एक कंप्यूटर। तीन शिक्षक। एक गैराज। 3 साल बाद 8 ऑस्कर, और ₹4,000 करोड़ की 'रामायण'

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1995। मुंबई का खार। घर से सटा एक गैराज। भीतर एक मशीन, जो चलते-चलते गरम हो जाती थी। और अठारह साल का एक लड़का। नाम  नमित मल्होत्रा।उसके पीछे सिनेमा की तीन पीढ़ियां खड़ी थीं।

दादा एम.एन. मल्होत्रा  छायाकार। 1953 की 'झांसी की रानी' पर काम किया था, भारत की गिनी-चुनी शुरुआती रंगीन फिल्मों में से एक।

पिता नरेश मल्होत्रा  निर्माता। 1988 की 'शहंशाह' उन्हीं की थी।

रास्ता खुला हुआ था।

कैमरा हाथ में आ जाता। सेट पर जगह मिल जाती। नाम मिल जाता।

पर नमित ने कैमरा नहीं उठाया।

उसने कंप्यूटर उठाया।

उसने अभी-अभी कंप्यूटर ग्राफिक्स का एक कोर्स पूरा किया था। 

उसी क्लासरूम में उसे तीन लोग मिले 

मर्जिन तवारिया, प्रकाश कुरुप, हुजेफा लोखंडवाला।

ये तीनों उसके शिक्षक थे।

अठारह साल का लड़का अपने ही उस्तादों के पास गया और बोला  चलिए, कंपनी बनाते हैं।

वो तीनों मान गए।

नाम रखा वीडियो वर्कशॉप।

दफ्तर  पिता के गैराज का एक कोना।

काम  सैटेलाइट टीवी का उफान। म्यूजिक वीडियो। विज्ञापन। 'बूगी वूगी' जैसे शो।

रात दो बजे की लाइट। ठंडी हो चुकी चाय। और वही एक मशीन।

फोर्ब्स इंडिया ने बरसों बाद लिखा कि वो शुरुआती दो साल कंपनी नहीं, एक छोटी दुकान की तरह चली।

1997 में यह दुकान पिता के इक्विपमेंट-रेंटल कारोबार से जुड़ गई।

नया नाम  प्राइम फोकस।

2006 में कंपनी शेयर बाजार में उतरी।

और फिर 2008 आया।

वैश्विक मंदी ने पूरी दुनिया के मनोरंजन उद्योग का बजट काट दिया। जिस काम पर प्राइम फोकस टिकी थी, वो सूखने लगा।

कंपनी उसी वक्त अपने अंतरराष्ट्रीय कारोबार का पुनर्गठन कर रही थी  उसे भारत की तरफ मोड़ रही थी, जहां प्रतिभा ज्यादा थी और लागत कम।

दो काम एक साथ। एक तरफ आग बुझाना, दूसरी तरफ नक्शा बदलना।

नमित ने बाद में बताया कि पटरी पर लौटने में बारह से अठारह महीने लगे।

2009 में उन्होंने अपने वैश्विक संचालन को नए सिरे से खड़ा किया। 

उन्हीं दिनों उनकी टीम जेम्स कैमरन की 'अवतार' के विज़ुअल इफेक्ट्स के एक हिस्से पर काम कर रही थी।

एक कंपनी जो डूब रही थी।

और एक फिल्म जो सिनेमा का व्याकरण बदलने वाली थी।

दोनों एक ही कमरे में थे।

फिर जनवरी 2010 में वो फ़ोन आया।

वॉर्नर ब्रदर्स को 'क्लैश ऑफ द टाइटन्स' को 3डी में बदलवाना था। उन्होंने कई कंपनियों से पूछा।

