नैवेद्य पुरोहित
पिछली किस्त में आपने पढ़ा कि कैसे 80 के दशक के आख़िरी सालों में रतलाम के रावटी क्षेत्र में हरसहाय मीणा नाम के दबंग का भारी खौफ हुआ करता था, जो अपनी मर्ज़ी से ट्रेनें रुकवा दिया करता था। लगभग 2000 आदिवासियों ने उस दबंग का घर घेर लिया था। पुलिस-प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए और एसपी-एएसपी स्तर के अधिकारियों को मौके पर आना पड़ा था। फिर दैनिक भास्कर इंदौर के फ्रंट पेज पर हिम्मतजी के नाम से बेबाक रिपोर्ट छपी।
अब पढ़िए आगे की संवेदनशील और आत्मीय दास्तान...
पत्रकारिता केवल अपराध, राजनीति और व्यवस्था की कमियां उजागर करने का नाम नहीं है। इसकी असली ताकत तब दिखती है जब यह समाज के किसी गुमनाम कोने से प्रेरणा की कोई किरण ढूँढ निकाले। हिम्मतजी की कलम ने जितनी निर्भीकता दबंगों के खिलाफ दिखाई, उतनी ही मानवीय संवेदना उन्होंने अपनी रिपोर्टिंग में भी पिरोई।
बात करीब 20 साल पुरानी सन 2005-06 के आसपास की है। हिम्मतजी अपने एक रिश्तेदार के उठावने के सिलसिले में झाबुआ जिले के कालीदेवी गांव गए हुए थे।
गांव में पैदल चलते हुए अचानक उनकी नज़र एक सैलून (नाई की दुकान) पर पड़ी। उन्होंने जो देखा, उस पर एक पल के लिए उन्हें अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ। दुकान में कोई वयस्क पुरुष नहीं था, बल्कि 12-13 साल की दो नन्हीं बच्चियां हाथ में उस्तरा और कैंची थामे बड़ी कुशलता से पुरुषों की दाढ़ी और कटिंग बना रही थीं!
उस दौर में, मालवा-निमाड़ के छोटे-छोटे गांवों में किसी लड़की का दुकान पर बैठना ही बड़ी बात माना जाता था, ऐसे में दो नन्हीं बच्चियों का पुरुषों की दाढ़ी-कटिंग बनाना बिल्कुल अनूठी बात थी। हिम्मत
जी के भीतर का पत्रकार तुरंत जाग उठा। वे दुकान के पास पहुंचे और बच्चियों से प्यार से पूछा, "बेटा, आपके पापा कहां हैं?"
हिम्मतजी को लगा कि शायद परिवार में कोई बड़ा नहीं होगा, इसीलिए मजबूरी में बच्चियां यह काम कर रही हैं। लेकिन बच्चियों ने सहजता से जवाब दिया, "पापा घर पर पूजा कर रहे हैं, अभी आ जाएंगे। हम सुबह दुकान खोलकर पापा की मदद कर देते हैं।"
थोड़ी देर में जब उनके पिता दुकान पहुंचे, तो हिम्मतजी ने उनसे बात की और बच्चियों का फोटो खींचकर अख़बार में छापने की इजाज़त मांगी। पिता अचानक हिचक गए। गांव-समाज के ताने और बदनामी का डर उनके चेहरे पर साफ़ दिखने लगा। उन्होंने हाथ जोड़कर मना कर दिया, "नहीं-नहीं साहब! बेटियों का फोटो अख़बार में मत छापो। हमारा समाज छोटा है, लोग बोलेंगे कि बेटियों से नाई का काम करवाता है। हमारी बदनामी हो जाएगी।"
हिम्मतजी ने उनके कंधे पर हाथ रखा और बड़े आत्मीय भाव से समझाया, "अरे भाई! यह बदनामी की बात नहीं, गर्व की बात है! आपकी बेटियां कोई गलत काम नहीं कर रही हैं। इतने छोटे से गांव में अगर दो बेटियां अपने पिता का हाथ बंटा रही हैं और पुरुषों का काम भी इतनी हिम्मत से कर रही हैं, तो यह पूरे समाज के लिए प्रेरणा है। जब लोग अख़बार में पढ़ेंगे, तो ताना नहीं मारेंगे, बल्कि आपकी बेटियों की हिम्मत की मिसाल देंगे!"
स्थानीय रिश्तेदारों और हिम्मतजी के काफी समझाने के बाद पिता का डर दूर हुआ और वे मुस्कुराते हुए फोटो खिंचवाने को राजी हो गए। हिम्मतजी ने उस्तरा थामे उन बच्चियों का फोटो खींचा और पूरी रिपोर्ट तैयार करके इंदौर दैनिक भास्कर के दफ़्तर भेजी।
जब यह संवेदनशील खबर इंदौर प्रेस कॉम्प्लेक्स के संपादकीय टेबल पर पहुंची, तो संपादक भी दंग रह गए। खबर न केवल हिम्मतजी की 'बायलाइन' के साथ प्रमुखता से छपी, बल्कि इंदौर एडिशन से होती हुई दैनिक भास्कर के देश भर के सभी संस्करणों में प्रकाशित हुई!
कहा जाता है कि उस खबर के बाद पूरे अंचल में उन बच्चियों और उनके पिता का सम्मान कई गुना बढ़ गया। एक छोटे से गांव से निकली उस खबर ने साबित कर दिया कि हिम्मतजी की नज़र सिर्फ बड़ी घटनाओं पर नहीं, बल्कि समाज की खामोश क्रांति पर भी उतनी ही पैनी रहती थी।
(अगली किस्त में पढ़िएगा: 41 सालों तक एक हाथ में अख़बार का बंडल और दूसरे हाथ में कलम संभालने की अनोखी दास्तान! जानिए कैसे रावटी में 11 प्रतियों से शुरू हुआ सर्कुलेशन 350 प्रतियों तक पहुंचा और क्यों आज भी रतलाम के पत्रकार किसी भी बड़ी घटना पर हिम्मतजी को फोन लगाना नहीं भूलते।