यश चोपड़ा की फ़िल्म ‘काला पत्थर’ : अमिताभ बच्चन और शत्रुघ्न सिन्हा दो स्टार इमेजों का एक ही फ़्रेम में आना
Pankaj Shukla....
क्या ही होता होगा, जब किसी फ़िल्म की शूटिंग के समय अपने ज़माने के दो सुपरस्टार कैमरे के सामने भी भिड़ रहे हों और कैमरे के पीछे भी? ‘बाइस्कोप विद पंकज शुक्ल’ में आज बात ऐसी ही एक फ़िल्म की, जिसकी शूटिंग के समय इसके दोनों प्रमुख सितारे कैमरे के सामने और कैमरे के पीछे भी आपस में भिड़े रहते थे। इस फ़िल्म को रिलीज़ के समय शायद उतना प्यार नहीं मिला जितना उसके सितारों और निर्देशक से उम्मीद थी, लेकिन जिसे समय ने धीरे-धीरे अपने भीतर सहेज लिया। हमारी आज की ‘बाइस्कोप विद पंकज शुक्ल’ की फ़िल्म है, यश चोपड़ा की फ़िल्म ‘काला पत्थर’।
24 अगस्त 1979 को रिलीज़ हुई फ़िल्म ‘काला पत्थर’ उस समय आई जब अमिताभ बच्चन और शत्रुघ्न सिन्हा दोनों अपने-अपने स्टारडम के शिखर पर थे। अमिताभ ‘जंजीर’, ‘दीवार’, ‘त्रिशूल’, ‘डॉन’ और ‘मुकद्दर का सिकंदर’ के रास्ते हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े सितारे बन चुके थे। शत्रुघ्न सिन्हा भी ‘कालीचरण’, ‘विश्वनाथ’ और ‘जानी दुश्मन’ जैसी फ़िल्मों से अपनी अलग स्टार पहचान स्थापित कर चुके थे। दोनों इससे पहले ‘परवाना’ में साथ काम कर चुके थे, लेकिन ‘काला पत्थर’ का महत्व इस बात में है कि ये दोनों के सुपरस्टार बनने के बाद की पहली साथ फ़िल्म थी।
दो स्टार इमेजों का एक ही फ़्रेम में आना
इसलिए यह सिर्फ़ एक फ़िल्म नहीं थी। यह दो स्टार इमेजों का एक ही फ़्रेम में आना था। अमिताभ की ख़ामोशी के सामने शत्रुघ्न की आवाज़। अमिताभ के भीतर का अपराधबोध और शत्रुघ्न का बाहर दिखाई देता आत्मविश्वास। और, इन दोनों के बीच शशि कपूर! जिनका किरदार, रवि मल्होत्रा, न अपराधबोध से दबा है, न विद्रोह की अकड़ में है। वह व्यवस्था के भीतर खड़ा वह आदमी है जो ख़तरे को पहचानता है और उसे रोकने की कोशिश करता है।
यश चोपड़ा ने फ़िल्म ‘काला पत्थर’ में इन तीनों को मुंबई की सड़कों या किसी आलीशान हवेली में नहीं, बल्कि कोयले की खदान के अँधेरे में उतारा। कहा जा सकता है कि ‘काला पत्थर’ चासनाला की वास्तविक खदान त्रासदी से प्रेरित फ़िल्म है, जिसमें तमाम खनिकों की जान गई थी। लेकिन, फ़िल्म को सिर्फ़ चासनाला की कहानी कहना ठीक नहीं होगा। विजय पाल सिंह के चरित्र में जो अपराधबोध है, उसकी संरचना जोसेफ़ कॉनरैड के उपन्यास ‘लॉर्ड जिम’ की याद दिलाती है।
फ़िल्म ‘काला पत्थर’ में अमिताभ बच्चन का किरदार विजय कभी मर्चेंट नेवी का अधिकारी था। एक हादसे के समय वह अपने साथियों को बचाने के बजाय ख़ुद को बचाकर लौट आया। उस निर्णय ने उसकी पूरी ज़िंदगी को भीतर से तोड़ दिया। अब वह कोयले की खदान में काम करता है, जैसे ज़मीन के नीचे जाकर अपने अपराध की सज़ा काट रहा हो।