सबका जवाब एक जैसा था  आठ महीने।

नमित ने कहा  आठ हफ्ते।

वो काम मिला। और उसी एक 'हां' ने कंपनी की किस्मत पलट दी।

2014 में प्राइम फोकस वर्ल्ड का लंदन के स्टूडियो डबल निगेटिव से विलय हुआ।

नई कंपनी का नाम डीएनईजी।

विलय के वक्त डबल निगेटिव के पास 'इंसेंप्शन' का ऑस्कर पहले से था।

उसके बाद सात और आए।

कुल आठ अकादमी अवॉर्ड। आखिरी 2025 में।

2022 तक डीएनईजी में काम करने वालों की संख्या लगभग नौ हजार तक पहुंच चुकी थी। 

आज चार महाद्वीपों पर फैले इन कलाकारों में बड़ी संख्या भारतीयों की है।

वही काम, जिसे कभी मान लिया गया था कि सिर्फ लॉस एंजेलिस या लंदन में ही हो सकता है।

तो असल में हुआ क्या?

वर्जीनिया विश्वविद्यालय की प्रोफेसर सरस सरस्वती ने 2001 में 'एकेडमी ऑफ मैनेजमेंट रिव्यू' में एक शोध छापा, जिसने उद्यमिता की समझ बदल दी। 

उन्होंने दर्जनों अनुभवी उद्यमियों के फैसलों को बारीकी से पढ़ा और पाया कि वे भविष्य का अनुमान नहीं लगाते  वे उसे गढ़ते हैं।

उनका पहला सिद्धांत है  'हाथ में मौजूद पंछी'।

तीन सवालों से शुरू करो। मैं कौन हूं? मैं क्या जानता हूं? मैं किसे जानता हूं?

नमित के पास 1995 में यही तीन चीज़ें थीं।

मैं कौन हूं  फिल्मी परिवार का लड़का।

मैं क्या जानता हूं  अभी-अभी सीखा हुआ कंप्यूटर ग्राफ़िक्स।

मैं किसे जानता हूं  अपने तीन शिक्षकों को।

गैराज पिता का था। हुनर कुछ महीने पुराना था। साथी क्लासरूम के थे।

उसने कुछ भी बाहर से नहीं मंगवाया।

उसने बस वो सब उठाया जो पहले से कमरे में मौजूद था।

और यहां एक और बात है, जो सिर्फ भारत से जुड़ी है।

बरसों तक भारत विश्व सिनेमा के लिए 'पीछे का कमरा' रहा। 

हॉलीवुड की फिल्में यहां भेजी जातीं, सस्ते में काम करा लिया जाता, 

और परदे पर नाम किसी और का जाता।

नमित ने वो समीकरण उलट दिया।

उन्होंने काम नहीं खरीदा  कंपनी खरीदी।

भारतीय पूंजी, लंदन का स्टूडियो, भारतीय कलाकार, और ऑस्कर।

मजदूर से मालिक तक का यह सफर, हमारी अर्थव्यवस्था में जितना घट चुका है, उससे कहीं कम बोला गया है।

अब वो घर लौट रहे हैं।

25 जनवरी 1987। रविवार। सुबह साढ़े नौ बजे।

दूरदर्शन पर रामानंद सागर की 'रामायण' का पहला अंश आया।

उसके बाद अठहत्तर रविवार तक देश की सड़कें उन सुबहों में ख़ाली रहीं। जिन घरों में टीवी था, वहां पूरा मोहल्ला ज़मीन पर बैठ जाता।

82 प्रतिशत दर्शक-हिस्सेदारी। दुनिया का सबसे ज़्यादा देखा गया धारावाहिक।

तैंतीस साल बाद, 2020 के लॉकडाउन में जब वही धारावाहिक दोबारा चला, तो दूरदर्शन के अनुसार 16 अप्रैल के एक अंश को 7 करोड़ 70 लाख लोगों ने देखा।

धुएं के लिए अगरबत्तियां जलाई गई थीं। पहाड़ कागज के बने थे।

फिर भी वो चला।

अब वही कहानी नमित मल्होत्रा दोबारा बना रहे हैं।

निर्देशक नितेश तिवारी। राम  रणबीर कपूर। सीता  साई पल्लवी। रावण  यश। हनुमान  सनी देओल। संगीत  हैंस जिमर और ए.आर. रहमान।

