राजेश जैन दद्दू
इंदौर. श्रावक संस्कार शिविर एवं दशलक्षण पर्व के उत्तम तप धर्म के अवसर पर मुनिपुंगव श्री 108 सुधासागर जी महाराज ने विद्या सुधा देशना मंडप में कहा कि जीवन में ऊंचा उठना है तो पहले झुकना सीखना होगा। विनम्रता कमजोरी नहीं, महान बनने की पहली सीढ़ी है।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति जब कुछ बनने की इच्छा करता है, तभी उसे सबसे अधिक सावधान रहना चाहिए। दूसरों से तुलना ही हीनता, असंतोष और अहंकार को जन्म देती है। दुनिया को पीछे छोड़ने और दूसरों को छोटा समझने की भावना ही पतन का कारण है।
बीज का उदाहरण देते हुए कहा - बीज को वृक्ष बनने से पहले मिट्टी के अंधकार में जाना पड़ता है, नीचे दबना पड़ता है, तभी वह आकाश की ऊंचाई छूता है। "जो बड़े लोगों से नीचे रहना सीखता है, वही एक दिन बड़ा बनता है।"
आराम सुख नहीं है -
महाराज जी ने कहा कि मनुष्य रोटी, पानी, धन, मकान, वाहन में सुख खोजता है, जबकि ये केवल आराम देते हैं, सुख नहीं। वस्तु चली जाए तो आराम खत्म। जो सुख बाहरी वस्तु पर निर्भर है, वह वास्तविक सुख नहीं।
"तुम्हें सुखी बनना नहीं है, तुम सुखी हो।" अपने शुद्ध आत्मस्वरूप को पहचानो और भावना करो - "मैं शुद्ध हूं, मैं ज्ञायक स्वरूप हूं।" वास्तविक आनंद भीतर है।
तीर्थंकर का वैभव नहीं, उपदेश देखो -
भगवान की वंदना उनके वैभव के लिए नहीं, उनके मोक्षमार्ग पर चलने के लिए हो। तीर्थंकर के पास क्या है, यह नहीं, तीर्थंकर क्या कह रहे हैं, यह देखो। उनके समवशरण के वैभव पर मत ललचाओ, उनके उपदेश पर जीवन समर्पित करो। भगवान का बाहरी स्वरूप इंद्रियों से दिखता है, पर अर्हंत स्वरूप को समझने के लिए आगम की दृष्टि चाहिए।
गुरु के पीछे नहीं, गुरु के बताए मार्ग पर चलो -
साधु का संग जीवन को बनाता है, गुरु का मार्गदर्शन बदलता है। इसलिए साधु के प्रति श्रद्धा और गुरु के प्रति आज्ञापालन होना चाहिए। सबसे पहले स्वयं से पूछो - "मैं कौन हूं?" जब व्यक्ति यह स्वीकार करता है कि "मुझे नहीं मालूम मैं कौन हूं," तभी आत्मज्ञान की खोज शुरू होती है।
धर्म का लक्ष्य बाहरी पद-प्रतिष्ठा नहीं, सम्यक दर्शन, ज्ञान, चारित्र से आत्मकल्याण है।
धर्मसभा में चक्रवर्ती सपना मनीष गोधा अध्यक्ष नवीन आनंद गोधा,अशोक डोशी,हर्ष जैन हुकुम काका विजय धुर्रा एवं ब्रह्मचारी प्रदीप भैया,पारस भैया सहित बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित थे। जानकारी प्रचार प्रमुख राजेश जैन दद्दू ने दी।
- प्रेषक - राजेश जैन दद्दू