वह कोयला नहीं खोद रहा। वह अपने भीतर दबे अपराधबोध की खुदाई कर रहा है। यही फ़िल्म ‘काला पत्थर’ की सबसे अनदेखी परत है। क्योंकि ‘दीवार’ और ‘जंजीर’ वाला अमिताभ जिस ग़ुस्से का प्रतिनिधि था, ‘काला पत्थर’ का विजय पहली बार उस ग़ुस्से को भीतर मोड़ता दिखाई देता है। वह व्यवस्था से लड़ने से पहले ख़ुद से लड़ रहा है। उसका सबसे बड़ा दुश्मन कोई सेठ धनराज नहीं, उसका अपना अतीत है।
फ़िल्म ‘काला पत्थर’ के एक संवाद में विजय अपने बारे में स्वीकार करता है, “My Pain is My Destiny and I Can’t Avoid It!” हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े एंग्री यंग मैन के मुँह से यह स्वीकारोक्ति अपने आप में बहुत बड़ी बात थी। और इसी वजह से ‘काला पत्थर’ को केवल अमिताभ की एक और एक्शन फ़िल्म मानना ठीक नहीं लगता।
दूसरी तरफ़ मंगल है। फ़िल्म ‘काला पत्थर’ में शत्रुघ्न सिन्हा का किरदार मंगल पुलिस से भागता हुआ, अक्खड़, दबंग और अपनी ताक़त पर भरोसा करने वाला आदमी है। यह भूमिका उस समय के शत्रुघ्न की स्टार-पर्सोना के बिल्कुल अनुकूल थी। उनकी आवाज़, चाल, संवाद बोलने का ढंग, सबमें एक ऐसा आदमी दिखाई देता है जिसे किसी से डरने की आदत नहीं। लेकिन, खदान में ताक़त की परिभाषा बदल जाती है। वहाँ अकेला आदमी ताक़तवर नहीं हो सकता। वहाँ आदमी ही आदमी का सहारा है। और, धीरे-धीरे मंगल भी बदलता है।
विजय, मंगल और रवि तीन अलग-अलग दुनिया से आए आदमी हैं, लेकिन हादसा आने पर तीनों की मंज़िल एक हो जाती है, मज़दूरों की जान बचाना। यही वह जगह है जहाँ ‘काला पत्थर’ अपने दौर की एक महत्वपूर्ण सामाजिक फ़िल्म बनती है। फ़िल्म केवल यह नहीं बताती कि खदान में मज़दूर कितने ख़तरे में काम करते हैं। वह यह सवाल भी पूछती है कि उत्पादन और इंसानी ज़िंदगी के बीच प्राथमिकता किसकी होनी चाहिए?
मालिक के लिए कोयला ज़रूरी है। मज़दूर के लिए उसकी जान। और, जब मुनाफ़ा सुरक्षा से बड़ा हो जाता है तो हादसा केवल दुर्घटना नहीं रहता, वह व्यवस्था की विफलता बन जाता है। यही वजह है कि आज भी जब किसी खदान या औद्योगिक इकाई में हादसा होता है, फ़िल्म ‘काला पत्थर’ याद आती है।
निर्माता-निर्देशक यश चोपड़ा ने फ़िल्म ‘काला पत्थर’ की दुनिया को स्टूडियो की सुविधा में नहीं बनाया। फ़िल्म की वास्तविकता के लिए यूनिट तब के बिहार और आज के झारखंड के गिद्दी क्षेत्र पहुँची और गिद्दी वॉशरी में शूटिंग हुई। खदान की धूल, अँधेरा, पानी, लोहे की संरचनाएँ और सुरंगों की घुटन फ़िल्म के दृश्य संसार का हिस्सा बन गईं। और, यहाँ यश चोपड़ा का कमाल यह है कि खदान केवल लोकेशन नहीं रहती, वह एक किरदार बन जाती है।
सिनेमैटोग्राफर केजी का कैमरा जब इन संकरी सुरंगों में आदमी को रखता है तो सुपरस्टार भी छोटा दिखाई देता है। यहाँ अमिताभ बच्चन भी लोकेशन से बड़े नहीं है। कोयला, मशीन और अँधेरा सब उससे बड़े हैं। यही दृश्य भाषा फ़िल्म को उसकी वास्तविकता देती है। लेकिन, फ़िल्म ‘काला पत्थर’ में कैमरे के सामने की दुनिया जितनी अँधेरी थी, कैमरे के पीछे यश चोपड़ा का माहौल उतना ही जीवंत।
