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₹200 का सवाल और वो इस्तीफा जब सिद्धांतों की खातिर धर्मेश यशलहा ने छोड़ा दैनिक भास्कर

आपकी कलम Published by: नैवेद्य पुरोहित Updated Tue, 24 Mar 2026 12:11 AM
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नैवेद्य पुरोहित

पत्रकारिता के उस दौर में जहाँ अखबार गढ़े जा रहे थे वहां रिश्तों और वादों की अपनी एक अहमियत थी। आज की किस्त उस मोड़ की कहानी है, जहाँ एक होनहार पत्रकार और एक उभरते हुए संस्थान के रास्ते हमेशा के लिए जुदा हो गए थे।
जब धर्मेश यशलहा ने दैनिक भास्कर ज्वाइन किया था तो शुरुआती मासिक वेतन ₹400 तय हुआ था और वादा किया गया था कि 6 महीने बाद काम देखकर इसे बढ़ाकर ₹600 कर दिया जाएगा। युवा धर्मेश ने अपना सौ फीसदी दिया। वे फुल-टाइमर बन गए, अनुशासन के पक्के साथ ही यतीन्द्र भटनागर जैसे संपादक के भरोसेमंद थे। लेकिन वक्त गुजरता गया...6 महीने बीते...फिर साल भर बीत गया...परंतु वेतन की वो फाइल दफ्तर की अलमारियों में कहीं दबी रही।
धर्मेश बताते हैं, "मैंने साल भर इंतजार किया, जब बढ़ोत्तरी नहीं हुई तो मैंने साफ कह दिया कि मैं छोड़ रहा हूँ। तब मैनेजमेंट ने सिर्फ ₹200 बढ़ाए। ₹600 कर दिया, लेकिन मेरे लिए सवाल उस ₹200 का नहीं था, सवाल उस वादे का था जो समय पर पूरा नहीं किया गया।" उस समय धर्मेश कॉलेज में पढ़ रहे थे।
उनके पास यह मजबूती थी कि अगर नौकरी नहीं भी रहेगी, तो घर का काम नहीं रुकेगा। उन्होंने ठान लिया था कि जहाँ सिद्धांतों और मेहनत की सही कदर न हो, वहां रुकना ठीक नहीं। भास्कर के मालिकों के हाथ में वेतन बढ़ाना था लेकिन व्यवस्थाएं कुछ ऐसी थीं कि बात बन न सकी।
आमतौर पर जब कोई तल्खी में इस्तीफा देता है, तो रिश्ते खराब हो जाते हैं। लेकिन धर्मेश यशलहा के साथ ऐसा नहीं था। जब उन्होंने इस्तीफा दिया, तो संस्थान ने उन्हें बहुत ही सकारात्मक 'अनुभव प्रमाण पत्र' दिया। जो कि उस समय अमूमन आसानी से नहीं मिलता था। उनके काम की तारीफ हर स्तर पर हुई, लेकिन उन्होंने फिर भास्कर की तरफ पीछे मुड़कर नहीं देखा।
(अगली किस्त में पढ़िए: एक सख्त पिता के अनुशासन में पलते हुए, अपनी 'गुल्लक' के पैसों से पहला बैडमिंटन रैकेट खरीदने से लेकर खुद की कमाई से पहली 'लूना' गाड़ी का वो सफर।)
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