लंका पति के जंतर-मंतर ने ही अब लंका में आग लगा दी : संसद तक लोकतंत्र की आवाज़ या सत्ता का भय?

विज्ञापन

राजनीतिक लेख -राजेंद्र सिंह जादौन

दिल्ली की सड़कों ने एक बार फिर वह दृश्य देखा, जो किसी भी लोकतंत्र के लिए गर्व का विषय होना चाहिए था, लेकिन दुर्भाग्य से वह चिंता का विषय बन गया। जंतर-मंतर से संसद की ओर बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हुई झड़प ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल केवल कानून-व्यवस्था का नहीं है, सवाल लोकतंत्र के उस मूल सिद्धांत का है जिसके अनुसार जनता को अपनी बात कहने, विरोध दर्ज कराने और अपने प्रतिनिधियों से जवाब मांगने का अधिकार है।

जंतर-मंतर भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का प्रतीक रहा है। यह वह स्थान है जहां वर्षों से किसान, मजदूर, छात्र, कर्मचारी, महिलाएं, सामाजिक संगठन और विभिन्न वर्ग अपनी मांगों को लेकर आवाज उठाते रहे हैं। लेकिन आज ऐसा लगता है कि सत्ता को जनता की आवाज़ से अधिक जनता की खामोशी पसंद आने लगी है।

जब कोई सरकार प्रचंड बहुमत से सत्ता में आती है तो उससे अपेक्षा की जाती है कि वह अधिक उदार, अधिक जवाबदेह और अधिक लोकतांत्रिक होगी। लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि जब सत्ता को अपने बहुमत पर अत्यधिक भरोसा हो जाता है, तब वह आलोचना को दुश्मनी और विरोध को चुनौती समझने लगती है। यही वह मोड़ होता है जहां लोकतंत्र और तानाशाही के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है।

आज जंतर-मंतर से उठी आवाज़ें केवल किसी एक संगठन या समूह की आवाज़ नहीं थीं। वे उस बेचैनी का प्रतीक थीं जो देश के अलग-अलग हिस्सों में महसूस की जा रही है। बेरोजगारी पर सवाल है, महंगाई पर सवाल है, शिक्षा पर सवाल है, किसानों की आय पर सवाल है, युवाओं के भविष्य पर सवाल है। लेकिन इन सवालों का जवाब संवाद से नहीं बल्कि कई बार पुलिसिया कार्रवाई से दिया जाता दिखाई देता है।

सरकार समर्थक अक्सर कहते हैं कि कानून सबके लिए बराबर है और व्यवस्था बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है। यह बात सही है। लेकिन लोकतंत्र की असली परीक्षा तब होती है जब सरकार अपने विरोधियों के अधिकारों की रक्षा भी उतनी ही मजबूती से करे जितनी अपने समर्थकों की करती है। यदि विरोध प्रदर्शन केवल तब तक स्वीकार्य हैं जब तक वे सरकार की प्रशंसा करें, तो फिर लोकतंत्र का अर्थ ही क्या रह जाता है?

आज देश में एक अजीब माहौल दिखाई देता है। जो सरकार की तारीफ करे वह राष्ट्रभक्त, और जो सवाल पूछे वह संदिग्ध। जो समर्थन करे वह विकास का साथी, और जो आलोचना करे वह विरोधी। लेकिन लोकतंत्र का सिद्धांत इससे बिल्कुल अलग है। लोकतंत्र में सवाल पूछना राष्ट्रविरोध नहीं बल्कि राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा है।

इतिहास के पन्ने हमें चेतावनी देते हैं कि किसी भी देश में लोकतांत्रिक संस्थाएं तब कमजोर होने लगती हैं जब सत्ता स्वयं को आलोचना से ऊपर मानने लगती है। दुनिया के अनेक देशों में ऐसा हुआ है। वहां भी शुरुआत कानून-व्यवस्था, राष्ट्रहित और स्थिरता के नाम पर हुई थी। लेकिन धीरे-धीरे असहमति को सीमित किया गया, विरोध को नियंत्रित किया गया और अंततः लोकतांत्रिक मूल्यों को नुकसान पहुंचा।

भारत की ताकत उसकी विविधता और लोकतांत्रिक परंपरा रही है। यह वह देश है जहां महात्मा गांधी ने अंग्रेजी साम्राज्य को अहिंसक विरोध के माध्यम से चुनौती दी थी। यह वह देश है जहां जयप्रकाश नारायण ने सत्ता के खिलाफ जनांदोलन खड़ा किया था। यह वह देश है जिसने आपातकाल जैसी परिस्थितियों का भी लोकतांत्रिक तरीके से जवाब दिया था। इसलिए जब भी किसी प्रदर्शन पर बल प्रयोग की खबर आती है, तो स्वाभाविक रूप से लोग इतिहास के उन अध्यायों को याद करने लगते हैं जहां सत्ता ने जनता की आवाज़ को नियंत्रित करने का प्रयास किया था।