अमिताभ बच्चन ने वर्षों बाद यश चोपड़ा के साथ काम करने को याद करते हुए लिखा, “Working with Yash-ji was always a picnic.” यानी खदान के भीतर मौत का तनाव और खदान के बाहर एक ऐसा निर्देशक जो अपनी यूनिट को परिवार की तरह रखता था। कलाकारों के परिवार लोकेशन पर आते, लोग साथ खाना खाते, अंताक्षरी और डम्ब शराड्स खेलते।
और, इस फ़िल्म की मेकिंग के बाहर एक दूसरी कहानी भी चल रही थी। अमिताभ और शत्रुघ्न की दोस्ती में दरारें पड़ चुकी थीं। शत्रुघ्न सिन्हा ने बाद में अपने संस्मरण में ‘काला पत्थर’ के एक फाइट सीक्वेंस का ज़िक्र किया, जिसमें उनके मुताबिक़ अमिताभ उन्हें अपेक्षा से ज़्यादा ज़ोर से मारते रहे और शशि कपूर को बीच में आना पड़ा। बाद में शत्रुघ्न ने यह भी कहा कि ‘काला पत्थर’ उनकी और अमिताभ की दोस्ती के ताबूत में आख़िरी कील साबित हुई।
लेकिन इसी कहानी का दूसरा पहलू भी है। शत्रुघ्न सिन्हा याद करते हैं, एक सुबह का वह शॉट, जिसमें दोनों को कंधे पर फावड़ा रखकर उगते सूरज की तरफ़ एक-दूसरे की ओर चलना था। शत्रुघ्न के मुताबिक़ अमिताभ उनसे पहले वहाँ पहुँच गए थे। अमिताभ ने उनसे कहा, “चलिए, मैं तैयार हूँ।” शत्रुघ्न ने बाद में अमिताभ की समय की पाबंदी, अनुशासन और पेशेवर रवैये की तारीफ़ की। यानी निजी रिश्ते कितने भी उलझे हुए हों, बड़े कलाकार का पेशेवर क़द कभी-कभी उसके निजी मतभेदों से बड़ा हो जाता है।
‘काला पत्थर’ के भीतर का हादसा इसी रिश्ते का एक अजीब सिनेमाई प्रतिबिंब
‘काला पत्थर’ के भीतर का हादसा इसी रिश्ते का एक अजीब सिनेमाई प्रतिबिंब भी लगता है। जब खदान में पानी भरता है, ज़िंदगी बचाने की लड़ाई शुरू होती है और तीनों आदमी अपनी-अपनी सीमाओं से बाहर निकलते हैं, तो विजय के लिए यह केवल मज़दूरों को बचाने का मिशन नहीं रह जाता। यह उसके अतीत का जवाब है। जिस आदमी ने कभी दूसरों को पीछे छोड़कर अपनी जान बचाई थी, वही अब दूसरों को बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डालता है। अदालत ने उसे कायर कहा था। ज़िंदगी उसे मौक़ा देती है कि वह ख़ुद को बदल सके। और, वह बदलता है।
यही फ़िल्म ‘काला पत्थर’ का असली क्लाइमेक्स है। खदान का पानी तो रुक जाता है, लेकिन विजय के भीतर वर्षों से जमा पानी पहली बार बह निकलता है। इस फ़िल्म का सबसे बड़ा विस्फोट खदान में नहीं होता। वह आदमी के भीतर होता है। और, बतौर निर्देशक यश चोपड़ा की यह उपलब्धि है कि उन्होंने इसे भाषण से नहीं, दृश्य से कहा।
