आँखें खोलकर मार्ग पर चलो, भगवान और गुरु को स्वार्थ का साधन मत बनाओ : मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज
जीवन की यात्रा विवेक और सही दिशा से तय होती है, मोह से नहीं - गुरुदेव ने दिया 'काउंटर फेस करने की ताकत' का संदेश
राजेश जैन दद्दू
इंदौर. 08 अक्टूबर 2026। पूज्य मुनिपुंगव श्री 108 सुधासागर जी महाराज ने विद्या सुधा देशना मंडप में अपने प्रेरणादायी मंगल प्रवचन में जीवन की दिशा, सही मार्ग, मोह, अपेक्षा, पुण्य के सदुपयोग तथा गुरु और भगवान के प्रति सच्ची भक्ति का अत्यंत गहरा संदेश दिया। धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि गुरु देव ने आगे कहा कि
आँखें खोलकर मार्ग पर चलें
गुरुदेव ने कहा कि सच्चे रास्ते पर चलना आवश्यक है, लेकिन किसी के पीछे आँख बंद करके चलना उचित नहीं है। तपस्या अकेले की जा सकती है, धर्म अकेले किया जा सकता है और आत्मकल्याण की साधना भी अकेले की जा सकती है, लेकिन जीवन की यात्रा विवेक और सही दिशा के साथ करनी चाहिए।
जीवन में गुरु, साधु और श्रेष्ठ व्यक्तियों का मार्गदर्शन अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन अपना विवेक खो देना उचित नहीं है। किसी के पीछे चलें तो आँखें खोलकर चलें। महान आत्माएँ रास्ता बनाकर आगे निकल जाती हैं। उन्होंने रास्ता अपने आत्मकल्याण के लिए बनाया था। इसलिए हमें यह अपेक्षा नहीं करनी चाहिए कि वे हमारे लिए रुकेंगे। हमें उनके बताए मार्ग को समझकर अपनी आत्मयात्रा स्वयं करनी है। तीर्थंकर भगवानों ने संसार को सही मार्ग दिखाया, अब उस मार्ग पर चलना हमारी जिम्मेदारी है।
रिश्तों में "मेरे लिए" की भावना से सावधान
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- गुरुदेव ने समझाया कि संसार के अधिकांश संबंधों में कहीं न कहीं “मेरे लिए” की भावना आ जाती है। पति - मेरे लिए, पत्नी - मेरे लिए, बेटा - मेरे लिए, माता-पिता - मेरे लिए, धन - मेरे लिए, सम्मान - मेरे लिए। यहाँ तक कि भगवान और गुरु भी - “मेरे लिए।”
हम भगवान से चाहते हैं कि वे हमारी इच्छा पूरी करें और गुरु से चाहते हैं कि वे हमारे लिए सोचें। गुरुदेव ने समझाया कि यही भावना धीरे-धीरे अपेक्षा, अधिकार और मोह में बदल जाती है। सच्चा प्रेम कहता है - “तुम आगे बढ़ो, मैं तुम्हारे साथ चलूँगा।” जबकि मोह कहता है - “तुम मेरे लिए रुको, मेरी गति के अनुसार चलो।”
संसार की वस्तुओं का उपयोग करें, आसक्ति न रखें
गुरुदेव ने कहा कि संसार में हमें जो सुख-सुविधाएँ प्राप्त होती हैं, उनका उपयोग विवेकपूर्वक करना चाहिए। स्वस्थ शरीर मिला है तो उसका उपयोग केवल भोग-विलास के लिए नहीं, बल्कि तप, त्याग, धर्म, उपवास और आत्मकल्याण के लिए करना चाहिए। संसार की वस्तुओं का उपयोग करना गलत नहीं है, लेकिन उन्हें अपना स्थायी सुख मान लेना आत्मकल्याण के मार्ग में बाधक बन सकता है।
भगवान और गुरु को स्वार्थ का साधन न बनाएँ -
सच्ची भक्ति यह नहीं है कि “भगवान मेरे लिए क्या करेंगे?” बल्कि सच्ची भक्ति यह है कि “मैं भगवान के बताए मार्ग पर अपने जीवन को कैसे बदलूँ?” इसी प्रकार गुरु का महत्व इस बात में नहीं है कि वे हमारा सांसारिक काम कितना पूरा करते हैं, बल्कि इस बात में है कि वे हमें आत्मकल्याण का मार्ग कितना दिखाते हैं।
काउंटर फेस करने की ताकत रखें अपने जीवन में
गुरुदेव ने होटल के काउंटर का उदाहरण देते हुए कहा कि जब हम होटल में प्रवेश करते हैं तो वहाँ की सुंदरता, सुविधा और भोजन का आनंद लेते हैं। लेकिन असली परीक्षा तब होती है जब काउंटर पर बिल सामने आता है। इसी प्रकार जीवन में सुख-सुविधा का आनंद लेते समय यह भी समझना चाहिए कि जब कर्मों का परिणाम सामने आएगा, तब क्या हम उसे स्वीकार करने की शक्ति रखते हैं?
काउंटर फेस करने की ताकत ही वास्तविक धर्म की शुरुआत है। जब नुकसान हो - शांत रहें, जब अपमान हो - संयम रखें, जब अपेक्षा पूरी न हो - मोह छोड़ें, जब कर्म का परिणाम सामने आए - उसे स्वीकार करें। यहीं से धर्म, तप और आत्मशुद्धि प्रारंभ होती है।
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