आत्मबोध : परलोक कहाँ है?
उपनिषदों में आत्मा को अमृत तत्व कहा है ईशवास्योपनिषद उद्घोष करता है कि ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् अर्थात इस संपूर्ण जगत में उसी दिव्य आत्म तत्व का वास है। यही आत्मा संपूर्ण जगत में व्याप्त होकर उसे जीवन ,शक्ति और प्राण प्रदान करती है।मनुष्य के भीतर जो चेतना ,विवेक, प्रेम और करुणा का प्रवाह है वह आत्मा से ही प्रकट होता है जब यह आत्म चेतना सक्रिय होती है व्यक्ति के विचार और कर्म पवित्र हो जाते हैं ।छान्दोग्योपनिषद् में कहा गया है सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ब्रह्म अर्थात् आत्मा सत्यस्वरूप है ज्ञानमय है और अनन्त है।
यही अनंत चेतना मनुष्य को पशुता से उपर उठाकर दिव्यता की ओर ले जाती है।शरीर और मन तो साधन मात्र हैं परंतु आत्मा ही वह ज्योति है जो उन्हें दिशा देती है । आत्मा का अनुभव तर्क या बाहरी प्रमाणों से संभव नहीं है। यह साधना, ध्यान और अंतर्मुखता से ही सुलभ होता है। जब मनुष्य अपने अंतःकरण की गहराई में उतरता है तब वह पता है कि उसके भीतर एक ऐसी ज्योति प्रज्वलित है,जो कभी क्षीण नहीं होती।यही आत्मज्योति जीवन को संतुलन, धैर्य और प्रेरणा प्रदान करती है।
परलोक कहाँ है? (अंतिम भाग)
जो क्रोधी है उसे दूसरों की ओर से क्रोध पूर्ण व्यवहार अपने ऊपर होता हुआ दृष्टिगोचर होगा। जो अनुदार है उसके साथ में अन्य व्यक्तियों को अनुदारता पूर्ण व्यवहार होगा। झूठे और लाचार व्यक्ति जहाँ जायेंगे वहीं देखेंगे कि उनके ऊपर अविश्वास एवं निन्दा की बौछार हो रही है व्यभिचारी व्यक्ति को भले घरों में प्रवेश नहीं होने दिया जाता चुगलखोर और यहाँ की बात वहाँ करने वालों के सामने लोग अपने मन की बात नहीं करते। बेईमान आदमी के कार्यों को लोग अविश्वास के साथ देखते हैं और जब तक अनेक प्रकार जाँच-पड़ताल नहीं कर लेते, तब तक भरोसा नहीं करते। इस प्रकार के अपमानजनक व्यवहार दूसरों की ओर से होते देखकर आम तौर से लोग मन ही मन कुड़कुड़ाते हैं और जमाने को, युग को, लोगों को, दुनिया को दोष देते हैं। परन्तु वे अपने निजी दोषों को देखना भूल जाते हैं।
वास्तव में अपनी निजी दोष असुखकर, अप्रिय, अपमानजनक, संघर्षमय वातावरण उत्पन्न करते हैं। यदि अपने हृदय में सात्विकता की पर्याप्त मात्रा विद्यमान हो तो दुनिया की ओर से अधिकाँश आक्रमण तो अपने आप ही बन्द हो जाते हैं। जो थोड़े बहुत आक्रमण नितान्त दुष्टों की ओर से किये जाते हैं वे प्रायः असफल होते हैं। यदि उन आक्रमणों से कुछ कष्ट भी उठाना पड़े तो वह धर्म-प्रतिरोध करता है। इन आक्रमणों या प्रतिरोधों से उसकी मानसिक शान्ति नष्ट नहीं हो पाती।
स्वः लोक का स्वर्ग अपने भीतर है। यदि हम प्रेम, उदारता, ईमानदारी और भलमनसाहत का व्यवहार दूसरों से करें तो दूसरों के हृदयों में से भी वैसी ही आवाज हमारे लिए आवेगी। अपने मन में पवित्रता, निष्कपटता, सत्यता, संयम एवं निस्वार्थता के भाव विद्यमान हों तो वे सद्भाव ही अपने को सदा प्रफुल्लित एवं सन्तुष्ट रख सकते हैं। बारहसिंगा की नाभि में कस्तूरी होती है, वह अपने ही अन्दर नन्दन वन की सुगन्धि का रसास्वादन करता है। जिस सुगन्ध के लिए दूसरे लोग तरसते हैं और प्राप्त करने के लिए नाना प्रकार के उपाय करते हैं वह बारहसिंगा को अपने अन्दर ही मिल जाती है वह अपनी मस्ती में मस्त हुआ उछलता फिरता है। फिर तुम्हीं दिन-रात दूसरों को हानि पहुँचाने के दुष्प्रयत्नों में मग्न रहकर अपने हृदय को अशान्त क्यों रखते हो? चलो, अपने स्वः लोक को पहचानो और उसमें प्रवेश करो।
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