ईरान.
मिडिल ईस्ट (Middle East) का तनाव कम होने का नाम नहीं ले रहा है. ये तनाव हर दिन बढ़ रहा है. ताजा जानकारी के अनुसार, अब ये युद्ध एक नए मोड़ पर पहुंच गया है जो डराने वाला है. ईरान से जुड़े मीडिया और सुरक्षा एजेंसियों ने इशारा किया है कि समंदर के नीचे बिछी इंटरनेट केबल्स पर भी अब हमला किया जा सकता है.
अभी तक तक तो ईरान-अमेरिका और इजरायल के बीच चल रहा युद्ध तेल, जहाज और मिसाइल तक ही सीमित था, लेकिन अब ये युद्ध डेटा वॉर तक पहुंचता हुआ दिखाई दे रहा है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड (IRGC) से जुडे़ मीडिया ने पर्शियन गल्फ और होर्मुज स्ट्रेट के नीचे मौजूद केबल नेटवर्क को हाइलाइट किया है. इसका मतलब ये है कि ईरान का अगला टारगेट अंडरसी केबल हो सकते हैं और ये इंफ्रास्ट्रक्चर खतरे में आ सकता है.
दरअसल, होर्मुज स्ट्रेट सिर्फ तेल का रास्ता ही नहीं है, बल्कि यह डिजिटल दुनिया का भी एक बड़ा चोकपॉइंट है. यहां से कई इंटरनेशनल फाइबर ऑप्टिक केबल्स गुजरती हैं, जो एशिया, यूरोप और मिडिल ईस्ट को जोड़ती हैं. अगर यहां पर किसी भी तरह का कोई नुकसान होता है तो सिर्फ उसका असर सिर्फ किसी एक देश पर ही नहीं बल्कि कई देशों की इंटरनेट कनेक्टिविटी पर होगा.
रेड सी और होर्मुज के आस-पास दर्जनों सबमरीन केबल्सस मौजूद हैं. सिर्फ रेड सी में ही करीब 15 से 20 केबल्स गुजरती हैं. ये केबल्स मिलकर एशिया, यूरोप और अफ्रीका के बीच डेटा ट्रैफिक का बड़ा हिस्सा मैनेज करती हैं. कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, दुनिया का 95से ज्यादा इंटरनेट डेटा इन्हीं अंडरसी केबल्स से चलता है. अब अगर सिर्फ एक-दो केबल कटती है तो उसका असर सीमित होगा लेकिन अगर एक साथ कई केबल्स को नुकसान होता है तो इंटरनेट स्पीड स्लो हो सकती है, वेबसाइट डाउन हो सकती है और बैंकिंग, क्लाउड और डिजिटल सर्विसेस पर भी असर पड़ सकता है.
भारत इस मामससे में पूरी तरह सिक्योर और सेफ नहीं है. भारत का करीब 60इंटरनेट ट्रैफिक पश्चिम की तरफ यानी मिडिल ईस्ट और यूरोप जाने वाली केबल्स से होकर गुजरता है. जिसका मतलब ये है कि अगर होर्मुज या रेड सी में केबल्स को नुकसान होता है तो भारत में भी इंटरनेट की स्पीड धीमी हो सकती है, खासकर इंटरनेशनल वेबसाइट्स, क्लाउड सर्विसेस और ऑनलाइन पेमेंट सिस्टम पर इसका असर पड़ सकता है. हालांकि भारत के पास एक दूसरा रास्ता भी है, जो पूर्व की तरफ सिंगापुर और पैसिफिक के जरिए जाता है, लेकिन वह पूरी तरह बैकअप नहीं बन सकता है. इसलिए जोखिम बना हुआ है.
अगर किसी भी हालत में केबल कट जाए तो इसका सबसे पहला असर इंटरनेट की स्पीड पर पड़ेगा. फिर धीरे-धीरे बड़े प्लेटफॉर्म पर भी इसका असर साफ दिखेगा. बैंकिग ट्रांजैक्शन, UPI, क्लाउड सर्विसेस, वीडियो स्ट्रीमिंग और इंटरनेशनल कॉलिंग प्रभावित हो सकती है. अगर नुकसान ज्यादा हुआ और रिपेयर टीम वहां तक नहीं पहुंच सकीं तो समस्या कई हफ्तों या महीनों तक भी चल सकती है.
एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह सिर्फ सीधी धमकी नहीं, बल्कि एक स्ट्रैटेजिक सिग्नल भी है. यानी अगर जंग का समय बढ़ता है तो डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर भी निशाना बन सकता है. हालांकि एक बड़ी बात यह भी है कि अगर ईरान केबल्स काटता है तो उसका खुद का भी इंटरनेट प्रभावित होगा.