आज की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि सोशल मीडिया के युग में सरकारें सूचना पर नियंत्रण तो नहीं कर सकतीं, लेकिन वे आलोचना को शोर में बदलने की कोशिश अवश्य कर सकती हैं। एक तरफ जनता अपने मुद्दों को उठाने की कोशिश करती है, दूसरी तरफ राजनीतिक विमर्श को ऐसे विषयों में उलझा दिया जाता है जिनका आम आदमी की रोजमर्रा की समस्याओं से बहुत कम संबंध होता है।

देश का युवा रोजगार चाहता है, लेकिन उसे बहसें मिलती हैं। किसान उचित मूल्य चाहता है, लेकिन उसे आश्वासन मिलते हैं। छात्र बेहतर शिक्षा चाहते हैं, लेकिन उन्हें नई घोषणाएं मिलती हैं। महिलाएं सुरक्षा चाहती हैं, लेकिन उन्हें आंकड़ों की लड़ाई मिलती है। ऐसे में जब जनता सड़कों पर उतरती है तो उसे केवल भीड़ कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।

लोकतंत्र में जनता मालिक होती है और जनप्रतिनिधि उसके सेवक। यह वाक्य सुनने में जितना सरल लगता है, व्यवहार में उतना ही कठिन दिखाई देता है। चुनाव जीतने के बाद कई बार प्रतिनिधि स्वयं को जनता का प्रतिनिधि कम और शासक अधिक समझने लगते हैं। यही वह मानसिकता है जो लोकतंत्र को कमजोर करती है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकारें विरोध को अवसर के रूप में देखें। यदि हजारों लोग सड़कों पर हैं तो यह केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं है, बल्कि यह संकेत है कि कहीं न कहीं संवाद की प्रक्रिया कमजोर हुई है। जनता जब सड़क पर उतरती है तो वह केवल नाराजगी व्यक्त नहीं करती, बल्कि यह संदेश भी देती है कि उसकी समस्याओं को पर्याप्त महत्व नहीं मिला।

संसद लोकतंत्र का मंदिर कही जाती है। लेकिन संसद और जनता के बीच की दूरी बढ़ती जा रही है, यह चिंता का विषय है। लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। लोकतंत्र निरंतर संवाद, जवाबदेही और पारदर्शिता की मांग करता है। यदि जनता को अपनी बात संसद तक पहुंचाने के लिए बार-बार सड़कों पर उतरना पड़े, तो यह व्यवस्था के लिए आत्ममंथन का विषय होना चाहिए।

आज जंतर-मंतर से संसद तक की घटना ने एक बार फिर यह याद दिलाया है कि लोकतंत्र की असली ताकत पुलिस के बैरिकेड, सुरक्षा घेरों या प्रशासनिक आदेशों में नहीं होती। उसकी असली ताकत जनता के विश्वास में होती है। और विश्वास आदेश से नहीं, संवाद से पैदा होता है।

सरकार चाहे किसी भी दल की हो, किसी भी नेता की हो, जनता के सवालों से बच नहीं सकती। जनता ने वोट इसलिए नहीं दिया कि पांच साल तक केवल भाषण सुने। जनता ने वोट इसलिए दिया कि उसकी समस्याओं का समाधान हो, उसके सवालों का जवाब मिले और उसके भविष्य को सुरक्षित बनाया जाए।

आज जंतर-मंतर की गूंज यही कह रही है कि भारत का लोकतंत्र अभी जीवित है। लोग अभी भी सवाल पूछ रहे हैं। लोग अभी भी जवाब मांग रहे हैं। लोग अभी भी अपने अधिकारों के प्रति सजग हैं। यह किसी भी लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत है।

सत्ता को यह समझना होगा कि लोकतंत्र में असहमति दुश्मन नहीं होती। विरोध राष्ट्रविरोध नहीं होता। सवाल व्यवस्था को मजबूत करते हैं, कमजोर नहीं। और जो सरकार जनता की आवाज़ सुनने का साहस रखती है, वही इतिहास में सम्मान पाती है।

जंतर-मंतर की आवाज़ शायद यही कह रही थी कुर्सियां स्थायी नहीं होतीं, लेकिन जनता की स्मृति बहुत लंबी होती है। जनता सब देखती है, सब याद रखती है और समय आने पर अपना फैसला भी सुनाती है। लोकतंत्र की यही सबसे बड़ी शक्ति है और यही उसकी सबसे बड़ी खूबसूरती भी।

विज्ञापन

और पढ़ें...

ये भी पढ़ें...

WhatsApp पर शेयर Facebook