लेकिन, फ़िल्म ‘काला पत्थर’ की सबसे बड़ी समस्या भी शायद यही थी। 1979 तक दर्शक बदल रहा था। ‘जंजीर’ और ‘दीवार’ के ग़ुस्से वाला भारत आपात काल से निकल चुका था। वह सत्ता परिवर्तन देख चुका था। जनता की बेचैनी अब केवल व्यवस्था के ख़िलाफ़ चीख़ नहीं थी; वह समाधान तलाश रही थी। एंग्री यंग मैन की छवि अपने शिखर पर पहुँचकर अब धीरे-धीरे बदलने वाली थी। ‘काला पत्थर’ उसी संक्रमण के बीच खड़ी फ़िल्म थी।
यश चोपड़ा भी शायद इस बदलाव को भीतर से महसूस कर रहे थे। बाद में उन्होंने अपने करियर को याद करते हुए कहा कि ‘त्रिशूल’ और ‘काला पत्थर’ एक्शन फ़िल्में थीं, क्योंकि ऐसे विषय उनके पास आए और उन्हें पसंद आए। लेकिन आगे चलकर उन्हें लगा कि वह अपनी असली राह से भटक रहे हैं और वह रोमांटिक फ़िल्मों की तरफ़ लौटना चाहते हैं। इसके बाद बनने वाला ‘सिलसिला’ इस बदलाव की सबसे बड़ी निशानी बना।
यहाँ ये भी ध्यान रखना ज़रूरी है कि फ़िल्म ‘काला पत्थर’ के महिला किरदार सिर्फ़ प्रेमकथाओं का हिस्सा नहीं हैं। राखी अभिनीत डॉ. सुधा सेन का किरदार विजय के लिए उसके अपराधबोध के सामने खड़ी वह संवेदनशील शक्ति हैं, जो उसे अपने अतीत से भागते रहने के बजाय उसका सामना करने के लिए उकसाती है। परवीन बाबी बतौर एक प्रेस फ़ोटोग्राफ़र कहानी को बाहरी दुनिया से जोड़ती हैं और रवि के साथ उसका रिश्ता फ़िल्म के कठोर औद्योगिक संसार में मानवीय गर्माहट लाता है। नीतू सिंह अभिनीत चन्नो का किरदार सबसे अलग है। मंगल की अक्खड़ दुनिया में वह घरेलू अपनापन और सहज हास्य लेकर आती हैं। तीनों अभिनेत्रियों का स्क्रीन-टाइम भले सीमित हो, लेकिन फ़िल्म के पुरुष किरदारों की कशमकश के बीच ये तीनों अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराने में सफल रहती हैं।
और फिर है कलाकारों की वह मंडली, जिसके बिना ‘काला पत्थर’ की खदान इतनी जीवित नहीं लगती। प्रेम चोपड़ा अभिनीत सेठ धनराज का किरदार महज़ फ़िल्मी खलनायक नहीं, उस शोषक पूँजीवादी व्यवस्था का चेहरा है जिसके सामने मज़दूरों की जान सस्ती और उत्पादन महँगा है। परीक्षित साहनी, यूनुस परवेज़, सत्येन कप्पू, शरत सक्सेना, मैक मोहन और जगदीश राज जैसे कलाकार छोटी-छोटी भूमिकाओं में उस सामूहिक दुनिया को आकार देते हैं। यहाँ तक कि सुरेश ओबेरॉय, मनमोहन कृष्ण, मदन पुरी, इफ़्तेख़ार और संजीव कुमार जैसे कलाकारों की संक्षिप्त मौजूदगी भी फ़िल्म को एक अतिरिक्त सामाजिक विश्वसनीयता देती है।
फ़िल्म ‘काला पत्थर’ एक तरफ़ सलीम-जावेद के एंग्री यंग मैन का विस्तार थी और दूसरी तरफ़ यश चोपड़ा के भीतर के बदलाव की शुरुआत भी थी। इस बदलाव को फ़िल्म के संगीत में भी महसूस किया जा सकता है। राजेश रोशन के संगीत में ‘धूम मचे धूम’ की ऊर्जा है, ‘बाहों में तेरी’ का प्रेम है, लेकिन ‘एक रास्ता है ज़िंदगी’ फ़िल्म के दर्शन तक पहुँचता है। किशोर कुमार और लता मंगेशकर की आवाज़ में यह गीत जैसे विजय के जीवन की धड़कन है, हालाँकि फ़िल्म के परदे पर इसे शशि कपूर और मधु मल्होत्रा ने जिया है। कम लोगों को ही पता होगा कि इस फ़िल्म का संगीत बनते समय एक बार राजेश रोशन को बदलने की बात भी चली थी, लेकिन तब लता मंगेशकर इस बात पर अड़ गईं कि अगर राजेश रोशन को हटाया गया तो वह फ़िल्म के गाने नहीं गाएंगी।