दो भाग। पहला इसी दीवाली, दूसरा अगली।

बजट लगभग ₹4,000 करोड़  भारत की अब तक की सबसे महंगी फिल्म। जुलाई में सोनी पिक्चर्स इसकी वैश्विक वितरण-साझेदार बनी।

नमित ने अपनी घोषणा में लिखा था कि एक दशक पहले उन्होंने यह संकल्प लिया था  उस महाकाव्य को बड़े परदे पर लाने का, जो पांच हज़ार साल से अरबों दिलों पर राज करता आया है।

जिस आदमी ने पैंडोरा के जंगल बनाए, अराकिस के रेगिस्तान बनाए, अंतरिक्ष की खाइयां बनाईं 

वो अब अयोध्या बना रहा है।

मैं करीब 18 साल से पत्रकारिता कर रहा हूं। 

बरसों से मेरा काम एक ही रहा है-दूसरों की लिखी कहानियों को ठीक करना।

इस कहानी को पढ़ते हुए एक बात बार-बार लौटती रही।

नमित के घर में कैमरा था। कैमरा चलाने वाले लोग थे। इज्जत थी।

फिर भी उसने कंप्यूटर उठाया।

औजार बदल देना विरासत का अपमान नहीं होता।

वो उसे आगे ले जाने का सबसे मुश्किल तरीका होता है।

हम में से ज्यादातर लोग इसलिए शुरू नहीं कर पाते कि हमें लगता है शुरू करने के लिए जो चाहिए, वो हमारे पास नहीं है।

पर देखिए, नमित के पास भी नहीं था।

एक गैराज था, जो उसका नहीं था। एक हुनर था, जो कुछ महीने पुराना था। और तीन लोग थे, जिन्हें वो सिर्फ इसलिए जानता था कि वो उसकी क्लास में पढ़ाते थे।

बहुत बड़े काम बहुत बड़े साधनों से नहीं, हाथ में जो है उसे गिन लेने से शुरू होते हैं।

इस कहानी की तीन काम की बातें, जो किसी भी शुरुआत पर लागू होती हैं 

-एक। पहले यह मत पूछो कि क्या चाहिए। पहले यह गिनो कि क्या मौजूद है।

-दो। जो सिखाता है, वही सबसे अच्छा साथी बन सकता है। पूछ लेने में हर्ज नहीं।

-तीन। सबसे बड़ा मौका अक्सर वहां आता है जहां बाक़ी सब कह रहे हों  इसमें आठ महीने लगेंगे।

ये तीन लाइनें इस पोस्ट के साथ सेव कर लीजिए। जिस दिन लगे कि आपके पास शुरू करने लायक कुछ भी नहीं बचा, उस दिन यही तीन लाइनें आपके सामने होंगी।

और यह कहानी अकेले नमित मल्होत्रा की नहीं है। यह उन हजारों भारतीय कलाकारों की भी है जिनके नाम परदे पर सबसे आखिर में, सबसे तेजी से गुजर जाते हैं, और कोई पढ़ नहीं पाता। किसी ऐसे नौजवान तक यह पहुंचा दीजिए जो आज यह सोचकर बैठा है कि उसका शहर बहुत छोटा है और उसके पास कुछ नहीं।

आपके घर में भी किसी ने कभी औजार बदला होगा। किसी ने खेत छोड़कर किताब उठाई होगी, किसी ने दुकान छोड़कर मशीन, किसी ने सरकारी नौकरी छोड़कर कुछ ऐसा जो घरवालों की समझ में नहीं आया।

वो कौन था  और उस दिन घर में सबसे पहले क्या कहा गया था?

मैं राहुल हूं। कोलकाता के एक डेस्क से मैं ऐसी कहानियां ढूंढ़ता हूं, जहां कोई इंसान बिना किसी सहारे के अपनी जगह बना लेता है। ऐसी कहानियां आप तक पहुंचती रहें, तो इस सफ़र में साथ चलिए।

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