत करता है। साथ ही उम्मीद करता है कि आगे इस तरह के परिदृश्य " किसी मोड़ पर नजर नहीं आएंगे।