साहिर लुधियानवी के लिए भी ‘काला पत्थर’ यश चोपड़ा के साथ एक दौर सम्पन्न होने की तरह रही। इसके बाद यश चोपड़ा का सिनेमा एक दूसरी दिशा में जाने वाला था। सलीम-जावेद की जोड़ी भी अपने टूटने की तरफ़ बढ़ रही थी। अमिताभ और शत्रुघ्न के रिश्ते में दरारें गहरी हो रही थीं। यानी ‘काला पत्थर’ को पीछे मुड़कर देखें तो यह सिर्फ़ एक फ़िल्म नहीं है। यह हिंदी सिनेमा के एक युग का जंक्शन है। एक तरफ़ सलीम-जावेद का ग़ुस्सा। दूसरी तरफ़ यश चोपड़ा का आने वाला रोमांस। एक तरफ़ अमिताभ का सुपरस्टारडम। दूसरी तरफ़ शत्रुघ्न सिन्हा का अपना मुक़ाम। एक तरफ़ साहिर। दूसरी तरफ़ जावेद अख़्तर को बतौर गीतकार इसी फ़िल्म की मेकिंग के दौरान मिला यश चोपड़ा का ग्रीन सिगनल।
जब ‘काला पत्थर’ रिलीज़ हुई तो यह उस दौर की सबसे बड़ी व्यावसायिक सफलता नहीं बन सकी। फ़िल्मफ़ेयर में इसे कई प्रमुख नामांकन मिले, लेकिन यह एक भी पुरस्कार नहीं जीत सकी। उस समय शायद दर्शक अमिताभ से एक और ‘दीवार’ चाहता था और उसे एक ऐसा आदमी मिला जो अपने भीतर झाँक रहा था। लेकिन समय की एक आदत होती है। वह कभी-कभी उन फ़िल्मों को वापस निकाल लाता है जिन्हें अपने समय ने पूरी तरह नहीं समझा था।
आज ‘काला पत्थर’ देखते हुए हमें सिर्फ़ एक खदान हादसा नहीं दिखता। हमें हर वह औद्योगिक हादसा दिखाई देता है जिसमें सुरक्षा से पहले उत्पादन को महत्व दिया गया। हमें हर वह आदमी दिखाई देता है जो अपनी एक ग़लती के साथ पूरी उम्र जीता है। हमें हर वह दोस्ती दिखाई देती है जो स्टारडम की राजनीति में टूट जाती है, लेकिन सामने वाले की प्रतिभा को स्वीकार करना नहीं छोड़ती।
और, हमें यश चोपड़ा दिखाई देते हैं। एक ऐसे मोड़ पर खड़े निर्देशक, जो खदान के अँधेरे से निकलकर जल्द ही सरसों के खेतों की रोशनी में जाने वाले हैं। ‘बाइस्कोप विद पंकज शुक्ल’ में फ़िल्म ‘काला पत्थर’ की कहानी केवल एक हादसे की कहानी नहीं है। यह आदमी के भीतर दबे उस पत्थर की कहानी है जिसे हटाए बिना वह आगे नहीं बढ़ सकता।
फ़िल्म ‘काला पत्थर’ केवल अमिताभ बच्चन और शत्रुघ्न सिन्हा की फ़िल्म नहीं है। यह दो सुपरस्टारों के बीच का पहला मुक़ाबला भी है, एक खदान हादसे की सामाजिक स्मृति भी और सलीम-जावेद के सिनेमा के बदलते तेवर की कहानी भी। और, यह यश चोपड़ा के भीतर चल रहे सिनेमाई संक्रमण की कहानी भी कहती है। फ़िल्म ‘काला पत्थर’ अपनी रिलीज़ के वक़्त साल 1979 में जितनी समझी गई थी, आज उससे कहीं ज़्यादा समझ में आती है। तब हम खदान देख रहे थे, आज हम उसके भीतर फंसे इंसान देखते हैं। और यही किसी फ़िल्म की सबसे बड़ी जीत है। जै जै..!

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